चार धामों की यात्रा

एक बार अवश्य करें चार धामों की यात्रा

भूगोल और आप

देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखण्ड के हिमालय की दुर्गम तथा मनोरम वादियों में हिन्दु आस्था के प्रतीक माने जाने वाले कई तीर्थ स्थल मौजूद हैं। इन तीर्थ स्थलों में यमुनोत्रा, गंगोत्रा, केदारनाथ तथा बदरीनाथ जैसे धामों का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति की यह कामना होती है कि अपने जीवन में कम से कम एक बार वह इन चारों धामों की यात्रा कर अपने वर्तमान तथा भविष्य को संवारने के साथ-साथ अपने पूर्व जन्म तथा आगे के जन्म में सुख और शांति के साथ-साथ समृद्ध भी प्राप्त कर सके।

यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बदरीनाथ को सामान्यतः चार धाम के नाम से जाना जाता है। इन चार धामों की यात्रा प्रत्येक वर्ष मई माह में प्रारम्भ होकर अक्टूबर माह तक चलती है। सामान्यतः इन चार धामों की यात्रा के लिये सितम्बर का महीना सबसे उपयुक्त तथा खुशगवार माना जाता है।

सदियों से संत महात्माओं, धार्मिक प्रवृति के व्यक्तियों, तीर्थ यात्रियों तथा पर्यटकों के लिये चार धामों की यात्रा विशेष आकर्षण का केंद्र रही है। धार्मिक आस्था के अनुसार इन चार धामों की यात्रा को बायें से दायें स्थित धामों तक पहुंचकर करना उचित माना जाता है। अतः चार धामों की यात्रा करते समय पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, फिर केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ की यात्रा कर पुण्य प्राप्त किया जाता है। जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक लगभग पांच किलोमीटर तथा गौरीकुण्ड से केदारनाथ तक लगभग 14 किलोमीटर पैदल चलना होता है। जानकी चट्टी औऱ गौरीकुण्ड तक वाहन से जा सकते हैं। गंगौत्री तथा बद्रीनाथ पहुंचने के लिए वाहनों का उपयोग कर सकते हैं।

सामान्यतः यह देखा गया है कि दुर्गम स्थानों पर स्थित धार्मिक स्थलों की यात्रा में हर आयु वर्ग के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। अकेले यात्रा ना करके ऐसी यात्राओं में अपने दोस्तों तथा रिश्तेदारों के एक समूह में यात्रा करना बेहतर होता है। इससे कठिन समय में एक दूसरे की सहायता भी की जा सकती है और यात्रा को मनोरंजक तथा आनंद दायक भी बनाया जा सकता है। चार धामों की यात्रा करते समय ऊनी कपड़े, टार्च तथा दवाईयां ले जाना ना भूलें। अपने साथ सूखे मेवे तथा एनर्जी ड्रिंक ले जाना बेहतर रहेगा। अधिक सामान के साथ यात्रा ना करें तो बेहतर रहेगा। यदि आप चश्मा पहनते हैं तो एक जोड़ी अतिरिक्त चश्मा अपने पास अवश्य रखें। अपने खाने पीने का बराबर ध्यान रखें। अपनी डायरी में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का फोन नम्बर जरूर साथ रखें जिससे कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में उनसे सम्पर्क किया जा सके।

उत्तराखण्ड के चार धामों की यात्रा अब पहले से काफी सुविधाजनक होती जा रही है। परन्तु दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित इन चारों धामों के यात्रा मार्ग पर प्राकृतिक आपदाओं का कहर प्रत्येक वर्ष देखने को मिलता है। सरकार ऐसी स्थितियों से निबटने का हर सम्भव प्रयास करती है और जिसका परिणाम हमेशा सुखद ही रहता है।

यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बदरीनाथ धाम की यात्रा के लिये देश के किसी कोने से उत्तराखण्ड पहुंचना आसान है। देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार तथा कोटद्वार रेलमार्ग से जुड़े हुए हैं तथा आस पास के राज्यों से ऋषिकेश तक पहुंचने के लिये बस सेवा बराबर उपलब्ध रहती है। जौलीग्रांट ;देहरादून का हवाई अड्डा लोगों को हवाई मार्ग से उत्तराखण्ड पहुंचाने के लिये इंडियन एयरलाइन्स के विमान  दिल्ली से आने जाने लगे हैं।

ऋषिकेश से यमुनोत्री की दूरी 236 किलोमीटर, गंगोत्री की दूरी 250 किलोमीटर, केदारनाथ की दूरी 234 किलोमीटर तथा बदरीनाथ की दूरी 300 किलोमीटर है।

यमुनोत्री धाम: चार धाम की यात्रा का प्रारम्भ यमुनोत्री धाम से किया जाना श्रेयस्कर माना जाता है। यह धाम उत्तरकाशी जनपद में 3293 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। गर्मी के महीनों में भी यहाँ अच्छी-खासी ठंडक बनी रहती है। यमुनोत्री को यमुना नदी का उद्गम स्थल माना जाता है जो कि कालिन्दी पर्वत में स्थित सप्तऋषि कुण्ड नामक ग्लेशियर लेक से निकलती है। यमुनोत्री में जो मंदिर स्थित है उसमें काले पत्थरों से बनायी गयी यमुना की मूर्ति स्थापित है। कालिन्दी पर्वत से निकलने के कारण ही यमुना को कालिन्दी के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के पीछे बंदर पूंछ नामक पर्वत स्थित है जिसकी ऊँचाई 6300 मीटर है। यमुनोत्री  का हिन्दू धर्म में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है और यह माना जाता है कि असीत मुनि ने यहाँ पर तपस्या की थी। यमुनोत्री में चट्टानों से निकलने वाले गर्म जल के पांच स्त्रोत मौजूद हैं। मंदिर से बीस फीट की दूरी पर तप्त कुण्ड स्थित है जहां पोटली में चावल और आलू बांधकर भक्तगण पका लेते हैं और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यमुनोत्री का मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया द्वारा उन्नीसवीं सदी में बनवाया गया था। कई बार भूकम्प तथा एवेलांच से प्रभावित होने के कारण यह मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ और कई बार इसे दोबारा बनाया गया है। सूर्यकुण्ड के निकट दिव्य शिला, हनुमान मंदिर दशर्नीय स्थल हैं। हनुमान चट्टी में हनुमान गंगा और यमुना नदी का संगम होता है। यहां का दृश्य बड़ा ही मनोहारी है।

