जैव विविधता में महत्वपूर्ण समुद्री पर्यावरण व संसाधन

भूगोल और आप

समुद्री पर्यावरण जिसमें महासागर और सभी सागर तथा समीप के तटवर्ती क्षेत्र शामिल हैं- वैश्विक जीवन समर्थन प्रणाली का एक अनिवार्य संघटक और एक सकारात्मक परिसम्पत्ति है जो संपोषित विकास का अवसर प्रदान करता है। समुद्री कानून संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (यूएनसीएलओएस)  में परिलक्षित अंतर्राष्ट्रीय कानून राज्यों के अधिकार और उनकी बाध्यताएं निर्धारित करते हैं तथा तटवर्ती और समुद्री पर्यावरण तथा इसके संसाधनों की रक्षा तथा संपोषित विकास करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय आधार प्रदान करता है (कार्यसूची 21ए यूएनसीईडीए 1992 का अध्याय 17) ।

भू-आकृति और जलवायु कारकों के संयोजन तथा भारतीय तटरेखा से लगती हुई नदियों द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले पोषक तत्वों के कारण यह अपवाद स्वरूप अत्यधिक उत्पादात्मक और जैव विविधता की  दृष्टि से समृद्ध प्रायद्वीप बन जाता है। इससे मैंग्रोवों, प्रवालभित्तियों, समुद्री घास के तलों और जैव विविधता के विशाल क्षेत्रों को सहायता मिलती है। जबकि, मत्स्ययन क्षेत्र के वाणिज्यीकरण और अत्यधिक पूंजीकरण के साथ ही घरेलू तथा निर्यात दोनों ही बाजारों में समुद्री उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण पारिस्थितिकीय विनाश का उच्च जोखिम विद्यमान है। इसलिए, समुद्री मछलियों का विवेकपूर्ण प्रबंधन करना तथा संपोषित पैदावार सुनिश्चित करने हेतु तटवर्ती जोन प्रबंधन में मत्स्ययन को समेकित करना और साथ ही जोखिमग्रस्त क्षेत्रों और प्रजातियों का संरक्षण करना महत्वपूर्ण है।

भारत के समुद्री सजीव संसाधन

भारत में 8118 किमी लम्बी तटरेखा और 2.02 मिलियन वर्ग किमी तक विस्तारित अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) है। भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में लगभग 225 मिलियन लोग निवास करते हैं। तटवर्ती जोन से देश के बड़े भागों में व्याप्त समुद्री संसाधनों को सहायता मिलती है और इसमें समुद्र के किसी भी भाग की तुलना में सर्वाधिक जैवी विविधता मौजूद होती है।

समुद्री मत्स्ययन क्षेत्र में 58 प्रतिशत संभावित पैदावार 50 मीटर गहरे जोन, 35 प्रतिशत पैदावार 50-200 मीटर गहरे जोन और शेष 7 प्रतिशत 200 मीटर से आगे के जोन में होते हैं। कुल अनुमानित समुद्री मछली की पैदावार के लगभग 75 प्रतिशत भाग का दोहन किया जाता है और मुश्किल से 25 प्रतिशत पैदावार भविष्य के दोहन के लिए छोड़ दी जाती है, जहां 0-50 मीटर की गहराई तक लगभग सम्पूर्ण संसाधनों का अधिकतम संपोषित स्तर तक दोहन किया जाता है।

