आर्थिक विकास की ग्रोथ पोल अवधारणा

भूगोल और आप

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक विकास उसके प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक एवं कुशल दोहन के साथ-साथ उनके उपयुक्त एवं सतत् उपयोग पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त विकास की प्रक्रिया में संसाधनों का उचित वितरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यद्यपि भौगोलिक विविधता भी विकास के प्रतिमान को प्रभावित करती है।

वृद्धि विकास सम्बन्धी ‘ग्रोथ पोल’ थ्योरी के जन्मदाता फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रैंकोस पेरॉक्स थे। इनका जन्म 1903 में हुआ और मृत्यु 1987 में हुई। माना जाता है कि उन्होंने प्रादेशिक विकास की इस थ्योरी का सृजन 1950 में कर लिया था, परन्तु यह 1955 में तब प्रसिद्ध हुई जब इस पर आधारित प्रणोदक ध्रुव (च्तवचनसेपअम च्वसम) थ्योरी को उन्होंने प्रस्तुत किया जो आर्थिक विकास पर केन्द्रित थी।

ग्रोथ पोल अवधारणा पर आधारित प्रणोदक धु्रव की थ्योरी औद्योगिक अथवा व्यापारिक इकाईयों के संदर्भ में लागू होती है। यह एक कम्पनी से सम्बद्ध इसकी अनेक इकाइयों के उस संगठन को लक्षित करती है, जो आर्थिक विकास हेतु प्रधान बल उत्पन्न करता है ताकि मजबूत इनपुट-आउटपुट के प्रभाव द्वारा ‘वृद्धि’ प्रत्युपन्नता हो। इस अवधारणा में किसी क्षेत्र का आर्थिक विकास उन्नतिशील उद्योगों की गहनता व तीव्रता पर निर्भर करता है। ग्रोथ पोल आर्थिक क्रियाओं की केन्द्रीय अवस्थिति है। जीवन शैली को उन्नत बनाने वाली आर्थिक अभिक्रियाओं का वृद्धि केन्द्र बिन्दु ग्रोथ पोल है।

1950 और 1960 के मध्य ग्रोथ पोल अवधारणा अपनी प्रसिद्धी के चरम पर थी। इसका उपयोग कई देशों फ्रांस व इटली आदि की क्षेत्रीय राजनीति में व्यापक स्तर पर हो रहा था। इस्पात, वाणिज्य, मोटर वाहन उद्योग सहित अनेक उन्नतिशील औद्योगिक क्षेत्रों में नवनिर्माणी सुविधाओं के प्रचालन से समस्याग्रस्त क्षेत्रों को विकासशील क्षेत्रों की दिशा प्रदान की गई।

ग्रोथ पोल मॉडल भारत सहित अन्य विकासशील देशों में उचित परिणाम दे सके इसके लिए स्वस्थ औद्योगिक नीति का कार्यान्वयन जरूरी है। इस संदर्भ में अनेक भारतीय अर्थशास्त्रियों ने प्रयास किए जिसमें आर. पी. मिश्रा, प्रकाश राव तथा के. वी. सुन्दरम् प्रमुख हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में ग्रोथ पोल की अवधारणा को समझाते हुए आर. पी. मिश्रा ने ‘वृद्धि नाभि’ अवधारणा प्रस्तुत की। जिसमें उन्होंने चार-सोपानी अनुक्रम को प्रस्तुत किया।

प्रथम सोपान-जिसके केन्द्र में राष्ट्रीय स्तर पर ग्रोथ पोल को रखा गया जिसकी जनसंख्या 5 से 25 लाख मानी गई है लेकिन सम्पूर्ण जनसांख्यिकीय आकार 2 करोड़ तक हो सकता है और यह हृदय की भाँति कार्य करता है। द्वितीय सोपान-प्रादेशिक स्तर ग्रोथ पोल के समीप है, जिसकी जनसंख्या 50 हजार से 5 लाख मानी गयी है और यहाँ द्वितीयक आर्थिक क्रियाओं का प्रभाव है। तृतीय सोपान-वहीं उप-प्रादेशिक स्तर, वृद्धि बिन्दुओं के रूप में है जिनका जनसांख्यिकीय आकार लगभग एक लाख पचास हजार है। यहाँ कृषि आधारित उद्योग होंगे। चतुर्थ सोपान के अनुक्रम में व्यष्टि प्रादेशिक स्तर को सेवा केन्द्रों के रूप में रखा गया है जिसका जनसांख्यिकीय आकार 30 हजार है और यहाँ पर रोजमर्रा की जरूरतों के सामान से सम्बन्धित केन्द्र होंगे। पाँचवें स्तर पर स्थानीय स्तर को केन्द्रित गाँव के रूप में प्रस्तुत किया गया जो लगभग 6 ग्रामों से निर्मित प्रादेशिक इकाई होगी और यहाँ एक नियोजित बस्ती होगी।

‘ग्रोथ पोल’ नीतियों को विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रीय, प्रादेशिक, क्षेत्रीय और ग्रामीण विकास के संदर्भ में लागू किया जाता है। भारत में भी ‘ग्रोथ पोल’ अवधारणा का उपयोग पिछले कई दशकों से हो रहा है। ग्रोथ पोल अवधारणा कहती है कि वृद्धि सभी स्थानों पर समान रूप से नहीं दिखाई देती। यह औद्योगिक विकास के इर्द-गिर्द अस्तित्व में तब आती है, जब प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से विकास सम्बन्धी प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव क्षेत्र पर पड़ रहा हो और परिवहन सुविधाएँ विकासशील अवस्था में हों।

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