भारत में जल संसाधनों का भौगोलिक वितरण

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

भारत अनेक नदियों तथा पर्वतों का देश है। इसका भौगोलिक क्षेत्र 329 मिलियन हेक्टेयर है जिसमें छोटी बड़ी अनेक नदियों का जाल फैला हुआ है। इन नदियों में से अनेक नदियां संसार की कुछ बड़ी नदियों में से एक हैं । नदियों तथा पर्वतों की भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि ये नदियां भारतीय जन जीवन की आत्मा एवं हृदय है। भारत परिसंघ के ढांचे पर राज्यों का संघ है और इसमें 29 राज्य एवं 7 संघ शासित क्षेत्र हैं । भारत की 1 अरब 50 करोड़ अनुमानित जनसंख्या में से अधिकतर जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में ही रहती है तथा कृषि एवं प्राकृतिक जल संसाधनों पर निर्भर है और इनकी खुशहाली का जरिया ये नदियां ही हैं।

देश की उत्तरी सीमाओं पर विशाल हिमालय तथा उसकी पाद पर्वतमालाओं और दक्षिण की ओर से महासागर की उपस्थिति इस क्षेत्र की जलवायु को मुख्य रूप से प्रभावित करती है। महान हिमालय तथा उसकी पर्वत श्रृंखलाएं मध्य एशिया से आने वाली शीत हवाओं के सामने एक अभेद्य दीवार की तरह खड़ी हैं जो इस उपमहाद्वीपीय क्षेत्र को उष्णकटिबंधीय प्रकार की जलवायु प्रदान करती हैं और दक्षिण में महासागर की उपस्थिति महासागर की ओर से आने वाली ठंडी आर्द्र हवाओं का स्रोत है जिसके कारण इस क्षेत्र को महासागरीय प्रकार की जलवायु भी उपलब्ध होती है।

भौगोलिक स्थिति

भारत की भौगोलिक स्थिति को सात स्पष्ट क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है जो इस प्रकार से हैं :

  • उत्तरी पर्वत शिखर जिनमें विशाल हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं हैं।
  • सिंधु तथा गंगा-ब्रह्मपुत्र प्रणाली के विशाल मैदान। इसमें से एक-तिहाई भाग पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में पड़ता है। बाकी का भू-भाग उपजाऊ एवं जल संसाधनों युक्त है।
  • मध्य उच्च भूमि जिसमें पहाड़ियों की पश्चिम से पूर्व तक एक लंबी चौड़ी पट्टी है जो पश्चिम में अरावली पर्वतमाला से आरंभ होती है और पूर्व में जाकर तीव्र ढलान के साथ समाप्त हो जाती है। यह क्षेत्र विशाल मैदानी भाग तथा दक्कन पठार के बीच पड़ता है।
  • प्रायद्वीपीय पठार में पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, उत्तरी दक्कन पठार, दक्षिणी दक्कन पठार तथा पूर्वी पठार शामिल है।
  • पूर्वी तट जो कि 100-130 किलोमीटर चौड़ी भू-पट्टी है जो पूर्वी घाट के पूर्व में बंगाल की खाड़ी की सीमा रेखा बनाती है।
  • पश्चिमी घाट कि एक 10-25 किलोमीटर चौड़ी भू-पट्टी है और अरब सागर की सीमा रेखा बनाती है | द्वीपों में अरब सागर में प्रवाल से बना लक्षद्वीप है और बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार द्वीप समूह है।

भारत की जलवायु

भारत की जलवायु बहुत विविधता और भिन्नता से संपन्न तो है ही, यहां का मौसम भी विविधता लिए हुए है जलवायु उष्णकटिबंधीय प्रकार से लेकर महासागरीय प्रकार की विविधता लिए हैं जो अत्यधिक शीत से लेकर अत्यधिक उष्ण है और अत्यंत शुष्क से लेकर नगण्य वर्षा तथा अत्यधिक आर्द्रता से लेकर मूसलाधार वर्षा तक है। इसलिए किसी भी प्रकार की जलवायु का सामान्यीकरण करने की आवश्यकता से बचा जाना चाहिए क्योंकि न केवल पूरे देश बल्कि देश के अन्य बड़े क्षेत्रों में भी किसी विशेष जलवायु की प्रधानता नहीं है। देश की जलवायु परिस्थितियां इसके जल संसाधनों के उपयोग को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं।

