रामसर स्थल और सुंदरबन आर्द्रभूमि संरक्षण

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

पश्चिम बंगाल सरकार राज्य के सुंदरबन आरक्षित वन को रामसर स्थल का दर्जा दिलवाने का प्रयास आरंभ किया है। ‘द हिंदू‘ के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने इसके लिए भारत सरकार के माध्यम से रामसर आर्द्रभूमि सचिवालय को आवेदन देने का निर्णय किया है। यदि सुंदरबन को रामसर स्थल का दर्जा मिल जाता है तो इसके संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा मिलेगा। रामसर अभिसमय को ईरान के शहर रामसर में 1971 में स्वीकार किया गया था और यह 1975 में लागू हुआ।

गौरतलब है कि सुदंरबन, जो कि एक यूनेस्को प्राकृतिक विश्व विरासत स्थल है, की आर्द्रभूमि के अतिक्रमण के प्रति पर्यावरणविद् समय-समय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करते रहे हैं। सुंदरबन के जलाशयों का आर्द्रभूमि क्षेत्र 125 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है और अतिक्रमण की वजह से आर्द्रभूमि क्षेत्र में निरंतर कमी हो रही है। 1986 में जलाशयों की प्रतिशतता 30.6% थी जो कम होकर 26.3% हो गयी और 2011 में यह और कम होकर 24.7% रह गयी है (द हिंदू)।

पश्चिम बंगाल में आर्द्रभूमियों का अतिक्रमण

आर्द्रभूमि तथा जलराशियों के संरक्षण के लिए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा अधिनियमित कई विधानों के होते हुए भी जमीन के दलालों तथा उद्योग द्वारा राज्य में आर्द्रभूमियों का हथियाया जाना बदस्तूर जारी है।

घनी आबादी वाला और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार से बांग्लादेशी घुसपैठियों के लगातार प्रवेश की समस्या से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के पास अपनी आबादी के लिए जमीन की भारी कमी है। हिमालयी नदियों के अनुप्रवाह पथ के किनारे बसे इस इलाके में भारी मात्रा में गाद जमा हो जाती है जो समय के साथ नौगम्य नदी जलमार्गों को सदा के लिए अवरुद्ध कर देती है। इससे आर्द्रभूमि का निर्माण होता है जो अपनी ओर से शहरों एवं कस्बों के लिए बेशकीमती मोरी (सिंक) तथा प्राकृतिक जलभृत (अक्विफर) का कार्य करते हैं। तथापि, आर्द्रभूमि को ‘बंजर’ के रुप में देखने की सामान्य प्रवृत्ति ने इनमें से कई आर्द्रभूमियों को सदा के लिए गंवा दिया है। शहरी क्षेत्रों के विस्तार के साथ शहर के भीतर एवं कस्बों के नजदीक की आर्द्रभूमि खतरे में पड़ जाती है क्योंकि  जमीन के दलाल इन बची-खुची जगहों एवं आर्द्रभूमियों को हड़पने की ताक में रहते हैं।

लेकिन आर्द्रभूमि की क्षति, शहरी आबादी के लिए पर्यावरण से जुड़ी एक बड़ी आपदा है। आर्द्रभूमि के गायब होने का अर्थ है प्राकृतिक जलभृतों की क्षति, जो भूमिगत जल को नीचे ले जा सकता है जिसके कारण पानी की भारी कमी हो सकती है। देश के राज्यों में पश्चिम बंगाल सरकार ऐसी पहली सरकार है जिसने 1984 में ही आर्द्रभूमि की सुरक्षा के लिए एक व्यापक विधि (1984 में पश्चिम बंगाल अंतर्देशीय मात्सियकी अधिनियम के साथ) का अधिनियमन किया। पश्चिम बंगाल सरकार ने, पश्चिम बंगाल अंतर्देर्शीय मात्स्यिकी अधिनियम के अंतर्गत भरी जा रही जलराशियों एवं आर्द्रभूमियों पर कड़ा रुख अख्तियार किया था। 1993 में संशोधित यह अधिनियम 5 कोटा या इससे अधिक माप वाले ऐसे जल निकायों के भरान पर रोक लगाता है जिसमें कम से कम 6 महीने तक पानी रुका हो। जल (प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम की धारा 24 तथा पश्चिम बंगाल भूमि और भूमि सुधार अधिनियम 1956 की धारा 4डी का भी प्रयोग जलराशियों के भरान को रोकने के लिए किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल टाउन एण्ड कंट्री (नियोजन एवं विकास) अधिनियम 1979 किसी टंकी, तालाब अथवा जलराशि के भरान की मनाही कराता है।