सजीव समुद्री संसाधनों के लिए खतरा

भारत का पर्यावरण और समुद्री संसाधनों का स्वास्थ्य चिंता के प्रमुख क्षेत्र हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: अवैध, अविनियमित और बिना जानकारी के विनाशकारी और असंपोषित मछली पकड़ने के तरीकों को अपनाकर तटवर्ती समुद्री सजीव संसाधनों का असंपोषित दोहन इसके अलावा प्रदूषण के भूआधारित स्रोत .असंसाधित घरेलू, औद्योगिक और कृषि अवशिष्टों आदि का विसर्जन और इस मुद्दे से जुड़ा औद्योगिक विकास इसमें शामिल है। मैंग्रोवों, प्रवालभित्ति तलों, आर्द्रभूमि/लैगून पारिस्थितिकी प्रणाली, कछुए के अंडे सेने के स्थानों और समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों जैसे – महत्वपूर्ण अधिवासों का नुकसान जिससे जैव विविधता का नुकसान होता है, इनके कारक हैं ब्लास्ट जल निकासियां, महासागरीय मलबे आदि के माध्यम से तेल रिसाव, विदेशी प्रजातियों को लागू किए जाने सहित प्रदूषण के सागर आधारित स्रोत। महत्वपूर्ण तटवर्ती अधिवासों के मामले में संशोधन सहित वास्तविक परिवर्तन के कारण नदमुहाने के मुख पर भारी मात्रा में रेत जमा हो गए हैं जिनके परिणामस्वरूप इन जल क्षेत्रों में भूआधारित अवशिष्ट पदार्थों का जमाव हो रहा है जो जैव विविधता के लिए हानिकारक है। । प्रवालभित्तियों और मैंग्रोवों को क्षति पहुंचाई जाती है और बहुत सारे तटवर्ती क्षेत्रों में सीमा से अधिक मात्रा में दोहन हो रहा है। समुद्री जीवन और लैगून, नदमुहाने, मैंग्रोवों, तटवर्ती आर्द्रभूमि जैसे तटवर्ती अधिवासों के बीच नाजुक संतुलन लगभग सभी स्थानों पर छिन्न-भिन्न हो गया है। समुद्री स्तनपायी की लगभग 5 प्रजातियों, समुद्री कछुए की 5 प्रजातियों, हेमी कार्डेडेट की 1 प्रजाति सेफालो कार्डेडेट, एकीनोडर्म्स की 6 प्रजातियों, जाइफोसुडान की 2 प्रजातियों, मोलस्क की 15 प्रजातियों, केकड़े की 10 प्रजातियों और एचिराइड और ब्राचीपोड की 1-1 प्रजातियों के लिए अधिवास के विनाश और अत्यधिक दोहन के कारण खतरा पैदा हो गया है (वन और पर्यावरण मंत्रालय, 2000)। आईयूसीएन मानकों पर आधारित देश के मैंग्रोव क्षेत्रों में पायी जाने वाली समुद्री मछलियों की 52 प्रजातियों में से 9 प्रजातियों की स्थिति नाजुक है और 2 प्रजातियां संकटग्रस्त हैं तथा 41 अकशेरूकी प्रजातियों में से 4  की स्थिति नाजुक है और 1 प्रजाति गंभीर रूप से संकटग्रस्त है।

समुद्री संरक्षित क्षेत्र  (एमपीएज)

वर्ष 2004 में जैविक विविधिता संबंधी अभिसमय (सीबीडी) पक्षकार सम्मेलन की सातवीं बैठक में इस बात पर सहमति कायम हुई कि समुद्री और तटवर्ती संरक्षित क्षेत्रों को एक व्यापक समुद्री और तटवर्ती प्रबंधन कार्यढांचा के रूप में कार्यान्वित किया जाना समुद्री और तटवर्ती जैव विविधता तथा संसाधनों के संरक्षण और संपोषित उपयोग के लिए अनिवार्य साधनों में से एक है। समुद्री संरक्षित क्षेत्र (एमपीएज) जलीय जैव विविधता संरक्षण और परिरक्षण; अधिवास संरक्षण; संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण;  बहुपयोगी प्रबंधन; संसाधनों और जैव विविधता के संपोषित निष्कर्षनीय उपयोग; सांस्कृतिक-पारिस्थितिकीय/ समाजिक संरक्षा; प्रबंधन संघर्ष, आर्थिक लाभ बढ़ाने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और ‘पारिस्थितिकी प्रणाली दृष्टिकोण’ को लागू करने तथा संसाधन संरक्षण और प्रबंधन में पूर्व सतर्कता दृष्टिकोण को अपनाने के साधन हैं (आईसीएसएफए 2008)।

भारत के तटीय क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण हेतु केन्द्रीय मंत्रालय और राज्य के मत्स्ययन एवं वन्यविभागों के बीच और अनुसंधान संस्थानों तथा गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग और समन्वय में सुधार किए जाने की जरूरत है। समुद्री और तटवर्ती सजीव संसाधनों जिनसे तटवर्ती एवं मत्स्ययन संसाधनों में लगे मछुआरा समुदायों के अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों एवं संहिताओं के अनुरूप अधिकारों तक अधिमानतापूर्ण पहुंच और संरक्षण सुनिश्चित की जा सके, संरक्षण उपयोग और प्रबंधन हेतु एक समेकित और सहभागितापूर्ण कार्यढांचा निर्धारित किए जाने की जरूरत को समझना अनिवार्य है।