भारत में वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून, उत्तरी-पूर्वी मानसून, छिछले चक्रवात दबाव एवं विक्षोभ और स्थानीय तीव्र तूफानों पर निर्भर है। यहां से उठने वाली ठंडी आर्द्र हवाएं और भूमि की ओर से आने वाली गर्म हवाएं जब आपस में मिलती हैं तो वे कभी-कभी चक्रवाती स्थिति तक पहुंच जाती हैं। तमिलनाडु को छोड़कर शेष भारत में अधिकतर वर्षा जून-सितम्बर के दौरान दक्षिण-पश्चिमी मानसून के कारण तथा तमिलनाडु में वर्षा अक्तूबर और नवम्बर में उत्तरी-पूर्वी मानसून के कारण होती है। भारत में वर्षा की मात्रा विविधता, असमान मौसमी वितरण, असमान भौगोलिक वितरण और सामान्य से तीव्र विचलन लिए हुए हैं। सामान्यतः 78 डिग्री देशांतर पूर्व के क्षेत्रों में यह 1,000 मि.मी. से ज्यादा हो जाती है और उप-हिमालयी पश्चिमी बंगाल, अधिकतर असम, पश्चिमी घाट तथा संपूर्ण पश्चिमी तट में यह 2,500 मि.मी. को भी पार कर जाती है। पोरबंदर से दिल्ली तथा फिरोजपुर तक रेखा के पश्चिमी क्षेत्रों में वर्षा में 500 मि.मी. से गिरावट होकर दूरस्थ पश्चिमी क्षेत्र में 150 मि.मी. तक पहुंच जाती है। प्रायद्वीपीय क्षेत्र के बड़े हिस्से में 600 मि.मी. से भी कम वर्षा होती है जिनमें से कुछ क्षेत्र 500 मि.मी. वर्षा वाले हैं। औसतन वर्षा का अनुमान लगाना अनुमान लगाने की विधि के ऊपर निर्भर है।

भारत में तापमान

भारतीय उप-महाद्वीप में तापमान में भी विविधता दिखाई पड़ती है। नवम्बर से फरवरी के दौरान पूरे देश में महाद्वीपीय हवाओं के कारण दक्षिण से उत्तर की ओर सर्द ऋतु में तापमान गिर जाता है। सर्वाधिक ठंडे महीनों दिसम्बर से जनवरी के दौरान औसतन अधिकतम तापमान  प्रायद्वीपीय क्षेत्र में 28 डिग्री से. और उत्तरी क्षेत्र में 18 डिग्री सेल्सियस . के बीच रहता है। जबकि औसतन न्यूनतम तापमान दूरस्थ दक्षिण में 24 डिग्री सेल्सियस से लेकर उत्तरी क्षेत्र में 19 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। मार्च-मई के दौरान तापमान में तीव्र एवं लगातार वृद्धि होती है। सर्वाधिक तापमान उत्तरी भारत में पाया जाता है विशेष रूप से उत्तरी-पश्चिमी मरूस्थलीय इलाके में, जहां पर तापमान 48 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर जाता है। जून में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के आगमन के कारण देश के मध्य क्षेत्रों में अधिकतम तापमान में तेजी से गिरावट आती है। देश के दो-तिहाई क्षेत्र में तापमान एक समान बना रहता है और इस क्षेत्र में अच्छी वर्षा होती है। अगस्त में एक बार फिर तापमान में उल्लेखनीय गिरावट आती है, जब सितम्बर में उत्तरी भारत से मानसून की वापसी होती है। नवम्बर के महीने में उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसतन अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से कम तथा औसतन न्यूनतम तापमान 10 डिग्री से. से कम हो जाता है। दूरस्थ उत्तरी भारत में तापमान हिमांक से भी नीचे चला जाता है।

भारत में कृषि जलवायु क्षेत्र

योजना आयोग ने कृषि अर्थव्यवस्था के क्षेत्रीयकरण के लिए किये गये अध्ययन की समीक्षा करने के बाद अपनी सिफारिश की थी कि कृषि योजना कृषि जलवायु के आधार पर तैयार की जानी चाहिए। संसाधनों के विकास के लिए कृषि-जलवायु लक्षण, विशेष रूप से मृदा प्रकार, जलवायु जिसमें तापमान एवं वर्षा तथा उसकी भिन्नता और जल संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर देश को मोटे तौर पर पन्द्रह कृषि क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया है। ये पन्द्रह कृषि क्षेत्र इस प्रकार हैं  :

