भारत में कृषि भूमि के उपयोग मे बदलाव

By: Staff Reporter
भारत में कृषि भूमि का उपयोग खेती के लिए न करके, उसका इस्तेमाल गैर-कृषि कार्यों के लिए होता है और इसे विकास का नाम दिया जाता है। यह न्याय संगत नहीं है।
भूगोल और आप

कृषि के लिए भूमि की प्रासंगिकता इस प्रकार समझी जा सकती है-पहला, कृषि एक गहन जमीनी क्रियाकलाप है जिसका अर्थ है कि उत्पादन के सापेक्ष कृषि के लिए गैर-कृषि क्रियाकलाप की तुलना में अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। दूसरा, कृषि में भूमि की गुणवत्ता का प्रति इकाई क्षेत्रफल की पैदावार पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है जबकि गैर कृषि क्रियाकलाप में उत्पादन पर इसका सीमित प्रभाव होता है। तीसरा, ग्रामीण इलाके में जमीन की मिलकियत, विशेषतः दुनिया के ऐसे इलाके में जहाँ का विकास बहुत कम है, और इसके साथ-साथ जमीन के मालिक का व्यक्तिगत सामाजिक स्तर व पहचान भी इस पर बहुत प्रभाव डालते है। इस प्रकार, कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव को बड़े आर्थिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सरलता से समझा जा सकता है; विशेषतः भारत में, जहाँ आज भी बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, बावजूद इसके देश की आय में कृषि का महत्व घट गया है।

ऐसे कौन से स्रोत हैं जिनसे गैर कृषि-भूमि को बढ़ाया…… फैलाया जा सकता है ? संभावनाएं कई हैं। एक संभावना तो बंजर या असिंचित भूमि के रूप में है जिसका ग्रामीण आजीविका पर बहुत कम या नहीं के बराबर प्रभाव होना चाहिए। इस प्रकार के आदान-प्रदान को प्रथम वरीयता के रूप में चिन्हित किया गया है। यदि बड़ी मात्रा में कृषि-भूमि का उपयोग गैर-कृषि क्रियाकलापों के लिए करना पड़ता है तो इसके अंतर्गत ऐसी भूमि को रखना चाहिए जो असिंचित हो और चाहे वह भूमि उपयोगी हो या अनुपयोगी हो। हालांकि इस प्रकार की भूमि ज्यादातर व्यक्तिगत अधिकार में होती  है तथा गांव के जो गरीब लोग मुख्यतः पशुधन पर निर्भर होते हैं उनके लिए यह भूमि वस्तुतः चरागाह का काम करती है। प्राथमिकता की योजना के अंतर्गत सिंचित भू-भाग को प्रधानता देनी चाहिए, जिस पर छोटे और सीमांत किसानों व भूमिहीन कृषि मजदूरों की आजीविका निर्भर होती है।

सार्वजनिक संपत्ति जैसे सामुदायिक वनों एवं चरागाहों का बहिर्वाह नहीं होना चाहिए क्योंकि गरीब भूमिहीन लोगों का जीवन न केवल इनमें उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है, बल्कि इसलिए भी कि व्यक्तिगत भूमियों पर जाने की मनाही के कारण केवल ये भूमियाँ ही उनके लिए ऐसा भू-भाग होती हैं, जिस पर उनका वैध, कानूनी व सामाजिक अधिकार होता है। ऐतिहासिक रूप से ये संसाधन सामूहिक क्रिया-कलापों को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं जो किसी समय में ग्रामीण समुदाय के गरीबों की राजनैतिक मोल-भाव की शक्ति को बढ़ाने का काम करते थे।

बड़े स्तर पर भूमि उपयोग के बदलाव की प्रवृत्ति

भूमि के उपयोग संबंधी बदलाव स्थान के अनुरूप व बहुत भिन्न रूपों में हो सकते हैं। एक सामान्य धारणा के अनुसार गरीबी व जनसंख्या वृद्धि भूमि उपयोग के बदलाव संबंधी मुख्य चालक हैं। हालांकि वैज्ञानिक शोध (एरिक लैंबिन एवं अन्य, 2001, ‘भूमि उपयोग व भूमि आच्छादन में बदलाव : कल्पनाओं के पार’ वैश्विक पर्यावरणीय  बदलाव; जी के चड्ढा एवं अन्य, 2004, ‘भूमि संसाधन- भारतीय कृषक की दशा: एक सहस्त्राब्दी अध्ययन’, कृषि मंत्रालय) । यह दिखाते हैं कि वर्तमान में इन बदलावों के लिए इनमें से कोई भी कारण नहीं है। इसके विपरीत, संस्थानीय तंत्र द्वारा उपलब्ध आर्थिक मौके इन बदलावों का वर्णन करते हैं। इसकी जड़ें देश के राज्यों में वर्तमान वर्षों में जो व्यक्तिगत निवेश (घरेलू और विदेशी दोनों) हुए हैं, उनमें हैं।

