जैव विविधता संरक्षण औऱ संबंधित मुद्दों पर विचार

भूगोल और आप

जैव विविधता के अत्यधिक दोहन से इसके संरक्षण में आर्थिक लागत का लगना निश्चित है और इस संदर्भ में प्राथमिक संरक्षकों के अधिकारों को मान्यता दिया जाना तथा उन्हें पुरस्कृत किया जाना महत्वपूर्ण है। जैव समृद्धि के युग की ओर का रास्ता साझे लाभ की नैतिकता और साम्यता के सिद्धान्तों से जुड़ा है। जैव विविधता का संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के दो सिरे हैं अर्थात एक तत्स्थानी संरक्षण और दूसरा अन्य स्थानों पर संरक्षण। दोनों ही मामले में राजनैतिक एवं सार्वजनिक तौर पर ध्यान तथा समर्थन दिए जाने की जरूरत है। हालांकि बड़े पैमाने पर जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं तथा पुरुषों द्वारा किए जा रहे तत्स्थानी कृषि संरक्षण कार्य को मान्यता नहीं मिल पा रही है और ना ही उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है।

वैश्विक  खाद्य सुरक्षा की स्थिति एक गंभीर चरण में पहुंच रही है। मांग और आपूर्ति के बीच अंतर व्याप्त होने के कारण गेहूँ चावल, मक्का और अन्य खाद्य फसलों की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बढ़ रही हैं। पेट्रोलियम के मूल्य तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके परिणाम स्वरूप ईंधन उत्पादन के लिए फार्म भूमि तथा अनाज दोनों के उपयोग में परिवर्तन हो रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित आइओवा राज्य को विश्व के लिए खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने वाले राज्य के रूप में जाना जाता था, इसे अब स्वयं को ऐसे राज्य जो विश्व के लिए ईंधन उपलब्ध कराता हैए कहे जाने पर गर्व महसूस होता है। इन कारकों को मिलाकर जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप सूखा बाढ़ कीट और महामारी पैदा हो रही है। आगेए समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण तटवर्ती क्षेत्रों में कृषि और समुदायों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। इस संदर्भ में जैव विविधता का संरक्षण और उसके संपोषित एवं समुचित उपयोग के तात्कालिक उपाय करना जरूरी हो गया है। इसलिएए जैव विविधता के संरक्षण और उपयोग से संबंधित कुछ प्रमुख मुद्दों के बारे में विचार करना उपयोगी होगा।

जैव विविधता का संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के दो सिरे हैं अर्थात एक तत्स्थानी संरक्षण और दूसरा अन्य स्थानों पर संरक्षण। दोनों ही मामले में राजनैतिक एवं सार्वजनिक तौर पर ध्यान तथा समर्थन दिए जाने की जरूरत है। हालांकि बड़े पैमाने पर जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं तथा पुरुषों द्वारा किए जा रहे तत्स्थानी कृषि संरक्षण कार्य को मान्यता नहीं मिल पा रही है और ना ही उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है। इसी क्षेत्र में जैव-विविधता जिसका खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा के मामले में महत्वपूर्ण योगदान है, का संरक्षण इसी क्षेत्र में निहित है। यह जैव विविधता संरक्षण का सर्वाधिक मूल्यवर्धित संघटक है चूंकि स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित सामग्री निरीक्षण, परिश्रम और अनुभव के माध्यम से वांछनीय गुणों के लिए चयन एवं ज्ञानवर्धक दोनों ही प्रक्रियाओं से गुजरती है। फिर भी खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा किसानों के अधिकार की संकल्पना और जैव विविधता संबंधी अभिसमय (सीबीडी) को बढ़ावा दिए जाने तक इस संगठन की ओर बहुत कम ध्यान गया था, उसकी सराहना की गई जिनमें जनजातीय और ग्रामीण परिवारों की संरक्षण परंपराओं को स्पष्ट मान्यता प्रदान की गई।

