पृथ्वी पर मौजूद जीवों का उत्पत्ति काल तथा कल्प की अवधि की गणना

पृथ्वी पर मौजूद जीवों का उत्पत्ति काल तथा कल्प की अवधि की गणना

By: Staff Reporter
पृथ्वी की उत्पत्ति के 4.6 अरब वर्षों को 4 महाकल्पों में बांटा गया है। इन महाकल्पों के अंतर्गत विभाजित काल की अवधि सहित जीवों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है।
भूगोल और आप

सर्वमान्य तथ्य के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुई थी। पृथ्वी लगभग 0.6 अरब वर्ष तक एक गैसीय पिण्ड के रूप में थी, जिसके अर्न्तगत् विभिन्न प्रकार की भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाएं सम्पादित हो रही थीं। इसी के फलस्वरूप कालान्तर में यह एक ठोस संरचना में परिवर्तित हो गई।

3.6 अरब वर्ष पूर्व प्रथम जीव का उद्भव हुआ। पृथ्वी पर आदिकाल से लेकर आज तक भौतिक, रासायनिक एवं जैविक घटनाएं सतत् रूप से चल रही हैं। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक के  समय काल को 4 महाकल्पों में विभाजित किया गया।

1) प्रीकैम्ब्रीयन महाकल्प

आर्कियोजोइक तथा प्रोटेरिओजोइक महाकल्पों को संयुक्त रूप से प्रीकैम्ब्रीयन महाकल्प की संज्ञा दी जाती है: इसकी कल्प अवधि लगभग 3.41 अरब वर्ष थी। इस महाकल्प में पृथ्वी की भूपर्पटी शिथिलीकरण प्रक्रिया से गुजर रही थी। विद्वानों के अनुसार इस महाकल्प में उत्तरी अमेरिका, ग्रेट-लेक्स (5 महान झीलें) के चारों ओर 3 पर्वतों (लॉरेशिया, अलगोमन तथा किलारनियन) का निर्माण हुआ। इसी प्रकार स्कॉटलैण्ड की उत्तर-पश्चिमी भाग की उच्च भूमि में कुछ इसी समय के पर्वत पाये गये। 

2) पैलियोजोइक महाकल्प

यह महाकल्प आज से लगभग 59 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुआ जिसका अन्त आज से 24.8 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। अर्थात् इस कल्प की अवधि 34.2 करोड़ वर्ष थी। महत्वपूर्ण भौमिक एवं जैविक परिवर्तनों के कारण इस महाकल्प को 6 कल्पों में विभाजित किया गया  है :

  • कैम्ब्रीयन कल्प: इस कल्प की अवधि लगभग 8.5 करोड़ वर्ष थी। इस कल्प में वेल्श यॅमसेद्ध की कैम्ब्रीयन रॉक व उत्तर-पश्चिम स्काटलैण्ड तथा पश्चिम इंग्लैण्ड की उच्च-भूमि का निर्माण हुआ। इसी समय भारत में विंध्य-पर्वत का निर्माण हुआ। पादपों में शैवाल का विकास तीव्र होने लगा। जन्तुओं में स्पंज, सिलेण्ट्रेट्स, एनीलीडा, मोलस्का तथा इकाइनोइर्मेटा संघ के कई जन्तुओं की उत्पत्ति हुई।
  • आर्डोविसियन कल्प : इस कल्प की अवधि लगभग 6.7 करोड़ वर्ष थी। इस समय पृथ्वी के वायुमण्डल का तापमान अधिक था तथा ध्रुवों की जलवायु भी अत्याधिक गर्म थी। अर्थात् समस्त पृथ्वी पर जलवायु एक समान थी। प्रमाण के अनुसार, इस समय अत्यधिक ज्वालामुखी प्रक्रियाएं सम्पादित हुई थीं, जिसके परिणामस्वरूप ज्वालामुखी चट्टानें स्लेट-चूना आदि के पत्थरों का विस्तार अधिक मिलता है। पादपों में समुद्री शैवाल अधिक प्रभावी हो गए। इसके साथ-साथ कुछ स्थलीय पौधे भी विकसित हुए। जन्तुओं में कोरल निर्माण करने वाले जन्तुओं की अधिकता हो गई। इसके साथ-साथ दैत्याकार मोलस्क (ऑक्टोपस) के साथ-साथ बिना जबड़े वाली मछलियों का उद्भव हो गया। अतः यहाँ प्रथम कशेरूकी का विकास हो गया।

