भारत में विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति का बढ़ता जा रहा संकट

भारत में विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति का बढ़ता जा रहा संकट

By: Staff Reporter
भारत में उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों से, बढ़ती जा रही जनसंख्या की मांग को पूरा कर पाना संभव नहीं रह गया है। अत: अक्षय ऊर्जा की आपूर्ति को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
भूगोल और आप

आर्थिक विकास का देश में ऊर्जा उपयोग के साथ एक मजबूत अंतःसंबंध है। भारत में वर्ष 2005-06 और 2006-07 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में क्रमशः 9 प्रतिशत और 9.2 प्रतिशत वृद्धि दर रही थी। भारत को अपनी खपत का लगभग 75 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है। इसमें और वृद्धि होने की संभावना है, जिससे भारत की भावी ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारत का मजबूत और सतत आर्थिक विकास होने के कारण इसके ऊर्जा संसाधनों पर अत्यधिक जोर पड़ रहा है। ऊर्जा स्रोतों के मामले में मांग और पूर्ति के बीच असंतुलन है जिसके कारण बिजली आपूर्ति बढ़ाने हेतु सरकार द्वारा गंभीर प्रयास करना जरूरी है। इस प्रकार देश के सामने ऊर्जा की आपूर्ति के मामले में गंभीर बाधा उत्पन्न हो सकती है।

आर्थिक विकास, बढ़ती समृद्धि और शहरीकरण, प्रति व्यक्ति खपत में वृद्धि और ऊर्जा तक पहुँच का विस्तार ऐसे कारक हैं जिनसे बिजली की कुल मांग में भारी वृद्धि होने की संभावना है। विगत छः दशकों से भारत में अधिष्ठापित बिजली क्षमता में अत्यधिक वृद्धि होने के बावजूद आपूर्ति की तुलना में मांग अधिक रही है। अतः ऊर्जा की मांग-आपूर्ति के संबंध में असंतुलन उभर रहा है। बिजली क्षेत्र में व्यस्ततम क्षणों के दौरान आधिकारिक तौर पर 12.7 प्रतिशत बिजली की कमी पहले से ही मौजूद है और दीर्घावधि में इसमें और कमी आएगी। वास्तविक अर्थों में यदि हम ग्रामीण क्षेत्रों सहित पूरे देश में 24* 7 के आधार पर बिजली आपूर्ति का आकलन करें, तो व्यस्ततम क्षणों में इससे तीन गुना कम बिजली उपलब्ध रहती है। इस कमी के कारण सभी क्षेत्रों – औद्योगिक, वाणिज्यिक, संस्थागत या आवासीय में अत्यधिक मात्रा में डीजल और कैरोसिन तेल का उपयोग किया जा रहा है। ग्रामीण प्रकाश व्यवस्था में कमी के कारण केरोसिन तेल का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है।

अपने जीवन और आजीविका के मामले में 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या की वाणिज्यिक ऊर्जा तक पहुँच नहीं है। इस तक पहुँच वाले अन्य लोगों को अक्सर बिजली आपूर्ति और अन्य ईंधनों के मामले में अनियमित उपलब्धता की स्थिति का सामना करना पड़ता है। संसाधन उपलब्धता और उनके वितरण तंत्रों के मामले में पेश आ रही बाधाओं के कारण ऊर्जा आपूर्ति के पारम्परिक साधन कम पड़ रहे हैं। भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा होने की संभावना है, जहां ऊर्जा तक पहुँच एक समस्या बनी रहेगी।

अक्षय ऊर्जा की भूमिका

उपर्युक्त स्थिति जहां भी, जब भी संभव हो, अक्षय ऊर्जा संसाधनों के दोहन को अनिवार्य बना देती है। अक्षय ऊर्जा अब ’वैकल्पिक ऊर्जा’ नहीं रह गई है, बल्कि राष्ट्र की ऊर्जा जरूरतों के समाधान की दिशा में वह एक प्रमुख भाग बनती जा रही है। वस्तुतः इस दिशा में शुरूआत हो चुकी है और अब यह भारत की ऊर्जा आयोजना प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण संघटक बन चुकी है। इसमें देश के सुदूरतम भाग में भी विकेन्द्रीकृत ऊर्जा जरूरतों का समाधान करने की क्षमता मौजूद है।

