शहरी भारत में उपलब्ध नागरिक सुविधाएं पर्याप्त नहीं

शहरी भारत में उपलब्ध नागरिक सुविधाएं पर्याप्त नहीं

भूगोल और आप

74वां संशोधन अधिदेश शहरी स्थानीय निकायों को सार्वजनिक लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता और ठोस अवशिष्ट प्रबंधन के मुद्दे को बड़े पैमाने पर अपने ही संसाधनों पर निपटाने का आदेश देता है। हालांकि छोटे शहरी केन्द्रों के पास ऐसी परियोजनाओं का डिजाइन तैयार करते हुए वित्तीय और तकनीकी क्षमताओं की कमी है। हाल के हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप बड़े शहरो पर अधिक निर्भरता हो गयी है और छोटे-छोटे केन्द्र और अधिक अलग-थलग पड़ गये हैं।

बिजली, पेयजल, शौचालय सुविधा, अवशिष्ट जल की निकासी और स्वच्छ ईंधन, शहरी जीवन की गुणवत्ता के महत्वपूर्ण निर्धारक है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार शहरी भारत में 13 प्रतिशत घरों में बिजली की सुविधा नहीं है। 16 प्रतिशत घरों में सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था नहीं है और 27 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है। वर्ष 2005-06 तक आते-आते बिजली और सुरक्षित पेयजल के मामले में वर्ष 2001 की तुलनाओं में इन सुविधाओं में और अधिक गिरावट आ गई और इनकी कमी की प्रतिशतता बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3)।

यह गिरावट शौचालय सुविधा के मामले में महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि शहरी भारत में 70 प्रतिशत घरों में अभी भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। लगभग 20 प्रतिशत शहरी भारत  किसी प्रकार की सीवर प्रणाली से नहीं जुड़ा हैं। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर संक्रामक और परजीवी बीमारियों के फैलने को देखते हुए अन्य नागरिक सुविधाओं की अपेक्षा कहीं अधिक ध्यान देने की जरूरत है। योजना आयोग (2008) के हाल के दस्तावेजों में इस मुद्दे को गंभीर समस्याओं में से एक माना गया है कि लगभग 20 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा नहीं होने का अर्थ यह है लगभग 60 मिलियन जनसंख्या को खुले में शौच करना पड़ता है। यह पहलू अवशिष्ट जल की निकासी और ड्रेनेज की व्यवस्था के साथ भी गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2001 में शहरी भारत में खुले या बंद ड्रेनेज प्रणाली से जुड़े घरों का अनुपात 78 प्रतिशत था। आगे, प्रत्येक नागरिक सेवाओं के मामले में ग्रामीण व शहरी भारत  के बीच का अंतर काफी अधिक है।

शहरी स्तर का पैटर्न

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार  शहरी भारत की 286 मिलियन जनसंख्या विभिन्न आकार और वर्गों के लगभग 5000 शहरों और नगरों में विभाजित है। यह उम्मीद की जाती है कि नागरिक सेवाओं का उपबंध शहरी क्षेत्रों के आकार से सीधे जुड़ा हुआ है। लघु और मध्यम आकार के शहरी क्षेत्रों में शौचालय की सुविधाएं आश्चर्यजनक रूप से कम (60 प्रतिशत के लगभग) हैं और बिजली तथा पेयजल की आपूर्ति के मामले में भी लगभग यही स्थिति है। जहाँ तक रसोई गैस का संबंध है, स्वच्छ ईंधन के उपयोग के मामले में शहरी भारत आमतौर पर लाभ की स्थिति में है क्योंकि 80 प्रतिशत घरों में एलपीजी का उपयोग किया जाता है। हालांकि जनसंख्या की भिन्नता के कारण विभिन्न शहरों के बीच अंतर व्याप्त है। छोटे शहरी क्षेत्रों में 26 प्रतिशत घरों में ही एलपीजी का प्रयोग किया जाता है जबकि शहरी भारत के बहुत सारे घर अभी भी कोयला, चारकोल और लकड़ी के ईंधन के ऊपर निभग्र हैं जिससे घरों के अंदर प्रदूषण फैलने के कारण विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

