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Indian science congress 2019

भारतीय विज्ञान कांग्रेस 2019 और शोध व विकास व्यय

भूगोल और आप

106वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ा कदम या यूं कहें कि एक बड़ी उपलब्धि की ओर अग्रसर हो रहा है। भारत अपना पहला मानव युक्त अंतरिक्ष यान ‘गगनयान वर्ष 2022 में अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है। जीएसएलवी एमके-III से तीन सदस्यों को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। 28 दिसंबर, 2018 को केंद्र सरकार ने लगभग 10,000 करोड़ रुपए तक के व्यय वाली इस परियोजना को मंजूरी भी दी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत विकास की नई ऊंचाइयां छूने वाला है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस भी विज्ञान के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का ही प्रतिफल है, पर यहां उपलब्धियों को गिनाने के बजाय भारत में विज्ञान के भविष्य पर वैज्ञानिक समुदाय चिंतन करने वाले हैं।

106वां भारतीय विज्ञान कांग्रेस 3-7 जनवरी, 2018 को जालंधर में आयोजित होना है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी करेंगे। यह विज्ञान कांग्रेस ‘भावी भारत-विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी’ थीम के साथ आयोजित हो रहा है। इस कांग्रेस के आयोजक भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन (आईएससीए) के मुताबिक ‘विज्ञान का अभी भी अन्वेषण किया जाना है, अभी भी कई रहस्यों पर से पर्दा उठाया जाना है तथा कई परिघटनाओं को अभी समझा जाना शेष है।’ यह अभिकथन भारतीय विज्ञान कांग्रेस की थीम के अनुरूप ही है। परंतु विज्ञान के क्षेत्र भावी शोध एवं वैज्ञानिक शोधों को प्रोत्साहन बहुत हद तक इसको मिलने वाली आर्थिक सहायता पर भी निर्भर करती है। और इस दृष्टिकोण से हमें भारत में वैज्ञानिक शोधों को देखने की जरूरत है।

निश्चित तौर पर भारत में वैज्ञानिक विषयों पर विचार विनिमय के लिए विज्ञान कांग्रेस एक आदर्श मंच उपलब्ध कराता है और इसमें इसे सफलता भी मिली है। परंतु यदि इसकी स्थापना के लक्ष्यों एवं शोध व विकास पर भारत में व्यय की स्थिति का यदि अवलोकन करें तो स्थिति उत्साहजनक नहीं प्रतीत होती। वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा के अनुसार विगत दो दशकों से भारत में शोध एवं विकास (आरएंडडी) पर व्यय जीडीपी का 0.6 से 0.7 प्रतिशत पर स्थिर रहा है। हालांकि आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि विगत दशक में शोध एवं विकास पर सकल व्यय (जीईआरडी) लगभग तीन गुणा हो गया है। वर्ष 2004-05 में यह व्यय 24,117 करोड़ रुपए था जो 2014-15 में बढ़कर 85,326 करोड़ रुपए हो गया और 2016-17 में इसके 1,04,864 करोड़ रुपए होने का अनुमान लगाया गया था। भारत में शोध एवं विकास पर कम व्यय के लिए एक प्रमुख कारण निजी क्षेत्रक की कम अभिरूचि रही है। वैसे देशों में जहां शोध एवं विकास व्यय अधिक है वहां सरकारी क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र का अधिक योगदान रहा है। जैसे कि दक्षिण कोरिया में आरएंडडी पर 73,195.5 मिलियन डॉलर के व्यय (पीपीपी डॉलर में) में व्यावसायिक क्षेत्र का योगदान 57,255 मिलियन डॉलर का था जबकि सरकारी क्षेत्र का योगदान 8207 मिलियन डॉलर का था। चीन में 370,589.7 मिलियन डॉलर के कुल व्यय में व्यावसायिक एवं सरकारी क्षेत्र का योगदान क्रमशः 286,453 मिलियन डॉलर व 58,564 मिलियन डॉलर था। वहीं भारत में कुल 48,063 मिलियन डॉलर के शोध व विकास व्यय में सरकारी क्षेत्र के 29,066.8 मिलियन डॉलर की तुलना में व्यावसायिक क्षेत्र का योगदान महज 1952 मिलियन डॉलर था (यूनेस्को)।

विभिन्न देशों में शोध एवं विकास पर व्यय

 देश       जीडीपी का प्रतिशत

द. कोरिया             4.3

इजरायल               4.2

जापान                   3.4

यूएसए                   2.7

चीन                       2.0

भारत                     0.8

(स्रोतः यूनेस्को)

एक अन्य पैमाना भी भारत में शोध में लोगों की रूचि की खराब स्थिति को दर्शाता है। यह है भारत में शोधार्थियों की औसत संख्या का। यूनेस्को के अनुसार भारत में प्रति दस लाख की आबादी पर शोधकर्त्ताओं की संख्या केवल 156 है। वहीं दक्षिण कोरिया में 6856, जापान में 5328, यूएसए में 4255 व चीन में 1096 है।

भारत की आर्थिक समीक्षा एवं यूनेस्को के डेटा अवलोकन व विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में शोध एवं विकास पर व्यय की स्थिति  संतोषजनक नहीं है। कोरिया, जापान एवं यूएसए में अधिक व्यय एवं निजी क्षेत्रों के अत्यधिक योगदान का परिणाम भी स्पष्ट दिखता है। विज्ञान (चिकित्सा, रसायन व भौतिकी) के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्कारों में इन देशों का दबदबा इसका उदाहरण है। यदि भारत में भी शोथार्थियों एवं शोध पत्रों की संख्या बढ़ानी है तो जीईआरडी भी बढ़ानी होगी और इसके लिए निजी क्षेत्रों को भी आगे आना होगा।

पृष्ठभूमिः भारतीय विज्ञान कांग्रेस ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन’ द्वारा आयोजित किया जाता है जिसकी स्थापना का श्रेय दो ब्रिटिश रसायनविदों प्रोफेसर जे.एल. सिमोनसेन एवं प्रो. पी.एस. मैकमेहॉन को जाता है। इसकी स्थापना ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर एडवांस्मेंट ऑफ साइंस की तर्ज पर भारत में वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिए किया गया। भारत में प्रथम विज्ञान कांग्रेस कोलकाता में (तत्कालीन कलकता) 15-17 जनवरी, 1917 के बीच एशियाटिक सोसायटी के परिसर में आयोजित हुआ और इसके अध्यक्ष थे न्यायमूर्ति आशुतोष मुखर्जी।

 

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