सीबीडी का अनुच्छेद 8 (र) संविदा करने वाले पक्षकारों से पारंपरिक जीवन शैलियों को अपनाने वाले स्वदेशी और स्थानीय समुदायों के ज्ञान, नए उपायों और व्यवहारों का सम्मान करनेए संरक्षित करने और बनाये रखने का आदेश देता है। इसमें इस प्रकार के ज्ञात, नए उपायों और व्यवहारों के उपयोग से होने वाले लाभों की न्यायसंगत साझेदारी करने की भी बात कही गई है। प्राथमिक संरक्षकों और पारंपरिक ज्ञान और जानकारी रखने वालों के साथ जैव विविधता के वाणिज्यिक दोहन के आर्थिक लाभों की साझेदारी हेतु किसी क्रियाविधि पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं होने के कारण विकासशील देशों के अन्दर व्यापार और उद्योग द्वारा जैविक चोरी किए जाने के आरोपों की संख्या बढ़ रही है। यदि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाओं और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों द्वारा सीबीडी के अनुच्छेद 8(र) सिद्धांतों का अक्षरशः पूरी भावना के साथ पालन किया जाए तो जैविक चोरी की इन घटनाओं को जैव भागीदारी के रूप में बदला जा सकता है।

लाभ की साझेदारी करने में साम्यता ग्रामीण और वाणिज्यिक परिवारों के तत्स्थानी खेतों में संरक्षण परंपराओं को बनाए रखने और उसे मजबूती प्रदान करने के लिए मूलभूत जरूरत है। सामग्री और सूचना अंतरण समझौते की रक्षा की जानी चाहिए तथा संबंधित सामग्रीध्सूचना प्रदान करने वालों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संबंधी परामर्शदात्री समूह (सीजीआईएआर) के अधीन आने वाली संस्थाएं सामग्री अंतरण समझौते को पहले से ही अंगीकार कर रहे हैं जिससे वाणिज्यिक लाभ के लिए वनस्पति जीव संसाधनों से संबंधित सरकार द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान के माध्यम से एकाधिकार शोषण को रोका जा सकेगा। लाभ साझा करने वाली प्रक्रियाओं को वैयक्तिक तथा सामुदायिक स्तर पर विकसित करना होगा। व्यावसायिक ब्रीडरों के मामले में मान्यता प्रदान करने तथा पुरस्कृत करने हेतु अपनायी जाने वाली उपलब्ध प्रक्रियाओं को ही वैयक्तिक कृषक, संरक्षकध्नवीन प्रयोगकर्ताओं के मामले में भी निर्धारित राष्ट्रीय कानून के अनुरूप पेंटेट प्राप्त करनेध्पौधों की किस्मों के संरक्षण करने हेतु दी जाने वाली सहायता के साथ उपलब्ध करायी जा सकती है। सम्पूर्ण समुदायों के साथ लाभ को साझा किए जाने के मामले में समस्या अधिक जटिल है। उन क्षेत्रों जिनसे नई किस्म की वाणिज्यिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण जीन प्रदान करने की जिम्मेदारी होती हैए की पहचान करने की प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। आणविक तकनीक की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि इसके कारण पैदावार और गुणवत्ता जैसे परिणामात्मक लक्षणों को नियंत्रित करने वाले जीनों के मामले में भी ऐसा करना संभव है। इसलिएए कई विकासशील देशों में जैव विविधता और पादप किस्म संरक्षण अधिनियम के अधीन स्थापित किए जाने वाले सामुदायिक जैव विविधता और जीन निधि से समुचित पुरस्कार प्रदान किया जा सकता है। ब्रीडरों को अपनी नई किस्मों के बारे में पूरी जानकारी प्रदान करने हेतु तथा यथासंभव महत्वपूर्ण जीनों जिनमें परिणामात्मक लक्षण को समेटने वाले जीन भी शामिल हैं के बारे में बताने का अनुरोध करना होगा। संबंधित समुदायों द्वारा प्रदान की जाने वाली निधियों के उपयोग के बारे में निर्णय लिया जा सकता है। स्पष्टतया उन निधियों का उपयोग समुदाय के लाभों के लिए किया जाना चाहिए जिनमें लैंडरैक्स और बीज भंडारण और प्रौद्योगिकी के साथ.साथ कृषि संरक्षण को मजबूती प्रदान करने के लिए जरूरी निधियां भी शामिल हैं।