यह तथ्य चौंकाने वाला है कि वर्ष 2011-12 के अनुसार देश के कुल ज्ञात क्षेत्र का 9 प्रतिशत  से भी कम क्षेत्र गैर कृषि उपयोग के अंतर्गत आता है। जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा द्वितीय व तृतीय क्षेत्र का अंशदान है। आज भी कृषि एक भूमि गहन क्रियाकलाप है जबकि गैर प्राथमिक क्रियाकलाप में या तो भूमि की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और यदि पड़ती है तो बहुत कम (ई.कामर्स इसके अंतर्गत एक मामला है जो कि मुख्यतः एक आभासी क्षेत्र होता है) । दूसरे, जो भूमि  ‘कृषि’ के अंतर्गत दिखाई देती है, असल में वह भूमि कई बार गैर-कृषि क्रियाकलापों को बढ़ावा देती है। जैसे फसल कटाई के बाद के कार्य (व्यापार भी) और कृषीय वस्तुओं संबंधी कई प्रथम चरणीय क्रियाएं। बड़े स्तर के भूमि उपयोग में बदलाव संबंधी जरूरी बिंदु निम्नलिखित हैं-

  • हालांकि आजादी के बाद के शुरुआती दशकों की तुलना में गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र की बढ़त बाद के दशकों में कम रही। 90 के दशक के बाद के समय में देश ने पहली बार बड़े स्तर पर कृषि भूमि का कुल बहिर्वाह महसूस किया।
  • हालांकि 80 के दशक के बीच में बंजर एवं गैर कृषि योग्य जमीन तेजी से गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र से कम हुई किंतु बाद में यह कमी की दर मंद पड़ गई और गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र में बढ़त की भरपाई के लिए अयोग्य साबित हुई।
  • 90 के दशक तक कृषि भूमि व सिंचित भूमि (जोती गई भूमि) दोनों ही से कुल बहिर्वाह देखने को मिला। कृषि अंतर्गत एक बड़ा भू-भाग, जिसमें से 07 प्रतिशत कृषि भूमि (बहिर्वाह की औसत दर) कम होकर लगभग 128400 हेक्टेयर भूमि में जुड़ गई जबकि 0.035 प्रतिशत का कुल बहिर्वाह जोते गए क्षेत्र में से 54040 हेक्टेयर से जुड़ गया।
  • 60 के दशक में जंगल का क्षेत्र तेजी से बढ़ा और बाद के दशकों में इसकी दर में कमी आई। इसका मुख्य कारण इन संसाधनों के बचाव द्वारा ‘बंजर भूमि’ को उपस्थित जंगल भूमि में सम्मिलित कर देना था। जंगली संसाधनों का ‘सांख्यिकीकरण’ जो प्रायः गरीबों के हाशियाकरण से जुड़ा हुआ था। विशेषतः जनजातीय लोग से जो जंगलों व बंजर भूमि के वानस्पतिक संसाधनों पर निर्भर थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि संपूर्ण क्षेत्र जंगलों के अंतर्गत वर्गीकृत है लेकिन कृषि मंत्रालय के सांख्यकीय आंकड़ों के अनुसार यह शुद्ध वन आच्छादन के अंतर्गत नहीं है। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन अभिकरण के अनुसार जंगली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला असली क्षेत्र 209,000 हेक्टेयर है जो वर्ष 2011-12 के भूमि-उपयोग संबंधी आंकलन से कम है।
  • 60 के दशक से ही चरागाह क्षेत्रों में लगातार कमी देखी गई है। इस लगातार होने वाले बहिर्वाह से जंगली पशुधन पर गरीबों की निर्भरता को लेकर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

