आइंस्टाइन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत

आइंस्टाइन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत सबसे बड़ी चुनौती में भी सफल

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन की सापेक्षता का सिद्धांत को समय-समय पर कई वैज्ञानिकों द्वारा चुनौती दी जाती रही है और नए-नए मॉडल दिए जाते रहे हैं परंतु सारी चुनौतियों और मॉडल को धत्ता बताते हुये यह सिद्धांत हमेशा समय के पैमाने पर खड़ा उतरता है। परंतु इस बार इस सिद्धांत को अपने सबसे बड़ी चुनौती से गुजरना पड़ा और इस चुनौती पर आइंस्टाइन का सिद्धांत खड़ा उतरा। इससे यह सिद्ध होता है कि आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।

गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) के बार में आइंस्टाइन की जो समझ थी, जिसे उन्होंने अपने सापेक्षता के सिद्धांत में रेखांकित किया, कि सभी पदार्थ समान दर से गिरते हैं भले ही उनका द्रव्यमान या उनकी संरचना कैसी भी हो। इसे ‘समानक सिद्धांत (Strong Equivalence Principle)  भी कहते हैं। शोधकर्त्ताओं ने इसे समय-समय पर परखा और हमेशा वही परिणाम मिले। मसलन् 1971 में अपोलो-11 के अंतरिक्षयात्री डैविड स्कॉट ने एक पंख एवं एक हथौड़ा को एक साथ गिराया। दोनों वस्तुएं चंद्रमा के ग्रे धरातल पर एक ही समय में गिरा। वैसे पृथ्वी पर तो पंख, हथौड़ा के वनिस्पत देरी से ही गिरेगा क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल उस पंख को रोके रखता है।

वैसे भौतिकी के कई अन्य मॉडल सभी परिस्थितियों में समानक सिद्धांत के समान रूप से कार्य करने पर संदेह व्यक्त करते रहे हैं खासकर जब वस्तु अत्यधिक घना या विशाल हो। इसके लिए न्यूट्रॉन स्टार का उदाहरण दिया गया जो ‘गुरुत्वाकर्षणीय बंध ऊर्जा’(gravitational binding energy) के कारण अपेक्षाकृत कम द्रव्यमान वाले वस्तुओं की तुलना में कुछ अलग तरह से गिरते हैं। गुरुत्वाकर्षणीय बंध ऊर्जा वह गुरुत्वाकर्षीय ऊर्जा है जो इन्हें बांधे रखता है।

वर्ष 2011 में नेशनल साइंस फाउंडेशन की ग्रीन बैंक टेलीस्कोप द्वारा खोजी गई एक सौर प्रणाली जैसी चरम परिस्थिति में नए मॉडल व आइंस्टाइन के मॉडल का परीक्षण किया गया। यह तारा प्रणाली एक प्रकार से प्राकृतिक प्रयोगशाला का काम किया। इन पर विगत छह वर्षों तक नीदरलैंड स्थित वेस्टरबॉर्क सिंथेसिस रेडियो टेलीस्कोप, पश्चिमी वर्जिनिया स्थित ग्रीन बैंक टेलीस्कोप एवं पुर्तो रिको स्थित अरेसिबो वेधशाला में नजर रखा गया। जिस सौर प्रणाली में यह प्रयोग किया गया, उसका नाम है, PSR J0337+1715 जो वृषभ नक्षत्र की दिशा में है। यह पृथ्वी से 4200 प्रकाश वर्ष दूर है। इस प्रणाली में एक न्यूट्रॉन तारा (जिसे पल्सर भी कहते हैं यानी अत्यधिक चुंबकीय क्षमता वाला घूर्णन करता न्यूट्रॉन टारा) है जो आंतरिक सफेद बौने तारा के साथ 1.6 दिन में चक्कर लगा लेता है। ये दोनों एक अन्य सुदूर सफेद बौना तारा के साथ, जो कि काफी दूर स्थित है 327 दिनों की कक्षीय चक्कर लगा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह विचित्र तरह की स्टार प्रणाली है। उनके मुताबिक इस न्यूट्रॉन तारा की तुलना में आंतरिक सफेद बौना तारा न तो अत्यधिक विशाल है न ही अत्यधिक सुगठित या कॉम्पैक्ट। यदि आइंस्टाइन के समानक सिद्धांत को चुनौती देने वाला गुरुत्वाकर्षणीय बंध ऊर्जा मॉडल सही होता तो अत्यधिक घना न्यूट्रॉन तारा और आंतरिक सफेद बौना तारा, सुदूर स्थित (बाह्य) अन्य सफेद बौना तारा की ओर अलग तरीके से गिरते। परंतु शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार दोनों के त्वरण दर में अंतर इतना कम था कि उन्हें पकड़ा ही नहीं जा सका। दोनों के त्वरण में कोई अंतर है भी तो वह 10 लाख में 3 पार्ट्स से अधिक नहीं है। इस तरह आंइस्टिन का सिद्धांत इस बड़ी चुनौती पर भी खड़ा उतरा और वैकल्पिक मॉडल की कमियां सामने आ गईं।

आईंस्टाइन को एक वर्ष बाद मिला नोबेल पुरस्कार

आइंस्टाइन को वर्ष 1921 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें सैंद्धातिक भौतिकी, विशेषकर फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव के नियम की खोज के कारण नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि उन्होंने यह पुरस्कार वर्ष 1922 में प्राप्त किया। इस कारण यह था कि अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के मुताबिक वर्ष 1921 में कोई भी नामांकन मानक शर्तों के अनुरूप नहीं पाए गए। इसलिए वर्ष 1921 के नोबेल पुरस्कार को रिजर्व रखकर उसे वर्ष 1922 में दिया गया।

 

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