(ग) सिल्यूरियन कल्प: इस कल्प की अवधि लगभग तीन करोड़ वर्ष थी। इसी समय कैलिडोनियन हलचल प्रारम्भ हुई थी जो परमियन की शुरूआत तक जारी रही। इस हलचल के परिणामस्वरूप स्काटलैण्ड का कैलिडोनिया पर्वत, आयरलैण्ड के पर्वत, स्कैण्डीनेवीयन पर्वत, ब्राजील की उच्च भूमि तथा भारत में अरावली, सतपुड़ा एवं महादेव आदि पर्वतों का उद्भव हुआ। पादपों में शैवालों का प्रभाव कायम रहा एवं फर्न जैसे स्थलीय पौधे प्रकट हुए। जन्तुओं में बिच्छु-मकड़ी के साथ-साथ पंख रहित कीटों की उत्पत्ति हुई।

(घ) डिवोनियन कल्प:  इस कल्प की अवधि 4.8 करोड़ वर्ष थी। इस समय कैलीडोनियन हलचल अपने चरम बिन्दू पर थी। स्थलीय वनस्पतियों में मॉस, लाइकोपोडियम आदि का विकास हो रहा था तथा जिम्नोस्पर्म प्रकार के पादपों की भी उत्पत्ति हो गई (जैसे- साइकस और चीड़ का पौधा)। जन्तुओं में मछलियों का प्रभाव चरम पर था, अतः इस कल्प को मछलियों का युग भी कहा जाता है।

(ङ) कार्बोनिफेरस कल्प: इसकी अवधि लगभग 7.8 करोड़ वर्ष थी। इस समय जलवायु गर्म एवं नम थी। कार्बोनिफेरस कल्प में अत्यधिक भूगर्भिक परिवर्तन हुए जिसके फलस्वरूप तत्कालीन समय में उपस्थित जंगल व जन्तु भू-सतह के नीचे दब गए। जो आन्तरिक ऊष्मा के प्रभाव के कारण कोयला तथा खनिज तेल इत्यादि में परिवर्तित हो गए। अत्यधिक भूगर्भिक परिवर्तन के कारण पृथ्वी का अधिकांश भाग दलदल में परिवर्तित हो गया था। पादपों में क्लव-मॉस, फर्न तथा जिमनोस्पर्म प्रकार के पादपों का विस्तार तीव्र गति से हो रहा था। जन्तुओं में उभयचर का विकास चर्म बिन्दु पर था। अतः इसे उभयचरों का युग भी कहा जाता है। इसी समय प्रथम सरीसृप का उदय हुआ।

(च) परमियन कल्प: इस कल्प की अवधि लगभग 3.8 करोड़ वर्ष थी। इस कल्प में तीसरी पर्वत निर्माण प्रक्रिया शुरू हुई, जिसे हर्सियन हलचल के नाम से जानते हैं। इसे आरमोरिकन हलचल के नाम से भी जाना जाता हैं। उपरोक्त हलचल के परिणामस्वरूप उच्च-भूमि का उद्भव व विकास हुआ, जैसे- स्पेनिश मेसोटा (स्पैन का पठार), युराल पर्वत, हार्ज (यूरोप), एशिया की उच्च भूमि . एल्टाईशान, नानशॉंन, मंगोलिया तथा गोबी के पर्वत, चूगोकू पर्वत (जापान) आदि का निर्माण हुआ।

पादपों में प्रथम शंकुधारी वृक्ष तथा सागौन, चीड़ व साइकस का विकास हुआ (जिम्नोस्पर्म)। जन्तुओं में प्रारम्भिक मछलियां (बिना जबड़े वाली) विलुप्त होने लगीं। सरीसृपों में कछुआ तथा छिपकलियों का उद्भव हुआ। विशाल कीटों की जगह छोटे-छोटे कीटों का विकास हुआ।

