पर्यावरण के लिए घातक है जैव विविधता ह्रास

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

भू-पटल  पर दिखाई देने वाली जीवों की विविधता अरबों वर्षों से हो रहे जीवन के सतत विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाये रखने के लिए जैव विविधता का होना आवश्यक है। लेकिन आधुनिक मानवीय क्रिया कलापों द्वारा जैव विविधता का निरंतर क्षय हो रहा है, जीवों की अनेक प्रजातियां लुप्त हो रही हैं या संकटापन्न हैं। जैव विविधता किसी विशेष क्षेत्र की समस्त जीवों, जातियों एवं परितंत्रों का संग्रह है अर्थात् किसी क्षेत्र में उपस्थित जीवों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या उस क्षेत्र की जैव विविधता है। यूएसए में 1987 में प्रकाशित ‘टेक्नोलॉजी असेसमेन्ट रिपोर्ट’ में जैव विविधता को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, ‘जीव जंतुओं में पायी जाने वाली विभिन्नता, विषमता तथा पारिस्थितिकी जटिलता ही जैव विविधता है’ ।

जैव विविधता शब्द का प्रयोग ई.ए.नोर्स एवं आर.ई. मेंकमैन्स द्वारा सर्वप्रथम 1980 में किया गया । जैव विविधता शब्द जो जीवों की विविधता का परिवर्तित शब्द है, का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी कीट विज्ञानी इ.ओ.विल्सन द्वारा 1986 में ‘अमेरिकन फोरम ऑन बायोलोजिकल डाइवर्सिटी’ के रिपोर्ट में किया गया है।

जैव विविधता की परिभाषा

वर्तमान समय में विश्व में समस्त जीवधारियों में से वर्णित जातियों की संख्या लगभग 18 लाख है जो वास्तविक संख्या के 20 प्रतिशत से भी कम है। पृथ्वी पर विद्यमान कुल जातियों का औसत लगभग 1.5 करोड़ है। ज्ञात जातियों में से लगभग 60 प्रतिशत कीटों के रूप में हैं, स्तनधारियों की लगभग 46950 जातियां ज्ञात है, पादप जातियां 27,50,000 हैं एवं कशेरूकियों की भी बड़ी संख्या है। ‘वैश्विक जैव विविधता सूचना सुविधा तथा जातियां- 2000’ जैसी परियोजनाओं के द्वारा किये गये अथक प्रयासों द्वारा पूर्व की तुलना में अब इस दिशा में खोज निरंतर जारी है अब तक भारत में पौधों की लगभग 49,000 एवं जंतुओं की लगभग 87,000 प्रजातियां होने का अनुमान है।

जैव विविधता का स्तर

वैज्ञानिक शब्दों में जैव विविधता जिन्स, जातियां और पारिस्थितिकी तंत्रों की समग्रता है। इस आधार पर जैव विविधता में तीन सोपान प्रबन्धी जैविक स्तर सम्मिलित हैं।

जीवों में विविधता आकारिकी, कार्मिकी तथा आनुवांशिक आधार पर पायी जाती है।  यह विविधता समष्टि के सदस्यों अर्थात एक ही प्रकार की जातियों में, समुदाय की विभिन्न जातियों के मध्य अथवा विभिन्न तंत्रों के सदस्यों के मध्य हो सकती हैं।

आनुवांशिक विविधता : यह किसी प्रजाति विशेष में एक समान जीव की विभिन्न पीढ़ियों में मिलने वाली विविधता होती है। एक जाति या इसकी एक समष्टि में कुल आनुवांशिक विविधता को जीन कोश कहते हैं। यदि किसी जाति में आनुवांशिक विविधता अधिक है तो यह बदलती पारिस्थितियों को अपेक्षाकृत सभी प्रकार से अनुकूल कर सकती है। यदि किसी जाति के सदस्यों में आनुवांशिक विविधता कम है तो उसके विलुप्त होने का खतरा उतना ही अधिक रहता है।

जाति विविधता : किसी पारिस्थितिकी तंत्र में या समुदाय विशेष में मिलने वाली विभिन्न प्रकार के जीवों की संख्या का विवरण जातिय विविधता है। किसी क्षेत्र में एक वंश की जातियों के मध्य जितनी भिन्नता मिलती है वह जातिय स्तर की जैव विविधता दर्शाती है। विषुवत रेखिय सदाबहार वनों में सर्वाधिक जातिगत विविधता पायी जाती है।

पारिस्थितिकी तंत्र विविधता : किसी क्षेत्र में जैविक समुदायों की विविधता व जटिलता ही पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता कहलाती है। आनुवांशिकी तथा जातिय विविधता की तुलना में पारिस्थितिकी तंत्र विविधता का मापन कठिन है। 

जैव विविधता का महत्व

प्रकृति में जीवन के लिए जैव विविधता का अत्यधिक महत्व है। वनस्पति एवं प्राणियों के साथ स्वयं मानव जाति के लिए पृथ्वी पर जैव विविधता बने रहना आवश्यक है। जैव विविधता समस्त जीवों की साझी संपदा है, जिसे बचाये रखना विश्व समुदाय का दायित्व है। जैव विविधता के महत्व को निम्न रूपों में देख सकते हैं रू