गंगोत्री धाम:  गंगोत्री धाम उत्तरकाशी जनपद के तकनौर तहसील में 3140 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। भगीरथ की गहन तपस्या से इसी स्थान पर गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। यहां गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है जो कि गंगोत्री से लगभग 19 किलोमीटर दूर गोमुख ग्लेशियर से निकलती है। गंगोत्री में  गंगोत्री मंदिर, भागीरथी मंदिर तथा पांडवों द्वारा प्रायश्चित स्वरूप निर्मित यज्ञ स्थल अब भी मौजूद है। गंगोत्री तक बस द्वारा सीधे पहुंचा जा सकता है। गर्मी के दिनों में इस स्थान पर पर्याप्त ठंडक रहती है।

केदारनाथ धाम : केदारनाथ धाम चमोली जिले के नागपुर परगना के अंतर्गत पट्टी मल्ला काली भाटा में मंदाकिनी गंगा के स्रोत के पास केदार शिखर तथा भरतखण्ड हिम शिखरों के पास 3583 मीटर की ऊँचाई पर एक भव्य स्थल पर स्थित है। केदारनाथ का विशाल मंदिर पूर्व मध्यकाल की कत्यूरी निर्माण शैली का है औऱ भव्यतम स्थापत्य कला का उदाहरण है। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है उसके दक्षिण पूर्वी भाग में मंदाकिनी नदी बहती है। यह भी कहा जाता है कि केदारनाथ के मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। इस तीर्थ स्थल पर भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंग में से एक स्थापित है। यहाँ पर नंदी बैल, शंकराचार्य की समाधि, भैरव मंदिर, मधु गंगा, चीर गंगा, शिव कुण्ड, रूधिर कुण्ड आदि प्रमुख दशर्नीय स्थल हैं। केदारनाथ का मंदिर छत्र प्रासाद युक्त है। इसका निर्माण भूरे पत्थरों के बड़े-बड़े शिलाखण्डों को काटकर तथा तराश कर एक दूसरे से जोड़कर किया गया है। गर्भ गृह में त्रिकोण आकृति की एक बहुत बड़ी ग्रेनाइट की शिला है जिसकी पूजा यात्री गण करते हैं। इस मंदिर में शिव के एक रूप सदा शिव की भी पूजा की जाती है। सभा मंडप में चार विशाल पाषाण स्तम्भ हैं तथा दीवारों में आठ पुरूष मूर्तियाँ हैं। माना जाता है कि ये मूर्तियाँ नव नाथों की हैं। नाथ परम्परा में आदि नाथ स्वयं शिव हैं, जो यहाँ गर्भ गृह में लिंग के रूप में विद्यमान हैं और उनके शिष्य आठ नाथ मंडप में खड़े होकर शिव की अराधना करते हुए दिखाये गये हैं। 

बदरीनाथ धाम

बदरीनाथ धाम चमोली जिले के पैनखण्डा परगना के तल्ला पट्टी में विष्णु गंगा नदी के दाहिने तट पर एक समतल स्थान पर स्थित है। जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 3133 मीटर है। इस धाम का महात्म्य अद्भुत है। स्वयं भगवान विष्णु यहाँ बदरीनारायण के रूप में विराजमान हैं। बर्फ की चादरों से ढका हुआ यह स्थल अत्यन्त ही मनोरम है। इस तीर्थ स्थल को प्रकृति की एक भव्य रचना माना जाता है। यह धाम न केवल उत्तराखण्ड बल्कि सम्पूर्ण भारत का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। बदरीनाथ तीर्थ स्थल नर और नारायण दो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित है। गढ़वाल के राजा द्वारा 200 साल पहले श्री बदरीनाथ धाम में मंदिर बनवाया गया था। यहाँ का मंदिर तीन भागों में बंटा हुआ है। सिंह द्वार, मंडल और गर्भ गृह। गर्भ गृह में भगवान बदरीनारायण, कुबेर, नारद ऋषि, उतवर, नर और नारायण विराजमान हैं। भगवान बदरीनाथ जिन्हें भक्तगण बद्री विशाल भी कहते हैं, उन्होंने अपने एक हाथ में शंख, दूसरे हाथ में चक्र  धारण किया है और अन्य हाथों को योग मुद्रा में स्थित किया हुआ है। यदि इस मूर्ति को ध्यान से देखा जाये तो ऐसा लगता है कि भगवान विष्णु योगआसन लगाये हुए हैं। यहाँ भगवान विष्णु के वाहन गरूड़ और माता लक्ष्मी के मंदिर भी स्थापित किये गये हैं। यहाँ शंकराचार्य, स्वामी देसीकन और श्री रामानुजम की मूर्ति भी स्थापित की गई है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में बदरीनाथ का मंदिर, तप्त कुण्ड, नारद कुण्ड, पंच शिला, ब्रहम कपाल, पंच तारा, उर्वशी मंदिर, शेष नेत्र, चरण पादुका, माता मूर्ति, गणेश गुफा, भीम गुफा आदि प्रमुख हैं।

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