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जोखिम का मूल्यांकन

तटवर्त्ती इलाको में सुभेद्यता जोखिम का मूल्यांकन

भूगोल और आप

दिसम्बर 2004 में आए सुनामी के बाद प्राकृतिक जोखिमों और तटवर्ती प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक अध्ययन का महत्व बढ़ गया है क्योंकि देश ने जान-माल और पर्यावरण के हुए भारी नुकसान से सबक सीखा है। राष्ट्र के लिए विशवसनीय तटवर्ती सुभेद्यता संबंधी जानकारी उपलब्ध नही रहने के कारण तटवर्ती भूमि के वर्गीकरण और उसकी  सुभेद्यता जोखिम के मूल्यांकन की जरूरत पैदा हो गई है।

हमारे राष्ट्र के तटवर्ती क्षेत्रों में विगत के चार दशकों से भीषण जनसंख्या और विकास का दबाव बना रहा है। संयुक्त राष्ट्र के 1992 के आकलनों के अनुसार विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या 60 किलोमीटर तटरेखा के घेरे में निवास करती है। 1950 के दशकों में केवल दो ही मेगाशहर – न्यूयार्क और लंदन हुआ करते थे जिनकी संख्या 1990 में 20 तक जा पहुंची और हाल के अनुमानों के आधार पर यह भविष्यवाणी की गई है कि 2010 के दशक के दौरान विश्व की जनसंख्या 320 मिलियन और मेगाशहरों की संख्या 30 हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के प्रतिवेदन के अनुसार 1990 में तटवर्ती जोन में औसत जनसंख्या घनत्व प्रति दो किलोमीटर क्षेत्र में 77 व्यक्ति थी, जो 2000 में 87 हो गई तथा 2010 में 99 तक हो जाने का अनुमान है।

सामूहिक तौर पर, इससे तटवर्ती संसाधनोंपर अतिरिक्त मांग का भार पड़ रहा है तथा अधिक से अधिक लोग तटवर्ती जोखिम के घेरे में हैं। 1990 में लगभग 200 मिलियन व्यक्ति तटवर्ती बाढ़ के मैदानी भाग (1000 वर्ष तक बाढ़ से घिरे रहे क्षेत्र) में निवास करते हैं। वर्ष 2100 तक उनकी संख्या बढ़कर 600 मिलियन हो जाने की संभावना है। आगे, वैश्विक जलवायु परिवर्तन और त्वरित गति से बढ़ते समुद्रतल के स्तर के खतरे के कारण तूफानी लहरों, भीषण लहरों और सुनामी के व्याप्त उच्च जोखिम के और गहरा जाने की आशंका है। विगत के 100 वर्षों में वैश्विक तौर पर समुद्रतल के स्तर में 1.0-2.5 मिमी/वर्ष वृद्धि होती रही है। समुद्रतल का भावी स्तर वर्ष 2100 तक जलवायु परिवर्तन के कारण 20 से 86 सेंटीमीटर तक बढ़ने का अनुमान है और सर्वोत्तम अनुमान के अनुसार 49 सेंटीमीटर तक इसका स्तर बढ़ना तय है। यह अनुमान लगाया गया है कि समुद्रतल के स्तर में एक मीटर वृद्धि होने से भारत में लगभग 7 मिलियन व्यक्तियों को अपने घर से विस्थापित होना पड़ेगा (आईपीसीसी डब्ल्यूजीआई, 2001)।

दिसम्बर 2004 के सुनामी के बाद प्राकृतिक जोखिमों और तटवर्ती प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक अध्ययन का महत्व बढ़ गया है क्योंकि देश ने जान-माल और पर्यावरण को हुई भारी क्षति से सबक सीखा है। तटवर्ती सुभेद्यता के बारे में विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करने की राष्ट्र की मंशा के कारण तटवर्ती भूक्षेत्रों का वर्गीकरण किए जाने तथा इसके जोखिम  का मूल्यांकन करने की जरूरत पैदा हुई है। प्राकृतिक जोखिमों से निपटने के लिए जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों और संसाधन प्रबंधकों को भी विशुद्ध मूल्यांकन के बारे में जानकारी होना जरूरी है ताकि जोखिमपूर्ण घटनाओं से पूर्व, उसके दौरान और बाद में उनके द्वारा जानकारी के आधार पर निर्णय लिया जा सके। इस प्रकार का अध्ययन या जोखिम का मूल्यांकन बढ़ता जा रहा है क्योंकि भौतिक प्रादेशिक आयोजना विशेषज्ञों के लिए आंकड़े जुटाने की मंशा स्पष्ट हुई है क्योंकि ये आंकड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया के एक अवयव हैं।