मेगा शहर

शहरी भारत के महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद और बंगलुरू आदि  छः मेगा शहरों के मामले में वर्ष 2001 की जनगणना के आंकड़े का विश्लेषण यह दर्शाता है कि कोलकाता में 95 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा है। यह प्रतिशतता मुंबई के मामले में निराशाजनक इसलिए है कि उसकी लगभग आधी जनसंख्या मलिन बस्तियों में निवास करती है जिनमें से अधिक बस्तियों में सामुदायिक शौचालयों पर लोगों की निर्भरता है। सामुदायिक शौचालयों का रखरखाव अक्सर ही खराब स्थिति में रहता है जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग खुले में ही शौच करते हैं। मलिन बस्तियों में रहने वाले लगभग एक-चौथाई लोग वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार बीएमसी क्षेत्र की मलिन बस्तियों में रहने वाली छः मिलियन जनसंख्या का चौथाई भाग यानी 1.5 मिलियन लोग खुले में शौच करते हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया 5 मार्च, 2008, मुंबई संस्करण, पृष्ठ 6)। इस प्रकार से शौचालय की सुविधा प्रदान करना मुंबई के मामले में एक बड़ी चुनौती है। सरकारी क्षेत्रों में इसे चुनौती के रूप में बिल्कुल नहीं लिया गया है। दिल्ली भी इस समस्या से मुक्त नहीं है, जहां एक-चौथाई घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है, चेन्नई में लगभग 20 प्रतिशत घरों में पेयजल की सुविधा उपलब्ध नहीं है। उसी प्रकार से, एलपीजी के प्रयोग के मामले में भी भारी भिन्नता मौजूद है जहां दिल्ली में लगभग 70 प्रतिशत घरों में यह सुविधा उपलब्ध है वहीं हैदराबाद और कोलकाता में 48 प्रतिशत घरों में ही यह सुविधा है। हैदराबाद में लगभग 46 प्रतिशत परिवार मिट्टी के तेल का प्रयोग करते हैं, वहीं मुंबई, हैदराबाद, बंगलुरू और कोलकाता में 40 प्रतिशत घरों में इसका प्रयोग किया जाता है। ऐसा लगता है कि अन्य मेगा शहरों की तुलना में एलपीजी दिल्ली में अधिक आसानी से उपलब्ध है।

अन्तिम निश्कर्ष

विश्लेषण यह दर्शाता है कि शहरी भारत के क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं तक पहुँच के संदर्भ में भारी अन्तर मौजूद है। नगरों की तुलना में छोटे और मध्यम आकार के शहरों में नागरिक सुविधाओं तक पहुँच कम है। इस निराशाजनक स्थिति को 1992 में पुनःस्थापित भारतीय संविधान के 74वें संशोधन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जो शहरी स्थानीय निकायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और ठोस अवशिष्ट प्रबंधन सहित शहरी आयोजना और विकास के बहुत सारे क्षेत्रों पर कार्य शुरू करने का आदेश देता है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि शहरी  भारत के स्थानीय निकाय अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी निधि स्वयं जुटाएंगे। पानी, स्वच्छता, मनोरंजन और परिवहन संबंधी अवसंरचना परियोजनाओं पर अत्यधिक निवेश की जरूरत है। अधिकतर छोटे शहरी केन्द्रों के पास वित्तीय क्षमता मौजूद नहीं है। इन परियोजनाओं का डिजाइन तैयार करने और बाजार से धनराशि जुटाने हेतु उनके पास तकनीकी क्षमताओं की भी कमी है। एक ओर, राज्य सरकारों ने उन्हें कराधान और बाजार के माध्यम से धन जुटाने की शक्ति प्रदान करने सहित स्वतंत्र रूप से शहरी शासन का कार्य संभालने हेतु समुचित रूप से शक्ति नहीं प्रदान की है। दूसरी तरफ, कई राज्य सरकारों ने चुंगी जो कि शहरी स्थानीय निकायों की आय का बड़ा स्रोत है, को समाप्त कर दिया है। केन्द्रीय सरकार की जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन का माध्यम शहरी विकास नीति कुछेक बड़े शहरों तक ही सीमित है। इससे छोटे शहरी केन्द्रों के और अलग-थलग पड़ जाने की संभावना है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापार और वाणिज्य के विकास में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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