राज्यों की कहानियाँ

बड़े परिदृश्य से पता चलता है कि जुते हुए व गैर जुते हुए दोनों क्षेत्र से, बड़ी मात्रा में कुल कृषि भूमि बहिर्वाह  हुआ था। जिन राज्यों में इस प्रकार की प्रवृत्ति देखी गई, उनमें ग्रामीण आजीविका को लेकर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कृषि भूमि का बहिर्वाह का एक कारण बढ़ती हुई शहरीकरण की प्रक्रिया है तथा कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का गैर कृषि अर्थव्यवस्था में बदल जाना भी है। बड़े स्तर पर मान्य एक धारणा यह है कि न केवल यह अपरिहार्य है बल्कि इच्छित भी है। समयानुसार, विभिन्न वर्गों के प्राप्त राज्यस्तरीय आंकड़ों से पता चलता है कि गैर-कृषि जीडीपी या प्रति कैपिटा आय स्तर के हिस्से व गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र के हिस्से के बीच कोई संबंध नहीं है। असल में दोनों के बीच थोड़ा संबंध है। गुजरात व महाराष्ट्र जैसे राज्य जिनकी पीसीएन राज्य घरेलू उत्पाद दर काफी ज्यादा है, साथ ही द्वितीय व तृतीय श्रेणी क्षेत्र का भी राज्य घरेलू उत्पाद में बड़ा योगदान है। इन दोनों राज्यों का गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र में योगदान पूरे भारत के अन्य राज्यों से कम है। दूसरी ओर बिहार व असम जैसे राज्य हैं जिनका पीसीएन राज्य घरेलू उत्पाद स्तर कम तथा कृषि में राज्य घरेलू उत्पाद के रूप में योगदान तुलनात्मक रूप से ज्यादा है और साथ ही साथ गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र में योगदान पूरे राष्ट्रीय औसत से दोगुना है। इस तथ्य का हमारी कृषि भूमि के गैर कृषि भूमि में बदल जाने संबंधी सोच पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। गैर कृषि के अंतर्गत भूमि की इकाई में बढ़ोतरी का इन क्षेत्रों से प्राप्त उत्पादन की बढ़ोतरी पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। यदि इस बात को मान लिया जाए तो स्वीकृत सामान्य उद्देश्यों के उलट गैर कृषि आधारित कार्यों के लिए जमीनी अधिग्रहण के लिए दिखाई देने वाले उद्देश्य तुलनात्मक रूप से कमजोर दिखाई पड़ते हैं।

हालांकि, हम इस बात पर अब भी बहस कर सकते हैं कि एक राज्य के विकास-स्तर की निर्णायक समझ के लिए गैर कृषि उपयोग के अधीन क्षेत्र के सोपान आवश्यक नहीं हैं। बल्कि बदलावों की दर इस प्रकार के विचारों के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष:

भूमि अधिग्रहण व उससे जनित बेदखली के मुकाबले जो देश भर में व्याप्त विरोध व आंदोलनों के कारण देखने को मिले; 1991 के बाद के वर्षों में वे सबसे ज्यादा सम्मुख थे। 1991 के बाद की अवधि की मुख्य विशेषता कृषि भूमि का स्पष्ट बहिप्रवाह रहा है। कई राज्यों में खेती  वाली जमीन में भारी कमी, गैर कृषि क्षेत्रों में परिणामी सुधार से नहीं जुड़ी है। दूसरी ओर ऐसे भी राज्य हैं जिन्होंने कृषि भूमि में कमी के बगैर गैर कृषि क्षेत्रों में उच्च विकास दर प्राप्त की है।

नव उदार अवधि में ‘राष्ट्र राज्य’ की भूमिका में बदलाव को ‘विकास’ के इन मार्गों के साथ बहुत कुछ करना है। नव उदार सामाजिक व्यवस्था की मुख्य विशेषता प्रथमतः देश के भीतर और बाहर से निजी पूंजी के प्रवाह में भारी वृद्धि और द्वितीयतः पूंजी के जमीन से जुड़ने के तरीके से उत्पन्न जमीन के स्वामित्व में बदलाव, रही है (ए.जूमर्स, 2010, ‘वैश्वीकरण एवं जमीन का विदेशीकरण: मौजूदा वैश्विक भू-अपवंचन की वाहक सात प्रक्रियाएं’, द जरनल ऑफ पीजेंट स्टडीज; माइकल लेविएन, 2010, ‘द लैंड क्विश्चन: स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स एंड द पॉलिटिकल इकोनामी ऑफ डिस्पोजेशन इन इंडिया’, जर्नल ऑफ पीजेंट स्टडीज)।

जमीन का साझा स्वामित्व निजी स्वामित्व में बदला है अथवा अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में निजी हाथों, जो विशिष्ट रूप से छोटी आर्थिक इकाइयाँ हैं, से कुछ बड़े खिलाड़ियों के हाथों में गई हैं। तदुपरांत, कृषि भूमि खोने वाले कई राज्यों को पर्याप्त लाभ नहीं हुआ है क्योंकि प्रायः ये राज्य ‘विकास’ के लिए निजी निवेश लाने के लिए अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा करते हैं लेकिन उनमें मोलभाव करने की ताकत नहीं होती या संभवतः निजी व्यवसाय को दी गई जमीन के बदले समुचित लाभ सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति भी नहीं होती। इस निष्कर्ष का तार्किक विस्तार यह है कि किसी एक स्थान में जमीन से लाभ का एक बड़ा हिस्सा, भूमि रूपांतरण वाले स्थान के बनाए अन्य स्थानों को प्राप्त होता है।

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