भूगोल, भौतिक, शहरी या प्रादेशिक आयोजना, अर्थशास्त्र और पर्यावरण प्रबंधन जैसे विषयों से आपदाओं के प्रति प्रयुक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूती प्रदान करने में सहायता मिलती है। भूगर्भ शास्त्रियों, भूतकनीकी अभियंताओं, जलविज्ञानियों और अन्य विशेषज्ञों की वृहत्त सहभागिता के कारण मानचित्रों का उपयोग कहीं अधिक आम हो गया है। वे लोग प्राकृतिक घटना के प्रभावी क्षेत्रों के अनुरूप खतरा या जोखिम क्षेत्रों की पर्याप्त रूप से पहचान करने हेतु आवश्यक आंकड़े प्रदान करने में समर्थ हो सके हैं। भौगोलिक सूचना प्रणाली जैसे साधनों से पहचान और विश्लेषण संबंधी कार्य सुगम हो गया है।

क्रियाविधि

सुभेद्यता को जोखिम के एक विषय या प्रणाली के आन्तरिक खतरे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है और वह अपनी आन्तरिक पूर्ववृत्ति के अनुरूप प्रभावित होती है या उसमें प्रभावित होने की अथवा क्षति होने की संभावना मौजूद रहती है। सामान्य तौर पर ‘जोखिम’ की संकल्पना का अब किसी प्रणाली या खतरे के विषय के रूप में छिपे खतरे या बाहरी जोखिम कारक के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। खतरे के निर्धारित अवधि के दौरान किसी स्थान विशेष पर कतिपय तीव्रता की घटना होने की संभावना के रूप में जोखिम की गणितीय गणना की जा सकती है। हालांकि, सुभेद्यता को गणितीय रूप से ‘व्यवहार्यता’ के तौर पर अभिव्यक्त किया जा सकता है, जो खतरे के विषय या प्रणाली होते हैं – जो उस घटना जिसे जोखिम माना जाता है, से प्रभावित हो सकती है। इसलिए, जोखिम और सुभेद्यता के संयोजन के परिणामस्वरूप खतरे के विषय या प्रणाली को पहुंचाने वाले संभावित नुकसान को ही खतरा कहा जाता है। कतिपय स्थान पर अवधि के दौरान आर्थिक, सामाजिक या पर्यावरणीय परिणाम के निर्धारित स्तर को पार कर जाने की संभावना के रूप में खतरे को गणितीय तौर पर व्यक्त किया जा सकता है।

यद्यपि एक अर्थक्षम, परिमाणात्मक, भविष्य सूचक दृष्टिकोण उपलब्ध नहीं है, पर तटवर्ती सुभेद्यता सूचकांक का आंकलन करने हेतु तटवर्ती भू-आकृति, समुद्रतल के स्तर में परिवर्तन की दर, विगत में तटरेखा का विकास से संबंधित आधारभूत जानकारी का उपयोग करते हुए क्षेत्रीय से राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न तटवर्ती पर्यावरणों से समुद्रतल के स्तर में वृद्धि की सापेक्ष सुभेद्यता का परिमाणात्मक आंकलन किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण में तटवर्ती प्रणाली के परिवर्तन की संभाव्यता के साथ बदलती पर्यावरणीय दशाओं को अपनाने की प्राकृतिक क्षमता को शामिल किया गया है तथा समुद्रतल के स्तर में वृद्धि होने से प्रभावित होने की प्रणाली की प्राकृतिक सुभेद्यता के अनुरूप उपाय सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है। इस क्रियाविधि में एक मूल्यांकन प्रणाली का उपयोग किया गया है जो सुभेद्यता – कम, मध्यम और उच्च स्तर पर आधारित तटवर्ती क्षेत्र को वर्गीकृत करती है।