अक्षय ऊर्जा अवसंरचना

सरकारी स्तर पर, अक्षय ऊर्जा के बारे में राजनीतिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप 1982 में इसका दर्जा बढ़ाकर गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के प्रथम विभाग की स्थापना हुई थी। 1992 में एक पूर्ण अपरम्परागत स्रोत मंत्रालय के रूप में इसका गठन कर दिया गया तथा बाद में इसका नाम बदलकर नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय कर दिया गया। आज सभी 28 राज्यों और 7 संघ राज्य क्षेत्रों में नोडल विभाग/अभिकरण मौजूद हैं जो अपने-अपने राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों के कार्यक्रमों/योजनाओं को अनन्य रूप से कार्यान्वित कर रहे हैं। मंत्रालय के चार विशेष संस्थान हैं- गुड़गांव में सौर ऊर्जा केन्द्र (सौर ऊर्जा के लिए), चेन्नई में पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी केन्द्र (पवन ऊर्जा के लिए), जालंधर में सरदार स्वर्ण सिंह  राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा संस्थान तथा नई दिल्ली में भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (वित्तीय संस्थान)।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और राष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाओं जैसे बहुत सारे प्रमुख अभियांत्रिकी संस्थानों द्वारा देश में मौलिक और अनुप्रयुक्त अनुसंधान एवं विकास का कार्य किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप सौर जल तापकों, सौर प्रकाश प्रणालियों, सौर रसोई प्रणालियों, सौर अंतरिक्ष वातानुकूलन, सौर बिजली संयंत्रों, बायोगैस संयंत्रों, बायोमास गैसीकरण आधारित वैद्युतीय तापीय एवं यांत्रिक प्रणालियां, बायोमास आधारित जल संयंत्रों, पवन बिजली, लघु पन बिजली आदि जैसी वास्तविक रूप से उपयोगी अक्षय ऊर्जा प्रणालियों और साधनों का विकास हो पाया है।

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की गतिविधियां

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय अक्षय बिजली, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रकाश, रसोई और प्रेरक बिजली के लिए अक्षय ऊर्जा का दोहन करने, शहरी क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा के उपयोग, उनका औद्योगिक और वाणिज्यिक अनुप्रयोग, वैकल्पिक ईंधनों के विकास और अनुप्रयोगों सहित व्यापक स्तर के कार्यक्रमों के लिए सुविधा जुटाने और उनके कार्यान्वयन का कार्य करता रहा है। मंत्रालय का प्रयास अक्षय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने, वहनीय अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का विकास करने और वर्तमान तथा आने वाले वर्षों में कुल ऊर्जा सम्मिश्रण में अक्षय ऊर्जा के योगदान को बढ़ाने का है।

मंत्रालय ने (1) प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान, विकास और प्रदर्शन के लिए बजटीय समर्थन प्रदान करने; (2) विभिन्न वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से संस्थागत वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराने और (3) ग्रिड में बिजली समाहित करने हेतु वित्तीय प्रोत्साहनों, कर अवकाश, अवमूल्यन भत्ता और पारिश्रमिक लाभ प्रदान करने जैसे निजी निवेश को बढ़ावा देने की त्रिस्तरीय कार्यनीति को अपनाया है। मंत्रालय राजस्व और वित्तीय प्रोत्साहनों के आकर्षक सम्मिश्रण के माध्यम से अक्षय ऊर्जा विकास को समर्थन देता रहा है। इनमें पूंजी/ब्याज राजसहायता, त्वरित अवमूल्यन, शून्य/रियायती उत्पाद एवं सीमा शुल्क और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन अथवा फीड-इन टैरिफ, क्षमता निर्माण, जागरूकता पैदा करना, संस्थागत विकास आदि शामिल हैं। अक्षय ऊर्जा अध्येतावृत्ति, पाठ्यक्रमों में अक्षय ऊर्जा पाठ्यक्रम को शामिल करने तथा अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में निरन्तर बढ़ती मानव संसाधन जरूरत को पूरा करने हेतु अक्षय ऊर्जा पेशेवरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने सहित गतिविधियों की एक पूरी श्रृंखला भी शुरू की गई है।

अक्षय ऊर्जा की प्रगति

भारत पारम्परिक तथा अक्षय ऊर्जा बिजली उत्पादन के क्षेत्र में लगातार प्रगति करता रहा है। वर्ष 2002 के बाद से बिजली उत्पादन की कुल क्षमता में अक्षय ऊर्जा ग्रिड की क्षमता का प्रतिशत चार गुना बढ़ा है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सतत प्रयासों के कारण नई विकेन्द्रीकृत अक्षय प्रणालियां अधिष्ठापित की गई हैं और पूरे देश में लोगों द्वारा उन्हें दैनिक उपयोग में लाया जा रहा है।

ग्रिडरहित अनुप्रयोग भारतीय अक्षय ऊर्जा की प्रमुख प्राथमिकताएं हैं। ऐसे अनुप्रयोग न केवल जीवाश्म ईंधनों का स्थान लेते हैं बल्कि उनकी खपत में कमी लाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। अक्षय ऊर्जा की शक्ति और क्षमता विकेन्द्रीकृत एवं वितरित मोड में बिजली पैदा करने में समर्थ रहने में निहित है जिसका लाभ यह है कि खपत वाले स्थानों पर ही उत्पादन किया जाता है तथा भूमि और पर्यावरण

संबंधी चिंताओं और समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है। तदनुसार, मंत्रालय ने एक समावेशी मोड में ग्रिडरहित कार्यक्रमों में तेजी से सुधार करने हेतु एक नीतिगत कार्यरूपरेखा उपलब्ध कराया है।

नई पहलें

देश भर में आम जनता के लिए अक्षय ऊर्जा को वहनीय बनाने तथा उनकी बिजली और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने हेतु कई नई पहलें की गई हैं। इनमें से कुछ निम्नानुसार है:-

  • जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन शुरू किया गया है तथा उसे प्रचालन में लाया गया है, जिसका उद्देश्य 2022 तक 20000 मेगावॉट सौर बिजली, 2000 मेगावॉट ग्रिडरहित सौर अनुप्रयोगों और 20 मिलियन वर्ग मीटर सौर तापीय संग्राहकों का अधिष्ठापन है। लगभग 80 मेगावॉट की ग्रिड से जुड़ी परियोजनाओं और 32 मेगावॉट ग्रिड रहित परियोजनाओं के कार्यान्वयन को मंजूरी दी गई है।
  • 1-2 मेगावॉट के अक्षय ऊर्जा संयंत्रों जहां 11 केवी के ग्रिड में बिजली समाहित की जा सकती है, की सहायता से वास्तविक प्रयोक्ता के लिए बिजली क्षमता बढ़ाए जाने को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है। इससे 5-7 प्रतिशत तक पारेषण क्षय कम होने और वास्तविक प्रयोक्ता स्थल तक वोल्टेज और बारम्बारता दोनों ही स्थितियों में सुधार होने की उम्मीद है।
  • लघु/सूक्ष्म पनबिजली और सौर प्रकाश वोल्टीय बिजली परियोजना प्रणालियों, जल तापन/स्थान तापन/रसोई जरूरतों के लिए तापीय प्रणालियों के माध्यम से डीजल खपत घटाने हेतु 473 करोड़ रुपए के बजट से लद्दाख में एक विशेष परियोजना शुरू की गई है।
  • आँगनवाड़ी, विद्यालयों में मध्याह्न भोजन, ढाबों आदि जैसे सामुदायिक अनुप्रयोग के लिए बड़े आकार के दक्ष बायोमास आधारित रसोई-चूल्हों की क्षमता का प्रदर्शन करने हेतु एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है।
  • सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों में “बनाओ, अपनाओ, प्रचालन करो और स्थानान्तरित करो” के मॉडल के माध्यम से 21 खोई सह उत्पादन परियोजनाएं शुरू की गई हैं।
  • सौर शहर कार्यक्रम के अधीन हरित टाउनशिप के रूप में 60 सौर शहर और 50 नए टाउनशिप/परिसर विकसित किए जा रहे हैं।
  • समेकित अधिवास मूल्यांकन हेतु हरित रेटिंग वाले हरित भवनों (गृह) की मूल्यांकन प्रणाली को बढ़ावा दिया जा रहा है और 5 मिलियन वर्ग मीटर निर्माण क्षेत्र के साथ अब तक 117 परियोजनाओं का गृह मूल्यांकन की प्राप्ति के लिए पंजीकरण किया जा चुका है।
  • विद्युत मंत्रालय द्वारा अक्षय ऊर्जा खरीद बाध्यता तंत्र का प्रचालन किया गया है ताकि अक्षय ऊर्जा प्रमाण पत्रों को सुगम बनाया जा सके जिससे अक्षय ऊर्जा अधिष्ठापनों को बढ़ावा मिलेगा।

अक्षय ऊर्जा और निजी क्षेत्र

भारत में अक्षय ऊर्जा के विकास का नेतृत्व प्रमुखतः निजी क्षेत्र द्वारा किया गया है। विश्व में अक्षय ऊर्जा निवेश के मामले में चार सर्वाधिक  आकर्षक देशों में विराट और युवा भारत का स्थान चौथा है, वह अब केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी से पीछे है। एक आकलन के अनुसार, 2009 में भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में कुल 135 बिलियन रुपए का वित्तीय निवेश किया गया। इसके अलावा, भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का सक्रिय वित्तपोषण कर रहे हैं।

निजी क्षेत्र का देश में एक बड़ा विनिर्माण आधार है। वस्तुतः सौर सेलों और मॉड्यूलों, पवन बिजली मशीनरी और उपकरणों, बायोमास गैसीफायरों, सौर तापीय संग्राहकों और संकेन्द्रकों, लघु पनबिजली टरबाइनों के विनिर्माण से न केवल घरेलू बाजार की मांग पूरी हो रही है, बल्कि कई विकसित देशों को उनका निर्यात भी किया जा रहा है।

निष्कर्ष

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की इन कार्यनीतियों और नीतियों के परिणामस्वरूप लागत में कमी आने, बाजार के खुलने, व्यापार मॉडलों का विकास होने, नियामक और नीतिगत पहलों में सुधार होने, निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ने, इन-हाउस अनुसंधान और विकास तथा आयात के माध्यम से नई प्रौद्योगिकियां लाये जाने तथा उन पर निगरानी रखे जाने की उम्मीद है। देश में अक्षय ऊर्जा की उच्च प्रारंभिक लागत की क्षतिपूर्ति करने और उनका समुचित प्रसार करने हेतु और अधिक धनराशि की जरूरत है। वस्तुतः अक्षय ऊर्जा को एक वैकल्पिक ऊर्जा नहीं मानकर, उसे देश में ऊर्जा के समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए। अक्षय ऊर्जा को सभी के द्वारा अपनाए जाने की जरूरत है और इसे केवल सरकार संचालित/प्रोत्साहित क्षेत्र नहीं बने रहने देना चाहिए।

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