वैश्विक जलवायु परिवर्तन समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिकीय प्रणालियों को व्यापक तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। ये परिवर्तन सबसे गर्म वर्षों के दौरान हो रहे हैं जो कि इस बात के संकेत हैं कि  समुद्री पारिस्थितिकीय प्रणालियां धीरे-धीरे बदल रही हैं (खाद्य और कृषि संगठनए 2009)। सामान्य तौर पर गर्म जल में रहने वाली प्रजातियों में ध्रुवों की दिशा में विस्थापित होने और अधिवास के आकार तथा उत्पादकता के बारे में परिवर्तन को महसूस करने की प्रवृति होती है। प्रजातियों के हमलों के खतरों और वेक्टर जनित रोगों  के बढ़े हुए जोखिम अन्य चिन्ता के विषय हैं।

अब वैश्विक स्तर पर प्रवालों के लिए जलवायु परिवर्तन एक बढ़े हुए गंभीर खतरों के तौर पर उभर रहा है। यदि जलवायु परिवर्तन संबंधी भविष्यवाणी सही साबित हो जाती है तो अगले 50 वर्षों के भीतर अधिकतर प्रवाल प्रणालियां विनाश को प्राप्त हो जाएंगी जो जैव विविधता के लिए घातक होगा। समुद्र की सतह के तापमान में आवधिक वृद्धि (अन्य प्रकार के दबाव) होने के कारण प्रवाल विरेचन एक संभावित प्राकृतिक घटना हो सकती है। जब प्रवालों पर दबाव पड़ता है तो उसके कारण ष्विरेचनष् की घटना होती है जिसमें पौलिप से सीम्बयोटिक शैवाल नष्ट हो जाते हैं। प्रवाल सामान्यत: जल के कम तापमान 26 डिग्री  सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस  के दौरान बचा रह पाता है और सामान्य से कुछ ही डिग्री तापमान बढ़ जाने पर उसके स्थायित्व के लिए असामान्य हो जाता है।

प्रवाल असंख्य समुद्री जीव-जन्तुओं को भोजन और अधिवास उपलब्ध कराते हैं और उनको होने वाली क्षति का सीधा प्रभाव समुद्री जीवन के जटिल तंत्र पर पड़ता है जो प्रवालों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। प्रवाल भित्तियों के विनाश के परिणामस्वरूप इन पारिस्थितिकी प्रणालियों से जुड़ी मछलियों की संख्या में अत्यधिक परिवर्तन हो सकता है। जब प्रवाल भित्ति का क्षय हो जाता है तो बहुत सारे प्रवाल मर जाते हैं और उनके स्थान पर शैवाल की संख्या काफी बढ़ जाती है तथा प्रवालभक्षी मछलियों के बदले शैवालभक्षी मछलियां पैदा हो जाती हैं। यदि भित्तियों का आगे और विनाश होता हैए तो भित्ति के अन्दर रहने वाली मछलियों की प्रजातियां पूरी तरह से नष्ट हो सकती हैं और उनके स्थान पर पेलाजिक प्रजातियां पैदा हो सकती हैं। अंततः प्रवालोंए मछलियोंए कवचधारी मछलियों और अन्य प्रवाल अधिवासियों की जैव विविधता का विनाश होता है।

केन्द्रीय समुद्री मत्स्यन अनुसंधान, कोच्ची द्वारा किए गए अध्ययनों में जलवायु परिवर्तन की स्थिति में समुद्री जैव विविधता  पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं: उच्च तापमान पर फाइटो प्लवक की वृद्धि और प्रजातियों की संरचना में परिवर्तन; लघु पेलाजिकों – ऑयल सारडाइन और भारतीय मैकरेल- का उत्तरी दिशा में वितरण सीमा का विस्तारय अधिवास की गहराई का विस्तार; समुद्री सतह के गर्म होने के कारण भारतीय मैकरेल का अधिक गहरे जल में चला जानाय मछलियों के अंडे देने के मौसम में बदलाव; कतिपय प्रजातियों के प्रवासी पैटर्न में बदलाव; और ऋतुविज्ञानी परिवर्तन।

