भारतीय महासागर में कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति

भूगोल और आप

भारतीय महासागर की पहचान वायुमण्डलीय कार्बन डाईऑक्साइड के लिए एक नेट सिंक के रूप में की गई है। घुलनशीलता द्वारा यह प्रति वर्ष लगभग 330-430 टेट्राग्राम कार्बन उदग्रहित करता है जो कार्बन डाईऑक्साइड के वैश्विक महासागरीय उदग्रहण का लगभग 20 प्रतिशत है। वायु से समुद्र में कार्बन डाइऑक्साइड के इस प्रवाह का अधिकांश हिस्सा तापमान चालित है और 20 डिग्री दक्षिण अक्षांश के दक्षिण में घटित होता है। इस अक्षांश के बाद समुद्र की सतह के तापमान में भारी गिरावट आती है। इसके विपरीत उत्तरी भारत के महासागर को (35 डिग्री दक्षिण का उत्तर) अनुमानतः लगभग 240 टेट्राग्राम कार्बन/प्रति वर्ष बाहरी प्रवाह के साथ वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित करने वाले एक स्रोत के रूप में जाना जाता है। भारतीय महासागर द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड का जीववैज्ञानिक उद्ग्रहण प्रति वर्ष-750 से 1320 टेट्राग्राम कार्बन आंका गया है। अपेक्षाकृत गर्म उत्तरी भारतीय महासागर से कार्बन डाईऑक्साइड की प्रस्तावित क्षति का आकलन प्रतिवर्ष 150 से 500 टेट्राग्राम कार्बन के बीच है। मध्य एवं पूर्वी अरब सागर अकेले ही वायुमंडल में प्रतिवर्ष औसतन 45 टेट्राग्राम कार्बन का योगदान करता है।

महासागरीय बायोटा मुख्य रूप से फाइटोप्लेंक्टॉन नामक एकल कोशिका सूक्ष्मजीव से बना होता है जो यूफोटिक नामक महासागर की सूर्य की रोशनी द्वारा प्रकाशित ऊपरी परत में रहता है। फाइटोप्लेंक्टॉन सूर्य की रोशनी में अजैविक कार्बन डाईऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से जैविक कार्बन में बदलता है।

फाइटोप्लेंक्टॉन द्वारा जैविक कार्बन के संश्लेषण के माध्यम द्वारा फिक्स की गई कार्बन की मात्रा को प्रति यूनिट समय जल के कार्बन प्रति यूनिट परिमाण के रूप में मापा जाता है और इसे प्राथमिक उत्पादन कहा जाता है। निर्मित हो जाने के बाद इस जैविक पदार्थ के शाकभक्षी जूप्लांक्टॉन द्वारा उपभोग एवं बैक्टीरिया द्वारा अवक्रमण के माध्यम से वापस कार्बन डाईऑक्साइड, फास्फेट, अमोनिया और अन्य पोषक तत्वों में अपघटित हो जाने की संभावना रहती है। तथापि, इस प्राथमिक उत्पाद का कुछ हिस्सा उच्च पोषणज स्तरों के माध्यम से गहरे जल में चला जाता है। इसका छोटा हिस्सा (एक प्रतिशत से कम) तलछटों में भी जा सकता है। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जैविक पदार्थों के डूबने से वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड प्रभावी ढंग से गहरे समुद्र में चली जाती है, ‘जीववैज्ञानिक पम्प’ के रूप में जानी जाती है।

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