(क) उत्पादक एवं उपभोगात्मक उपयोग : प्रकृति विभिन्न जीवों की उत्पादक है तथा भिन्न-भिन्न पादप व प्राणी होंगे तो उनसे प्राप्त होने वाली विविधता भी उतनी ही अधिक होगी। इसी कारण विभिन्न प्रकार के वनोत्पाद व पशु उत्पाद प्राप्त होते हैं। मानव आदिकाल से लेकर ही अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु जीन जगत पर निर्भर करता है तथा जीवन निर्वाह हेतु भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जीन जगत पर निर्भर है। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण जैव विविधता घटती जा रही है, फलस्वरूप उत्पादक एवं उपभोगात्मक उपयोग पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है।

(ख) पारिस्थितिक मूल्य: जैव विविधता का सर्वाधिक महत्व पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखना है क्योंकि पारिस्थितिक संतुलन में समस्त जैविक घटकों का विशिष्ट योगदान होता है। उत्पादकए उपभोक्ता एवं अपघटक के रूप में सम्मिलित पादप एवं प्राणी पारिस्थितिक तंत्र के संचालन के आधार होते हैं। इनमें से किसी भी जाति-प्रजाति के जीवों पादपों की संख्या घटने पर पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती है। अतः पारिस्थितिक संतुलन के लिए जैव विविधता का बना रहना आवश्यक है।

(ग) सामाजिक मूल्य : विभिन्न जीव जंतुओं को विश्व मानव समुदाय का अभिन्न अंग माना गया है। प्राचीन समाज में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा जीवन शैली में निहित है। वृक्षों की पूजा करनाए नदियों को माता तुल्य मानना, जीवों के प्रति दया भाव रखना हमारे सामाजिक मूल्यों में समाहित है। वृक्ष काटना, जल स्रोतों को दुषित करना तथा जीव जंतुओं के प्रति क्रूरता को पाप एवं निंदनीय समझा जाता था, लेकिन वर्तमान में जेविक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन होने लगा है। आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा में समाज के सामाजिक जीवन मूल्य पीछे छूट रहे हैं। विश्व की कई जन जातियों के जीवन का आधार, रीति रिवाज प्रत्यक्षत: जंगलों पर आधारित हैं।

(घ) नीतिपरक मूल्य : प्राचीनकाल से ही जैव विविधता को बनाये रखना मानव के नीति परक मूल्यों में सम्मिलित रहा है। इस विविधता का आचरणगत मूल्य भी है। विभिन्न जीव जंतुओं के विशिष्ट गुणों ने मानव को अनुकरण हेतु प्रेरित किया है। पंचतंत्र आदि साहित्य में उल्लेखित वन्य प्राणियों की नीति कथाएं प्रेरणास्पद हैं। हिरण जैसी चपलता, शेर जैसी निडरता, बगुले जैसी एकाग्रता, काग जैसी चेष्टा आज भी मानव आचरण के प्रतिमान समझ जाते हैं। तुलसी आदि विभिन्न पेड़-पौधों में देवी-देवताओं का वास तथा जंतुओं को उनका वाहन मानकर उनके संरक्षण को सम्पूर्ण समाज का नैतिक दायित्व समझा जाता है।

() सौन्दर्यगत मूल्य: प्रकृति प्रेमी मानव को सदैव प्रकृति की गोद सुखद लगती है। वनए उपवनए नाना प्रकार के जीव जन्तु प्राकृतिक सौन्दर्य के पर्याय हैं। प्राकृतिक परिवेश को देख सभी का मन मुग्ध हो जाता है। कोयल की कूक, कूलांचे भरते हिरण के छोने, चिड़ियों की चहचहाहट, पवन के झोंको से झूलते विशाल वृक्ष, पपीहे की पी-पी भला किसका मन नहीं मोह लेती है। जैव विविधता बनी रहेगी तो प्राकृतिक सुषमा बनी रहेगीं। जैव विविधता से सम्पन्न स्थल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सैलानियों की पहली पसन्द हैं।

जैव विविधता को खतरा

पृथ्वी पर ज्ञात लगभग 4 करोड़ जातियों में से प्रति वर्ष लगभग 1000 जातियों का मानवीय क्रिया कलापों के कारण विलोपन हो रहा है। विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों का अन्धाधुंध दोहन, प्रदूषण, अत्यधिक कृषि, विदेशी जातियों का आगमन एवं उनका अतिशोषण तथा आवास का ह्रास एवं विखंडन इसमें शामिल है।

नैसर्गिक विलोपन:  पर्यावरणीय दशाओं में परिवर्तन से कुछ जातियां अदृश्य हो जाती हैं और अन्य जो बदलती हुई परिस्थितियों के लिए अधिक अनुकूलित है उनका स्थान लेती हैं। जातियों का यह ह्रास जो भूगर्भी अतीत से अत्यन्त धीमी दर से हुआए नैसर्गिक विलोपन है।

जैव विविधता संरक्षण

विश्व में जैव विविधता के निरंतर ह्रास को देखते हुए इसका संरक्षण नितान्त आवश्यक है। जीव मंडल एवं पारिस्थितिक तंत्रों की सामान्य क्रियाशीलता के लिए जीव जातियों की विविधता बनी रहनी चाहिए। संकटग्रस्त जातियों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर अनेक प्रयास किये जा रहे हैं।

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