इसके बावजूद भूमाफिया लगातार इन बेशकीमती जलभृतों को हथियाता रहा है। इसकी कार्यप्रणाली सरल है। भूमाफिया और असामाजिक तत्व किसी आर्द्रभूमि अथवा जलराशि में अथवा उसके आसपास कूड़े-करकट का बड़ा ढेर लगा देते हैं। कूड़ा-करकट जब एक बार  आर्द्रभूमि के हिस्से को अवरुद्ध करना शुरु कर देता है, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ट्रकों उड़नराख डाल दी जाती है। महीनों तक उड़नराख  पड़ी रहने के कारण अंततः सजीव पारिस्थितिकी तंत्र की मौत हो जाती है तथा आर्द्रभूमि गायब होकर जमीन के रुप में निर्माण का रास्ता साफ कर देती है। असंख्य ऐसी आर्द्रभूमियाँ हैं जिन पर अतिक्रमण और विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। दुर्गापुर के औद्योगिक  कस्बे में अंबुजा आर्द्रभूमि लोभी भूमाफिया की नवीनतम शिकार है। देवी चौधरानी गुफा अथवा भवानी पाठक टीला के निकट स्थित (एक किवदंती के अनुसार भवानी पाठक नामक डकैत ने स्थानीय जमींदार देवी चौधरानी को अपने दल का सरदार बनाया था और जिसके बारे में बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा एक उपन्यास लिखा गया है) यह आर्द्रभूमि शीतकाल मे प्रवासी पक्षियों के लिए एक स्वर्ग है।

अंबुजा आर्द्रभूमि में तकरीबन 50 अलग-अलग प्रजातियों की पक्षियाँ आती हैं जिनमें कम आवाज करने वाली बतखें, जेकाना, यूरहेन, लिटिल ग्रेब और हिरोइन की अनेक प्रजातियाँ, स्किमर और बंगले शामिल हैं। बरगद, साल, पलाश, इमली, आम, कटहल, पनई ताड़ और यूपेटोरियम, केसिया और लेंटाना झाड़ तथा जलीय पर्णाग और इसी प्रकार के अन्य पौधे से घिरी हुई यह आर्द्रभूमि पक्षियों, तितलियों और अनेक प्रकार के कीट पतंगों के लिए एक बड़ा आकर्षण है जो यहाँ आश्रय पाते हैं। प्रमोटरों के एक समूह ने वर्ष 2012 में इस आर्द्रभमि के एक हिस्से पर अतिक्रमण कर लिया था और इस पर बहुमंजिली इमारत खड़ी करने वाले थे। दुर्गापुर नगरपालिका ने मामले में दखल देकर बच्चों के पार्क तथा नौकायन परिसर के रुप में प्रयोग हेतु इसके चारों ओर चारदीवार खड़ी कर दी। तथापि इस आर्द्रभूमि के एक हिस्से पर एक फैक्ट्री का निर्माण हो चुका है जिससे पानी प्रदूषित होने और जैव विविधता को खतरा पैदा हो गया है।

आशा है कि सुंदरबन वन भूमि को रामसर आद्रभूमि का दर्जा मिल जाने से इसके अतिक्रमण पर विराम लग सकेगा जिससे आस-पास की पारिस्थितिकी को संरक्षित रखा जा सकेगा।

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