दक्षिण ध्रुव व जलवायु परिवर्तन औऱ मानव समाज की सुरक्षा

दक्षिण ध्रुव व जलवायु परिवर्तन औऱ मानव समाज की सुरक्षा

वर्ष 2100 तक अंटार्कटिक प्रदेश में विस्तृत बर्फ की चादरें पूरी तरह पिघल चुकी होंगी, वहाँ का मानव समाज जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होगा।
भूगोल और आप

पृथ्वी प्रणाली विज्ञान शीर्षक के अंतर्गत उपलब्ध कराए गए विश्वसनीय प्रमाण के अनुसरण में मानव समाज आधारित जलवायु परिवर्तन की बहुमुखी चुनौती मानव समाज विज्ञानय मानवीय हस्तक्षेप के अभूतपूर्व स्तर के कारण जैव मंडल में हुए भारी रूपांतरण के परिणामस्वरूप शुरू हुए एक नए भूगर्भीय युग के पारिस्थितिकीय संदर्भ में ‘सुरक्षा के साथ-साथ संप्रभुता’  पर पुनर्विचार की मांग करते हैं तथा ऐसा करने के लिए उपयुक्त स्थिति भी व्याप्त है।

वैश्विक औसत की तुलना में आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों ही क्षेत्रों में तापवृद्धि भावी जलवायु परिवर्तन की दिशा में बैरोमीटर का काम करता है। समुद्री बर्फ, हिमनदों और ध्रुवीय वन्य जीवन पर बढ़ती तापवृद्धि का प्रभाव महत्वपूर्ण रूप में दिख रहा है। अंटार्कटिक अनुसंधान संबंधी वैज्ञानिक समिति (एससीएआर) के एक प्रतिवेदन के अनुसार अंटार्कटिक प्रायद्वीप में 87 प्रतिशत हिमनदों के आकार में कमी आ रही है। यह भविष्यवाणी की गई है कि वर्ष 2100 तक पश्चिमी अंटार्कटिक की बर्फ की चादरें पर्याप्त रूप से पिघल चुकी होंगी जिससे समुद्र के स्तर में 1.4 मीटर की वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप दक्षिणपूर्व एशिया सहित बहुत सारे तटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आयेगी। फलस्वरूप मानव समाज प्रभावित होगा।

वर्ष 1943 में अंटार्कटिक के 85 प्रतिशत क्षेत्र इंग्लैंड (यूके) आस्ट्रेलिया, फ्रांस, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, अर्जेटाइना और चिली द्वारा किए गए प्रादेशिकीय दावे के विषयाधीन थे। शीतयुद्ध के कारण आर्कटिक क्षेत्र का सैन्यकरण हुआ और अंटार्कटिक क्षेत्र के भीतर राजनीतिकरण हुआ। 1956 में अंटार्कटिक प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र में भारतीय हस्तक्षेप से प्रादेशिकीय दावों को चुनौती मिली तथा नाभिकीय परीक्षण जिसके कारण वैश्विक वातावरण प्रणालियों मानसून और मानव समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैए की संभावना के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की गई। भारत ने अंटार्कटिक की न्यासधारिता की वकालत की जिसका सभी दावेदार देशों द्वारा सफल प्रतिरोध किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय भूभौतिकी वर्ष (आईजीवाई) 1957-58 में अंटार्कटिक संधि सचिवालय (एटीएस) में प्रमुख विषय के रूप में वैज्ञानिक अनुसंधान की शुरुआत की गई। अंटार्कटिक संधि पर दिसम्बर 1959 में 12 आईजीवाई प्रतिभागी देशों ने हस्ताक्षर किए। संधि में अंटार्कटिक संधि क्षेत्र में विसैन्यीकरण कर दिया गया, इसे शांतिपूर्ण प्रयोजनों के लिए समर्पित किया गयाए नाभिकीय परीक्षण और रेडियोधर्मी सामग्री के निपटान का निषेध किया गया और अंटार्कटिक संधि परामर्शदात्री पक्षकारों (एटीपीसीजद) द्वारा निरीक्षण किए जाने का उपबंध किया गया। जिस सूक्ष्म तरीके से प्रादेशिकीय दावों और प्रतिदावों के औपनिवेशिक मानचित्र को अनुच्छेद में प्रभावी रूप से बनाए रखा गया है की, आलोचनात्मक समीक्षा किए जाने की जरूरत है। इस अनुच्छेद में न सिर्फ दावेदार देशों की स्थिति को सुरक्षित रखा गया है बल्कि दो, अर्द्ध दावेदारों, रूस और अमेरिका जिन्होंने विद्यमान दावों को मान्यता देने से मना कर दिया था किन्तु साथ ही भावी प्रादेशिकीय दावे करने के अधिकार सहित उनके सभी अधिकारों को भी बनाए रखा गया।

