जैव विविधता के लिए जरूरी है जैव संस्कृतिवाद

नव उदारवाद की वैश्विक संस्कृति के अंतर्गत, बहुत सारी जैव विविधता नीति और व्यवहार को बढ़ावा दिया गया है और उनको अपनाया गया है परन्तु इसका तर्क बिलकुल अलग है।
भूगोल और आप

एक प्राचीन यूनानी पौराणिक कथा हमारे लिए एक प्रभावशाली नीति की कथा सिद्ध हो सकती है। अनाज, उपजाऊ शक्ति और ऋतुओं की सामंजस्यता की देवी डेमीतर घमण्डी राजा इरीसिक्थॉन के सामने एक नश्वर पुजारिन के रूप में प्रकट हुई और उसे सुझाव दिया कि वह उस पवित्र बाग के पेड़ों को काटने से बचे जिसे उसकी आराधना के लिए लगाया गया है। राजा ने उसके सुझाव की अनदेखी की और निरंतर पेड़ काटता रहा और अपने महल के लिए एक नए प्रीतिभोज भवन बनाने के लिए लकड़ी के प्रबन्ध करने की भूख मिटाता रहा। डेमीतर ने अपना पूरा रूप दिखाया और राजा की चिरस्थायी भूख की आलोचना की, परन्तु राजा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा, इसके विपरीत वह अधिक उपभोग करने लगा। उसकी यह भूख शान्त न हुई, वह स्थायी असंतोष के इस बोझ को संभाल न सका और भिखारी बन गलियों में घूमने लगा, वह लोगों के दान पर आश्रित हो गया और गंदा खाने लगा।

इसी प्रकार से स्थायी असंतोष और इच्छा की पूर्ति न होना उत्पादन व स्वतंत्रता की युग चेतना है। यह राज्य-स्वामित्व पूंजीवाद की प्रगति के सिद्धान्त की भी विशेषता है। कहीं भी वैश्विक अर्थव्यवस्था व पर्यावरण के समस्याप्रद पक्षों के सूचकों-संसाधनों और धन सम्पदा के वितरण में गहरी असमानता से लेकर सांस्कृतिक व जैव विविधता में अनर्थकारी कमी-से यह स्पष्ट है कि समकालीन ढांचे इस भूख को मिटाने में असफल सिद्ध हुए हैं।

ऊपर जिस पौराणिक कथा के बारे में कहा गया है, उसकी पीछे भावना यह है कि राजा ने अपने कार्यों के बारे में सोच विचार नहीं किया और डेमीतर के पवित्र बाग के बारे में जैव विविधता का आदर नहीं किया। और उपरोक्त बुराइ राजा की असफलता का परिणाम हैं। यह व्यक्ति का प्रकृति से स्पष्ट अप्रतिसंहार्य विघटन है और प्रकृति की कृपा का पतन है। यह वह संकल्पनात्मक विभाजन है जिसे कि आधुनिकता में सामान्य और तटस्थ बना दिया जाता है, और इससे ही हमारे गैर-मानवीय संसार से कट्टर सहायक संबंध बन जाते हैं।

आधुनिकता में प्रकृति को एक ऐसी वस्तु माना गया है जिसे कि मापा जा सकता है, दोहन किया जा सकता है, उसका मॉडल बनाया जा सकता है, उसका संरक्षण और प्रयोग किया सकता है। हमने प्रकृति द्वारा दिए गए उपहारों, खुशियों या उत्साह को स्वीकार नहीं किया है। यहां तक कि जैव विविधता के क्षेत्र में भी नीतियां और व्यवहार, वांछनीय अपवाद वाले विशेष क्षेत्रों, संरक्षण कार्यों की संख्या, संरक्षित क्षेत्र सम्पदा का पृथ्वी की सतह के अन्तर्गत प्रतिशत, इस प्रकार के कार्यों से पर्यटन द्वारा अर्जित आय, पुरस्कार के लिए होड़ और अब पूंजीवादी क्षेत्र में वैश्विक बाजारों में पारिस्थतिकी तंत्र की सेवाओं के लिए, इत्यादि से ही निर्देशित रहे हैं।