वर्तमान अध्ययन में तटवर्ती सुभेद्यता सूचकांक की गणना करने की विधि थीलर और हम्मार कलोसे (1992), थीलर (2000) और पेंडलटन एट अल (2005) में उपयोग की कई विधियों के समान ही है। पूर्व के अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा प्रयुक्त 6 पैरामीटरों के अलावा, वर्तमान अध्ययन में 6 अतिरिक्त भूगर्भीय प्रक्रिया परिवर्तन अर्थात तटवर्ती क्षेत्र का उन्नतांश का प्रयोग किया जाता है। प्रयुक्त किए जाने वाले सात सापेक्ष जोखिम परिवर्तियों में महत्वपूर्ण लहरों की मध्यमान ऊँचाई, ज्वारभाटे का मध्यमान स्तर, तटवर्ती क्षेत्रीय उन्नतांश और तटवर्ती भू-आकृति गतिशील हैं और उनके लिए बड़े पैमाने पर विभिन्न स्रोतों से आंकड़े जुटाना आवश्यक है, जिन्हें अधिग्रहीत करने के बाद उनका विश्लेषण किया जाता है तथा उन्हें प्रक्रिया में लाया जाता है। एक बार प्रत्येक परिवर्ती के लिए तटरेखा के प्रत्येक खंड हेतु जोखिम मूल्य ज्ञात कर लेने पर, विभिन्न श्रेणियों के परिवर्तियों के गुणनफल के वर्गमूल के रूप में तटवर्ती सुभेद्यता सूचकांक की गणना कर ली जाती है, जिसे परिवर्तियों की कुल संख्या से विभाजित कर दिया जाता है (पेंडलटन एटअल, 2005)।

परिणाम

समष्टि पैमानों (1:100,000) जो सम्पूर्णभारतीय तटरेखा को कवर करते हैं, के आधार पर सुभेद्यता के बारे में विचार करने वाला यह पहला अध्ययन है। सामान्य प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि तटवर्ती राज्यों के उत्तरी भागों : तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल, महाराष्ट्र और गोवा, दक्षिणी और तटरेखी राज्यों के मध्यभागों की तुलना में उच्च और बहुत उच्च सुभेद्यता सूचकांक दर्शाते हैं – गुजरात इसका अपवाद है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के लिए उत्तर दक्षिण प्रवृत्ति भी स्पष्ट है। समुद्रतल और भूभाग के उन्नतांश के कारण लक्षद्वीप द्वीपसमूह उच्च से बहुत उच्च सूचकांक को दर्शाते हैं, मिनिकॉय में सुभेद्यता कच्छ के प्रवाहों द्वारा स्थानीय सुभेद्यता दर्शाने के कारण गुजरात की खम्भात और कच्छ की खाड़ी अत्यधिक उच्च स्थानों पर अत्यधिक उच्च सुभेद्यता सूचकांक दर्शाता है, जबकि उसके पूर्वोत्तर भाग हल्के उन्नतांश क्षेत्रों में विद्यमान मैंग्रोवों के कारण निम्न सुभेद्यता सूचकांक दर्शाते हैं। यह अच्छी तरह से प्रलेखित किया जा चुका है मैंग्रोव लहरों को तोड़ देते हैं, ऊर्जा को बिखरा देते हैं और इसलिए प्राकृतिक अवरोध के रूप में कारगर हैं।

अध्ययन में विचार किए गए सात पैरामीटरों के अनुरूप सुभेद्य क्षेत्रों के बारे में वर्णन किया गया है। इसलिए ये मानचित्र सम्पूर्ण सुभेद्यता के मानचित्र ने होकर कुल सुभेद्यता का निर्माण करने वाले अनिवार्य पहलुओं के मानचित्र हैं। उनमें समस्याग्रस्त क्षेत्रों का वर्णन किया गया है और इसलिए उनके अधिवास के पैमाने के संदर्भ में और उच्चतर समाधान की दृष्टि से उनकी सुभेद्यता का विश्लेषण करने हेतु इन क्षेत्रों पर आगे और ध्यान दिए जाने का निदेश दिया जाना चाहिए। चक्रवात, तूफान और तटवर्ती बाढ़ जैसे अतिरिक्त पैरामीटरों के उपयोग से वर्तमान अध्ययन को एक अतिरिक्त आयाम मिलेगा।

इस तकनीक का प्रयोग करते हुए तैयार किए गए तटवर्ती सुभेद्यता मानचित्र तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के संभावित खतरे के बारे में व्यापक संकेतक के रूप में कार्य करते हैं। तटवर्ती जोखिमों से जुड़े खतरे का निर्धारण करने का यह एक वस्तुपरक क्रियाविधि है और तटवर्ती प्रबंधकों और प्रशासकों द्वारा बेहतर आयोजना हेतु इनका प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है, जिससे जोखिमों के कारण होने वाले नुकसानों को कम किया जा सकेगा तथा साथ ही आपदाओं के दौरान खाली कराये जाने वाले क्षेत्रों के बारे में प्राथमिकता भी तय की जा सकेगी।

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