भारतीय कानून

अब तक भारत ही एकमात्र देश है जिसने ब्रीडरों और किसानों के अधिकारों को समवर्ती मान्यता प्रदान करने हेतु कानून बनाये हैं। भारतीय पादप किस्म संरक्षण और किसानों के अधिकार अधिनियम में किसानोंध्कृषक समुदायों को राष्ट्रीय जीन निधि से जीन संसाधनों के संरक्षण में दिये गये उनके अमूल्य योगदानों और उनके द्वारा चयन, परिरक्षण और ज्ञानवर्धन के माध्यम से किए गए सुधार हेतु मान्यता तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए उपबंध किए गए हैं। भारतीय पादप किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम 2001 विश्व में इस अर्थ में अनूठा है कि इसमें ब्रीडरों और किसानों दोनों के ही अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक ही प्रकार के कानूनी उपबंध किए गए हैं। खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष में ब्रीडर और किसान दोनों ही बराबर के भागीदार हैं और इसीलिए, उन दोनों के ही अधिकार पारस्परिक रूप से एक-दूसरे को मजबूती प्रदान करने वाले होनें चाहिएं और एक-दूसरे के विरोधी नहीं होना चाहिए। भारतीय अधिनियम एक किसान को तीन प्रकार की भूमिकाओं अर्थात अन्न उगाने वाले, संरक्षणकर्ता और ब्रीडर के रूप में मान्यता प्रदान करता है।

अधिनियम के उद्देशिका में किसी भी समय फसल में सुधार करने की दिशा में कृषक परिवारों द्वारा दिए गए योगदानों को मान्यता देने की बात कही गई है। कृषि जैव विविधता केन्द्रों जैसा कि उड़ीसा के कोरापुट क्षेत्र में है, जहां जनजातीय परिवारों ने सदियों से चावल की जीन सामग्री का परिरक्षण और उसमें सुधार कर रखा है, को जीन क्षरण से रक्षा की जानी चाहिए। उन जनजातीय परिवारों जिन्होंने वैयक्तिक खर्चे पर लोगों की भलाई के लिए महत्वपूर्ण जीन सामग्री का संरक्षण किया है, को हाल ही में भारत सरकार द्वारा पहला जीनोम सेवियर पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया गया है। भारतीय पादप किस्म संरक्षण और किसानों के अधिकार प्राधिकरण द्वारा प्रदान किये जाने वाले जीनोम सेवियर पुरस्कार ज्ञान के माध्यम से चयन और मूल्यवर्धन द्वारा जीन संसाधनों, संरक्षण और वृद्धि के क्षेत्र में जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं तथा पुरुषों को स्पष्ट मान्यता प्रदान करता है।

मान्यता तथा पुरस्कार से संबंधित कार्य हेतु उपयोग में लाये जाने वाले महत्वपूर्ण मानदंड लैंडरेस/किसानों द्वारा सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में किसानों की किस्मों से प्राप्त की गई विशिष्ट प्रकार की विशेषताओं के साथ उन्नत किस्मों का विकास करने में भूमिका निभाई जायेगी। नई किस्म के विकास में जरूरी महत्वपूर्ण जीन उपलब्ध कराने में लैंडरेस की भूमिका के बारे में किस्म के पंजीकरण किए जाने के समय ब्रीडर द्वारा जानकारी मुहैया कराने के दौरान दर्शाया जाएगा।

वैयक्तिक तौर पर प्रत्येक किसान को दाता लैंडरेस की विशेषता के बारे में जानकारी दे पाना हमेशा संभव नहीं हो सकता है। ऐसे मामलों में मान्यता समुदाय को दी जायेगी जिसने इतने बहुमूल्य जर्मप्लाज्म को संरक्षित किया है। मान्यता के अंतर्गत लम्बे समय तक संरक्षण के कार्य में लगे हुए व्यक्तियोंध्समुदायों को प्रदान की जाने वाली उपाधियां भी शामिल की जा सकती हैं। पुरस्कार में वैयक्तिकध्सामुदायिक खर्चे पर महत्वपूर्ण जीनों के लगातार संरक्षित करते रहने में दिये गये योगदान के आधार पर निर्धारित समुचित धनराशि को भी शामिल किया जा सकता है। मान्यता तथा पुरस्कार प्रदान करने में आने वाले खर्च का वहन ऐसे प्रयोजनों के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा विशेष रूप से निर्धारित बजटीय प्रावधान अथवा राष्ट्रीय जीन निधिए जो भी स्थिति होए से किया जा सकता है। समुदाय/कृषक परिवार को प्रदान किए गए इस पुरस्कार का उपयोग लैंडरेस के तत्स्थानी कृषि संरक्षण के लिए अवसंरचना को मजबूत करने, और सामुदायिक यार्डों और बीज भंडारण सुविधाओं आदि से संबंधित जरूरतों को पूरा करने जैसे प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है। जब किसी समुदाय की पुरस्कार के लिए पहचान की जाती है तो विशेष सतर्कता के साथ इसकी समग्रता और लिंग संबंधी विवरण आदि को परिभाषित किया जाना महत्वपूर्ण है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पुरस्कार सभी के लाभ के लिए तथा संरक्षण के कार्य के लिए साम्यता आधार पर प्रदान किया जा सके।

