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भूमिगत डिफ्यूजर-ड्रिप सिंचाई का विकल्प!


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वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की एक्वेडक्ट वाटर रिस्क एटलस के अनुसार भारत विश्व के उन 17 देशों में शामिल है जो अति गंभीर जल दबाव का सामना कर रहा है और ‘डे जीरो स्थिति’-जहां लोगों को निर्धारित मात्रा में प्रतिदिन पानी उपलब्ध कराया जाता है, सन्निकट है। यह भी ज्ञात है कि भारत में ताजा जल (विथड्रॉल फ्रेशवाटर) का लगभग 90 प्रतिशत सिंचाई में उपयोग कर लिया जाता है और देश में सिंचित जल का 62 प्रतिशत भौमजल से पूरा किया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश का वाटर टेबल 0.3एम की दर से कम हो रहा है जो काफी चिंताजनक है। दूसरी ओर यह भी सही है कि भारत में संकट के समय कृषि क्षेत्र ही काम आया है और लोगों को सहारा दिया है, जैसा कि मौजूदा लॉकडाउन में रोजगार संकट के बीच प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराया गया। यह तभी संभव हो पाया जब भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध था। इसका मतलब यह है कि जल संकट को होते हुए भी हम कृषि क्षेत्र की उपेक्षा कतई नहीं कर सकते। ऐसे में उपलब्ध जल का दक्षता के साथ प्रयोग जरूरी है। यह तभी संभव है जब हम कुशल व अत्याधुनिक सिंचाई पद्धतियों का इस्तेमाल करे। तभी हम सतत कृषि व सतत खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। ड्रिप सिंचाई इसी दिशा में एक प्रयास रहा है। ड्रिप सिंचाई, जिसे टपकन सिंचाई पद्धति भी कहा जाता है, के तहत लघु व्यास वाली प्लास्टिक पाइप से मिट्टी में अति निम्न दर से पानी गिराया जाता है। इसमें पानी कुछ इस तरह से गिराया जाता है कि पौधा की जड़ें जहां तक है वहां तक पानी पहुंच सके। इससे पूरे खेत की सिंचाई के बजाय पौधों को लक्षित किया जाता है जिससे बड़ी मात्र में पानी की बचत होती है। हालांकि भारत में इसका इस्तेमाल अभी व्यापक नहीं हो पाया है। इसी बीच अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया में ड्रिप सिंचाई का एक अनोखा इंजीनियरिंग विकल्प सामने आया है जिसे ‘भूमिगत या अंडरग्राउंड डिफ्यूजर’ (Underground diffuser) नाम दिया गया है जो शुष्क मौसम और सूखा में भी पौधों को पानी की कमी नहीं होने देता है। इसके कई लाभ भी हैं।

क्या है अंडरग्राउंड डिफ्यूजर?

डिफ्यूजर उचित सिंचाई जल प्रबंधन तथा जल संरक्षण की नई तकनीक है जो वर्षासिंचित कृषि में अति उपयोगी है। इसके तहत डिफ्यूजर सिंचित पौधों एवं पेड़ों की जड़ के पास स्थापित किया जाता है जो शुष्क या सूखा के मौसम में पौधों की जड़ों को आवश्यक पानी उपलब्ध कराता है। यह डिफ्यूजर प्लास्टिक, धातु या सीमेंट या मिट्टी का बना होता है। नम मौसम में पानी इसमें संरक्षित होता है और शुष्क या सूखा के मौसम में पौधा या पेड़ की जड़ तक पानी पहुंचाया जाता है। जमीन के नीचे स्थापित डिफ्यूजर गुरुत्वाकर्षण के साथ परंपरागत जल दबाव के साथ काम करता है ताकि पेड़ को जरूरत के हिसाब से दक्षता के साथ पानी उपलब्ध हो सके। चूंकि इस तकनीक में पानी को मिट्टी के भीतर से पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है इसलिए इसमें वाष्पीकरण के रूप में जल हानि की संभावना समाप्त हो जाती है। यह जुताई को कम करता है और जल संरक्षण को बढ़ावा देता है। इस तकनीक के आविष्कारक के मुताबिक ड्रिप सिंचाई की तुलना में यह तकनीक 70 प्रतिशत कम जल का उपभोग करता है। यह सिंचाई तकनीक मुख्य रूप से पेड़ों, झाडि़यों एवं सब्जियों में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती है।

इस तकनीक के दो मुख्य प्रकार हैं; प्रत्याशित सिंचाई तथा जल अंतःक्षेपण (वाटर इंजेक्शन)। प्रत्याशित सिंचाई में पौधा के पास ही डिफ्यूजर को स्थापित किया जाता है ताकि वर्षा का पानी संग्रहित किया जा सके और पौधों तक पानी पहुंचाया जा सके। वहीं जल अंतःक्षेपण तकनीक में डिफ्यूजर के जल के स्रोत पास के बांध, झरना या नदियां होती हैं। इसमें जमा पानी का इस्तेमाल पेड़ों द्वारा दो से तीन वर्षों तक किया जाता है। इसलिए यह तकनीक पेड़ों (फलों इत्यादि) की सिंचाई में काफी उपयोगी सिद्ध होती है।

इस तकनीक के आविष्कारक और ट्यूनीशिया के कृषि विशेषज्ञ बालाछेब चहबानी डिफ्यूजर के पीछे की तकनीक को कुछ इस तरह बयां करते हैं, ‘छोटे बुलबुले के रूप में सिंचाई जल में मुख्यतः ऑक्सीजन, नाइट्रोजन एवं कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी वायु शामिल होती हैं। ये गैसें, जब पेड़ के जड़ क्षेत्र में पहुंचते हैं तब ये वहां की मिट्टी में माइक्रोब्स एवं लघु जीवन रूपों के विकास में व्यापक भूमिका निभाते हैं। ये लाभकारी लघु जीवन रूप अपने विकास व वंशवृद्धि के लिए गैसों का उपभोग करते हैं और ठोस या द्रव उर्वरकों को अणुओं में बदले देते हैं जिसे जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।’

भूमिगत डिफ्यूजर तकनीक का इस्तेमाल ट्यूनीशिया के अलावा मोरक्को जैसे देशों में भी किया जा रहा है। इस तकनीक के आविष्कारक एवं इसके समर्थकों का मानना है कि कई अफ्रीकी देशों में जहां जल संकट की स्थिति काफी विकराल रूप ले चुकी है और तमाम प्रयासों के बावजूद ‘डे जीरो’ जैसा संकट दस्तक दे रहा हो, वहां भूमिगत डिफ्यूजर जल व जैव विविधता संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है।

गिरते जल स्तर व बढ़ते जल संकट के बीच समस्त आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में उपलब्ध जल का कुशलता से उपयोग समय की मांग है। भूमिगत डिफ्यूजर सिंचाई की एक ऐसी ही तकनीक है जो शुष्क क्षेत्र व शुष्क मौसम में पौधों को पानी की कमी नहीं होने देती।

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