जैव संस्कृतिवाद, यह स्वीकारोक्ति है कि ज्ञान, भाषाओं और व्यवहारों में जैव विविधता का संबंध सांस्कृतिक विविधता से है और पर्यावरण व सांस्कृतिक कल्याण के लिए संपोषिता बहुत आवश्यक है- एक उभरता शब्द व संकल्पना है। यह संकल्पना उस क्रान्तिकारी कदम का सूचक है जिसमें प्रकृति के संरक्षण के लिए विभिन्न प्रकार के मूल्यों को स्पष्ट तौर पर वाद-विवाद व व्यवहार में लाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित देशज लोगों के अधिकारों की घोषणा में भी जैव संस्कृतिवाद की अवधारणा स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। उदाहरण के लिए इस घोषणा में यह स्वीकार किया गया है कि जिन क्षेत्रों, भूखण्डों, जलाशयों या तटीय समुद्रों पर देशज लोगों का परम्परागत रुप से स्वामित्व है, ये उनके अधीन हैं और वे इनका प्रयोग कर रहे हैं। इनसे इन लोगों के पास विशेष आध्यात्मिक संबंध बनाने और उसे मजबूत करने का अधिकार है (अनुच्छेद 25)। पेरू के कूस्को हाइलैण्ड्स में एक उत्साहवर्द्धक पहल करते हुए इंका वंशजों ने पोटेटो पार्क की स्थापना की है, जहां सांस्कृतिक व्यवहार के द्वारा आलू की किस्मों की आश्चर्यजनक जैव विविधता को विकसित किया गया है, ताकि उन्हें संरक्षित किया जा सके। इसे जैव सांस्कृतिक विरासत स्थल का नाम दिया गया है।

संस्कृति और प्रकृति के क्षेत्र को फिर से आपस में जोड़ने के लिए ये कुछ मुख्य संकल्पनात्मक और व्यवहारिक कदम हैं जिन्हें पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे ने पिछले हजार वर्षों में हिंसात्मक तरीके से टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। उपभोग और अन्य व्यवहारों में इस मार्ग का खण्डन करने वाली कहानियां व अनुभवों को बांटा जाए। इसे करने और दूसरा होने की संभावना में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हो जाएगा। क्रान्तिकारी परिवर्तनों को समर्थन देने की अपेक्षा आधुनिकता के अन्तर्गत ‘पर्यावरण व विकास’ जैसे मुख्यधारा विषयों को पढ़ा जाए जिससे नीतियों में कमियां निकालना और तकनीकवाद से जुड़ी सारी चिह्नित समस्याएं कम हो जाएंगी।

अब नव उदारवाद की वैश्विक संस्कृति के अन्तर्गत, बहुत सारी जैव विविधता नीति और व्यवहार को बढ़ावा दिया जा रहा हैं व उन्हें अपनाया जा रहा है, परन्तु इसका बिल्कुल अलग ही तर्क है। यह एकत्रीकरण का तर्क है जहां मूल्य का निर्धारण बाजार द्वारा किया जाता है जो खरीदा, बेचा और जिससे लाभ उठाया जाए। इस तर्क के अन्तर्गत, जैव विविधता के मूल्य निर्माण के लिए स्पष्ट तौर पर नए बाजारों और नए खरीदारों को कार्य देना होगा। इसको पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान का नाम दिया गया है। उदाहरण के लिए, कटूम्बा समूह के ‘‘पारिस्थितिकी तन्त्र बाजार स्थान वेबसाइट’’ का कहना है कि एक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए बाजार (जैव विविधता सहित) हमारी आर्थिक व पर्यावरणीय पद्धति का एक मूलभूत भाग बन जाएगा, यह पर्यावरणीय सेवाओं का मूल्य देने में मदद करेगा। इस पक्ष की काफी समय से उपेक्षा की जाती रही है और इसे बेकार की चीज समझ लिया गया था। वह कौन है जिसने इन पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत नहीं आंकी या पहचानी ?

हम प्राकृतिक सम्पदा को वैश्विक बाजार के लिए खुला छोड़ने हेतु घेरे व प्राथमिक संचय की एक दूसरी व महत्वपूर्ण गतिशील धारा को देख रहे हैं और वस्तुकरण अब जीन से जाति व पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुंच गया है अर्थात् विविधता के सब क्षेत्रों में जिनका चित्रण जैव विविधता के सम्मेलन द्वारा किया गया था। ‘मुक्त बाजार पर्यावरणवाद’ ने जिस स्वतन्त्रता को अंगीकार किया है, वह स्वतन्त्रता के साथ ही अन्य स्वतन्त्रताओं-मानव व गैर मानवीय संसारों से संबंधों को बनाने की अन्य स्वतन्त्रताएं-की संभावनाओं को भी बंद कर देती है, जिन्हें आज के समय में बनाए रखने की अत्यन्त आवश्यकता है।