उदाहरण के लिए ‘सुपर गेहूं’ जोकि ब्रीडरों को अब प्रति हेक्टेयर लगभग 8 टन पैदावार उपलब्ध कराने में सक्षम है। इस प्रकार के गेहूं का विवरण जटिल है और इसमें जीन संसाधन संरक्षण और विनिमय के महत्व को दर्शाया गया है। सुपर गेहूं का आकार छोटा होता है और उसके तने मजबूत होते हैंए पत्तियां चौड़ी होती हैं, बालियां बड़ी-बड़ी होती हैं और उनके अन्दर काफी मात्रा में गेहूं के दाने मौजूद होते हैं और उसकी अच्छी पैदावार होती है। सुपर गेहूं संरचना टेट्रासीचान (यूगोस्लाविया) एग्रोट्राइटिकम (कनाडा) टेट्रापोलाइ ओलोनिकम (पौलेंड) जीगाश (इजरायल) मोरक्को गेहूं (मोरक्को) और भारत में वर्तमान में उगाये जा रहे छोटे दाने के गेहूं को मिलाकर तैयार किया गया है। यह खाद्य और कृषि के लिए पादप जीन संसाधनों संबंधी अंतर्राष्ट्रीय संधि के अनुच्छेद 10, 11, 12 और 13 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति और साझे लाभ हेतु बहुपक्षीय प्रणाली की जरूरत पर जोर देता है। यदि किसानों के अधिकार से संबंधित अनुच्छेद 9 और अंतर्राष्ट्रीय संधि की बहुपक्षीय प्रणाली से संबंधित अनुच्छेद 10 से 13 को अक्षरशः पूरी भावना के साथ कार्यान्वित किया जाए तो जैव विविधता संरक्षण और संपोषित तथा न्यायसंगत उपयोग की निरंतरता सुनिश्चित होगी।

प्रत्येक प्रजाति और जीन की क्षति विशेषकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भविष्य के लिए हमारे विकल्पों को सीमित कर देगी। संपुष्ट डीएनए प्रौद्योगिकीए कार्यात्मक जीनोमिक्स और प्रोटीनमिक्स तथा नैनो.जैव प्रौद्योगिकी ने खाद्यए पोषणए स्वास्थ्य और आजीविका सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने हेतु अति मूल्यवान नए जीन समीकरण बनाने हेतु असाधारण अवसरों को खोल दिया है। यही कारण है कि सभी तीनों प्रकार के संरक्षण अर्थात तत्स्थानीए अन्यत्र स्थानी और खेत आधारित तत्स्थानी संरक्षण को मजबूती प्रदान की जानी चाहिए।

आज, वाणिज्यीकरण के कारण वर्षा वन और प्रवालभित्तियों जैसे जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध अधिवासों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि हम इस स्थिति को उलट दें और संरक्षण के मामले में एक अर्थ तंत्र का निर्माण करें। इसी संदर्भ में प्राथमिक संरक्षणकर्ताओं के अधिकारों को मान्यता और पुरस्कार दिया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारी खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली का भविष्य जैव विविधता संरक्षण को प्रत्येक व्यक्ति का उद्देश्य बनाये जाने की सफलता पर निर्भर करेगा।

यह जैव समृद्धि जिसकी जड़ें लाभ को साझा किये जाने की नैतिकता और साम्यता के सिद्धांतों में निहित हैए के युग में प्रवेश करने का एक रास्ता है। जैव समृद्धि से यहां व्याप्त उस विडम्बना को समाप्त करने में मदद मिलेगी जिसमें प्राथमिक संरक्षणकर्ता गरीब बना रहता है जबकि उसके ज्ञान और सामग्री का उपयोग करने वाले धनी बन जाते हैं। जैव भागीदारी जिससे जैव समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है, जैव विविधता और जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित जननीतियों को मार्गदर्शन मिलना चाहिए।

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