इस प्रकार के परिवर्तन से क्षेत्र में जीवों की नई मिश्रित प्रजातियां विकसित होने, नए शिकार, मांसभक्षियों, परजीवियों, रोगों और प्रतिस्पर्धियों के समायोजन की संभावना है जिसके परिणाम स्वरूप पारिस्थितिकी प्रणाली संरचना और कार्यक्रम में परिवर्तन होना निश्चित है। इन परिवर्तनों के कारण मछलियों के प्रकार और मूल्य भी प्रभावित हो सकते हैं।

यद्यपि सामान्य तौर पर जलवायु परिवर्तन के केवल नकारात्मक प्रभाव ही  जैव विविधता पर पड़ते हैं किन्तु संपोषणीयता को बढ़ाने की दिशा में इसका अतिरिक्त सकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। उदाहरण के लिए विद्यमान सुशासन और प्रबंधन सिद्धान्तों तथा दृष्टिकोणोंए जो कि संपोषित विकास की कुंजी हैंए लागू करके जलीय-संसाधन पारिस्थितिकीय प्रणालियों, मत्स्ययन और जल कृषि उत्पादन प्रणालियों तथा जल संसाधन पर निर्भर समुदायों की सहनीयता एवं अनुकूलन क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है।

समुद्री सजीव संसाधनों से उपलब्ध जैव विविधता पर जलवायु परिवर्तन के भावी प्रभावों को अभी भी ठीक ढंग से नहीं समझा जा सका है। रचनात्मक अनुकूलन से संबंधित विस्तृत कार्यनीतियों को समझना और बढ़ावा देना तथा विद्यमान नीति, कानूनी और प्रबंधन कार्य ढांचाओं के साथ उनके सामंजस्य से इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकेगा और अवसरों में वृद्धि की जा सकेगी। समुद्री पर्यावरण से खाद्य और आजीविका सुरक्षा के सतत् प्रावधान को बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अतिरिक्त रूप से बहुस्तरीय ढंग से समझने तथा खाद्य और आजीविका सुरक्षा में सजीव समुद्री संसाधनों के योगदानों को समेकित करने की जरूरत पड़ेगी (खाद्य और कृषि संगठन, 2009)। इसके अलावाए अनुसंधान, प्रशिक्षण और शैक्षणिक नेटवर्क के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर सूचना में अंतर क्षमता निर्माण की संबंधी जरूरतों की पहचान किए जाने और उनका समाधान किए जाने की जरूरत है।

मत्सययन, तटवर्ती जोनों और जल क्षेत्रों के लिए विद्यमान प्रबंधन की समीक्षा किए जाने की जरूरत है और जहां उपयुक्त हो उनका और आगे विकास किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनमें संभावित जलवायु परिवर्तन के प्रभावोंए उन्हें मिटाने और उनके अनुकूल कार्यवाही करने के प्रावधान शामिल हैं। व्यापक आयोजना और कार्यनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ाव की भी पहचान कि जाने तथा उन्हें समायोजित किए जाने की जरूरत है।

निष्कर्ष

भारत को एक विशाल देश होने के नाते निम्नलिखित क्षेत्रों में क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों पर नए दृष्टिकोणों को समेकित करने की जरूरत हैः अनन्य आर्थिक क्षेत्रों सहित तटवर्ती क्षेत्रों के समेकित प्रबंधन और संपोषित विकास; समुद्री पर्यावरण की संरक्षा; गहरे समुद्र में समुद्री सजीव संसाधनों के संपोषित उपयोग और संरक्षण; राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार के अधीन गहरे समुद्र में समुद्री सजीव संसाधनों के संपोषित उपयोग और संरक्षणय समुद्री पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन के लिए व्याप्त महत्वपूर्ण अनिश्चितताओं का समाधान; क्षेत्रीय सहयोग और समन्वय सहित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूती प्रदान करना; छोटे-छोटे द्वीपसमूहों का संपोषित विकास। समुद्र, सागर, महाद्वीप और तटवर्ती क्षेत्र पृथ्वी की पारिस्थितिकी प्रणाली के एक समेकित एवं अनिवार्य संघटक हैं और वैश्विक खाद्य सुरक्षा एवं संपोषित आर्थिक समृद्धि लाने तथा कई राष्ट्रों विशेषकर विकासशील देशें की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

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