बाजारीकरण की इन प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द ही गैर-मानवीय संसार की संरक्षित प्रकृति को पर्यटनीय उपभोग में बदलने का अनुभव है। इसको अधिकांश संरक्षण प्रयासों में आय सृजन के लिए बढ़ावा दिया गया है। अब प्रकृति का अनुभव मात्र वाहन की खिड़कियों पर, कैमरे के लैन्स द्वारा, राइफल की नली पर (यदि आप पुरस्कार की दौड़ में नहीं है) या फिर डिस्कवरी चैनल पर ही कर सकते हैं।

इन सबमें जिस प्रकृति को प्राथमिकता दी जाती है या तकनीक के द्वारा जिसे दिखाया जाता है, उस प्रकृति का साकार रूप नहीं दिखाई देता है और यह प्रकृति से जोड़ने की अपेक्षा पृथक कर देता है। इस प्रकार से, ‘प्रकृति की यह नवउदारवादी’ गति इस प्रगति के सिद्धान्त का पोषण करती है और यह सिद्धान्त आधुनिकता के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा देता है। इसके अतिरिक्त यह सिद्धान्त प्रकृति को वस्तु और प्रदर्शनी में बदल देता है और ऐसा करने के लिए यह सिद्धान्त विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों की भागीदारी और श्रम पर नियंत्रण करता है। प्रश्न वही है- क्या इस चक्राकार मार्ग के द्वारा जैव विविधता और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा दिया जा सकेगा?

एक दूसरी पौराणिक कथा है जिसको सामान्य तौर पर डेमीतर से जोड़ दिया जाता है। यह है उसकी लड़की का बलात् अपहरण और बलात्कार। उसकी लड़की परसीफोन का हाडिस अपहरण कर लेता है और फिर बलात्कार। हाडिस प्रेतलोक का संरक्षक है और देवताओं का राजा, जेयुस उसका भाई है और हाडिस से उसकी सांठगांठ है। डेमीतर, परेशानी में, पृथ्वी को आदेश देती है कि जब तक उसकी लड़की वापस न आए, वह बंजर रहेगी। जेयुस देखता है कि यह तो मानव जाति के लिए व देवाताओं के लिए खतरे वाली बात होगी, तब वह हाडिस के साथ आत्मसमर्पण कर देता है और डेमीतर के सामने आ जाता है। परसीफोन को डेमीतर को सौंप दिया जाता है। परन्तु वह अनार के बीज, मृत्यु का भोजन खाये हुए आती है, और अपनी चेतना खो देती है, बाद में चेतना आ जाती है परन्तु अब आंशिक रूप से उसके मस्तिष्क पर प्रेतलोक का अंधकार, खतरा और बिताया गया समय छाया रहता है। संभवतः परसीफोन की तरह हमारे भोलेपन का भी, मनुष्य विरोधी सिद्धान्त व प्रगति की अवधारणा ने, अपहरण कर लिया है। इस अवधारणा में अत्यधिक शोषण पर बल दिया गया है जिसके कारण संबंध टूट जाते हैं और सबका जादू गायब हो जाता है। परन्तु हम डेमीतर के उपजाऊ जीवन ज्ञान के बीजों से भी कुछ सीख सकते हैं। यह शोषणकारी जन्तु इतना समर्थ है कि वह इसे आसानी से हमारे मस्तिष्क में रोप सकता है।

अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण में, जैव संस्कृतिवाद एक व्यवहारिक संकल्पनात्मक आधार बन गया है जो संस्कृति व प्रकृति को जोड़ता है। जोश व उत्साह द्वारा इस संबंध में (पुनः) शक्ति डालने के लिए, आर्थिक प्रगति के प्रबल मत और जीवन के निरंतर वस्तुकरण से शीघ्रता से छुटकारा पाना होगा। ऐसा करते हुए, जन व पर्यावरण के बीच परस्पर सहायता वाले सम्बन्ध बनेंगे। यह मुद्रा की अपेक्षा जैव संस्कृतिवाद होगा जो जैव विविधता को न्यायसंगत ढंग से पोषित कर प्रोत्साहन देता है।

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