1970 के दशक तक व्यापक भूगर्भीय और जैवकीय अनुसंधान आधारित अंटार्कटिक संसाधनों की एक रूपरेखा उभरकर सामने आई। एटीसीपीज ने 1980 के दशक के पूर्वार्द्ध में अंटार्कटिक खनिजों से संबंधित प्रश्न उठाए और इसमें भारत 1983 में एक परामर्शदात्री सदस्य के रूप में शामिल हुआ। 1988 का अंटार्कटिक खनिज संसाधन गतिविधियों के विनियमन संबंधी अभिसमय (सीआरएएमआर) को प्रभावी नहीं किया जा सका तब 1989 में ऑस्ट्रेलिया ने यह घोषणा की, कि वह इस पर हस्ताक्षर नहीं करेगा क्योंकि वह सशक्तरूप से यह मानता है कि वहां पर कोई भी खनन नहीं किया जाना चाहिए। आस्ट्रेलिया ने अंटार्कटिक के लगभग 42 प्रतिशत क्षेत्र पर उसके दावे को सीआरएमआर द्वारा पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं किए जाने के बारे में भी चिंता व्यक्त की थी। एटीएस के अधीन आम सहमति के बारे में उत्पन्न संकट के कारण तात्कालिक तौर पर अंटार्कटिक संधि को पर्यावरणीय संरक्षा दिए जाने संबंधी नवाचार बनाए जाने का मामला मैड्रिड में 4 अक्तूबर 1991 को सम्पन्न हुआ। नवाचार के अंतर्गत कम से कम 50 वर्षों के लिए खनन पर रोक लगाई गई। अंटार्कटिक को ‘शांति और विज्ञान के लिए समर्पित एक प्राकृतिक भंडार’ के तौर पर नामित किया गया तथा अंटार्कटिक संधि के अधीन मानव समाज की  सभी मानवीय गतिविधियों को पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकनों के विषयाधीन रखा गया।

अंटार्कटिक भूराजनीतिक प्रभाव की प्रमुख मुद्रा के रूप में विज्ञान की भूमिका को जैव समृद्धि के माध्यम से पुनर्गठित किए जाने की संभावना है। यूरोपीय संघ द्वारा लिस्बन संधि के परिणामस्वरूप शीघ्र एटीएस के अधीन सदस्यता और सहभागिता के लिए पारम्परिक राज्य आधारित मानदंडों पर प्रश्न किया जा सकता है। दावेदारों द्वारा तटवर्ती राज्यों के रूप में अति संदिग्ध स्वचरित्रीकरण किए जाने के आधार पर अंटार्कटिक के आसपास विस्तारित मग्नतट क्षेत्र (इसीएस) के बारे में किए गए दावे यह दर्शाते हैं कि अंटार्कटिक संसाधन संबंधी भूराजनीति और अधिक जटिल हो जाएगी।

अंटार्कटिक को मानव समाज  के वैश्विक ज्ञान के तौर पर जोर-शोर से स्वीकार किए जाने तथा अंटार्कटिक के संबंध में एशिया की नई प्रोफाइल में डाले जाने की जरूरत है। न्यासधारिता के सामूहिक मानदंडों के स्थान पर विवादास्पद और खंडनीय प्रादेशिकता पर जोर दिए जाने की स्थिति को रूपांतरित किए जाने की चुनौती है ताकि पूर्व में शक्ति प्राप्त एटीएस पर्याप्त रूप से प्रभावी बना रहे जिससे अंटार्कटिक की संधि की उद्देश्यिका में विर्निदिष्ट अच्छे उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

“भारत ध्रुवीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी सहयोग के बारे में अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। अंटार्कटिक  मानव समाज की साझी विरासत और शांतिपूर्ण सहयोग के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रयोग के प्रतीक होने के कारण उसे भावी पीढ़ी के लिए संरक्षित किए जाने की जरूरत है।” भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री, श्री प्रणव मुखर्जी ने 11 मई 2007 को नई दिल्ली में भारत की मेजबानी में आयोजित 30वीं अंटार्कटिक संधि परामर्शदात्री बैठक (एटीसीएम) के समापन सत्र में अंटार्कटिक के साथ भारत के जुड़ाव का वर्णन करते हुए यह बात कही थी। अंटार्कटिक विज्ञान के प्रति भारत अपनी प्रतिबद्धता पर पूरी तरह से दृढ़ है और अनुसंधान परिणाम को अंतर्राष्ट्रीय तौर पर स्वीकार किया जाता है। भारत अंटार्कटिक संधि में विनिर्दिष्ट सिद्धांतों मानदंडों और मूल्यों के बारे में अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। वह मानव समाज के सर्वोत्तम हित में प्रभावी, सक्रिय और पारदर्शी तरीके से जलवायु परिवर्तन और जैवकीय समृद्धि सहित उभरती चुनौतियों के बारे में गौर करना चाहेगा। औपनिवेशिक युग के पश्चात भारत के गंभीर और क्रमबद्ध तरीके से अंटार्कटिक शासन से जुड़ाव दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र और उससे आगे के क्षेत्र के लिए मानव समाज विज्ञान संबंधी सुरक्षा के मानक सिद्धांतों को प्राप्त करने हेतु महत्वपूर्ण बना हुआ है।

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