  1. पश्चिमी हिमालयन खंड, 2. पूर्वी हिमालयन खंड, 3. गंगा का निचला मैदान, 4. गंगा का मध्य मैदान, 5. गंगा का ऊपरी मैदान, 6. गंगा पार का मैदान, 7. पूर्वी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र, 8. मध्य पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र, 9. पश्चिमी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र, 10. दक्षिणी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र, 11. पूर्वी तटीय मैदान एवं पहाड़ी क्षेत्र, 12. पश्चिमी तटीय मैदान एवं पहाड़ी क्षेत्र, 13. गुजरात का मैदान एवं पहाड़ी क्षेत्र, 14. पश्चिमी मैदान एवं पहाड़ी क्षेत्र और 15. द्वीपीय क्षेत्र।

भारत में नदियां

भारत अनेक नदियों से सम्पन्न प्राकृतिक जल संसाधनों वाला देश है। 12 नदियों को विशाल नदियों की श्रेणी में रखा गया है और इनका जल ग्रहण क्षेत्र 2528 लाख हेक्टेयर है। इन बड़ी नदियों में से गंगा-ब्रह्मपुत्र मेघना प्रणाली का सर्वाधिक जल ग्रहण क्षेत्र है, जो लगभग 1100 लाख हेक्टेयर है जो कि देश की सभी बड़ी नदियों के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 43 प्रतिशत है। सिंधु (321 लाख हेक्टेयर), गोदावरी (313 लाख हेक्टेयर), कृष्णा (259 लाख हेक्टेयर), और महानदी (142 लाख हेक्टेयर), अन्य कुछ बड़ी नदियां हैं जिनका जल ग्रहण क्षेत्र 100 लाख हेक्टेयर से अधिक है। मध्यम आकार की नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र 250 लाख हेक्टेयर है जिसमें से सुवर्णरेखा नदी का जलग्रहण क्षेत्र सबसे अधिक 19 लाख हेक्टेयर है।

भारत में जलाशय

नदियों, नहरों, बड़े जलाशयों, तालाबों एवं तालों, निर्जन स्थान पर अप्रयुक्त एवं दुर्दशा युक्त जल, बील, गोखुर झीलों और खारे जल के स्रोतों को अंतःस्थलीय जल संसाधनों के रूप में विभाजित किया गया है। नदियों तथा नहरों को छोड़कर अन्य जल संसाधनों से 70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर होता है। उत्तर प्रदेश में नदियों एवं नहरों की लंबाई सर्वाधिक 31200 किलोमीटर है जो कि देश की नदियों एवं नहरों की कुल लंबाई की 17 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश के बाद अन्य राज्यों में जम्मू और कश्मीर तथा मध्य प्रदेश आते हैं। बाकि बचे अंतःस्थलीय जल संसाधनों, तालाबों एवं तालों, गोखुर झीलों और खारे जल स्रोतों में अधिकतम क्षेत्र 29 लाख हेक्टेयर तथा बड़े जलाशयों में 21 लाख हेक्टेयर है। अधिकतर तालाब एवं तालें कर्नाटक, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में पड़ते हैं। ये राज्य अन्य राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर देश के कुल तालाबों एवं तालों के तहत आने वाले क्षेत्र का 62 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। जहां तक जलाशयों की बात है , बड़े राज्यों जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में अधिकतम क्षेत्र जलाशयों के तहत आता है। निर्जन स्थान पर अप्रयुक्त एवं दुर्दशा युक्त जल, बील, गोखुर झीलों और खारे जल के स्रोतों के तहत उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और असम आते हैं। खारे जल के स्रोतों में उड़ीसा का पहला स्थान है। उसके बाद गुजरात, केरल और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है। अतः अंतःस्थलीय जल संसाधनों के कुल क्षेत्र का देश के पांच राज्यों उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में असमान रूप से वितरण हो रखा है जो कि देश के अंतःस्थलीकरण जल संसाधनों का आधे से भी ज्यादा है।

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