3) मिसोजोइक महाकल्प

यह महाकल्प 24.8 करोड़ वर्ष पूर्व शुरू हुआ था तथा 18.3 करोड़ वर्ष तक चला। इसे सरीसृपों का युग कहा जाता है। इस महाकल्प को पुनः तीन भागों में विभाजित करते है :

  • ट्राइऐसिक कल्प : इस कल्प की अवधि लगभग 3.5 करोड़ वर्ष थी। इस कल्प में भू-सतह कुछ ऊपर उठ गई तथा महाद्वीपीय क्षेत्रों के साथ-साथ रेगिस्तानों का विस्तार हुआ क्योंकि, तत्कालीन समय की जलवायु गर्म तथा शुष्क थी। इसी समय कहीं-कहीं नमकीन झीलों का विकास हो गया।

पादपों में इस समय फर्न तथा जिम्नोस्पर्मी पादपों का विकास उत्तरी गोलार्द्ध में अधिक हुआ। जन्तुओं में घोंघा, सिपिया (मोलस्का संघ) तथा छिपकली जैसे डायनासोर का विकास हुआ तथा इसी कल्प में प्रथम स्तनधारी का उद्भव हुआ जो बच्चे की जगह अण्डे देते थे।

  • जुरासिक कल्प: इस कल्प की अवधि 6.90 करोड़ वर्ष थी। इस कल्प में लॉरेशिया तथा गोण्डवाना लैण्ड दोनों ही विखण्डित हो गए। यूरोप तथा एशिया के अधिकतर भाग जलमग्न हो गए। फ्रांस, दक्षिण जर्मनी तथा स्वीट्जरलैण्ड की अधिकतर भूमि में प्रथम द्विबीजपत्री की उत्पत्ति हुई तथा इसके साथ-साथ जिनोस्पर्म का भी व्यापक स्तर पर विस्तार जारी रहा। इस युग में डायनासोरों का प्रभुत्व कायम रहा। इग्वानोडॉंन, टाइरैनोसायर जैसे भीमकाय डायनोसोर इस समय उपस्थित थे। कंगारू जैसे मार्सूपियल्स का उद्भव हुआ। इसी समय प्रथम पक्षी का भी उद्भव हुआ। इसमें आर्कियोप्टेरिस पक्षी और सरीसृप के बीच की कड़ी थी।
  • क्रिटेसियस् कल्प: इस कल्प की अवधि 7.9 करोड़ वर्ष थी। इस समय चौथी हलचल शुरू हो गई थी। जो सीनोजोइक महाकल्प के प्लिस्टोसीन युग तक जारी रहा। इसे अल्पाइन हलचल की संज्ञा भी दी जाती है। इस हलचल के परिणामस्वरूप आधुनिक वलित एवं मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति हुई। जैसे- उत्तरी अमेरिका का रॉकी, दक्षिणी अमेरिका का एण्डीज। यूरोप के आल्पस, पेरीनीज, एपीनाइन, डिनारिक आदि। अफ्रीका में एटलस। एशिया में हिमालय तथा पूर्वी द्वीप समूह। इसी समय भारत का प्रायद्वीप पठार मोटे लावा की परतों से घिर गया था।

पादपों में एन्जियोस्पर्म प्रकार के पादपों का प्रभाव जारी रहा तथा एक बीजपत्री पौधों का विकास हुआ। जन्तुओं में विशालकाय सरीसृपों जीव जैसे- डायनासोर अपनी विकास की चरम सीमा पर पहुँच कर विलुप्त हो गए।

4) नूतनजीवी महाकल्प

इस युग में वर्तमान महाद्वीप भूखण्ड, समुद्र, नदियां एवं पर्वत अपने स्थापना के दौर से गुजर रहे थे। इस कल्प की अवधि 6.50 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई थी जो आज तक जारी है। इस युग को स्तनधारियों, कीटों एवं एन्जियोस्पर्मी पादपों का युग कहा जाता है। यद्यपि इस महाकल्प में मछलियों तथा पक्षियों का विकास जारी रहा। इस महाकल्प को 2 कल्पों में बाटा गया है-

  • तृतीयक कल्प: जिसकी अवधि 6.30 करोड वर्ष मानी जाती है।
  • चतुर्थक कल्प: जिसकी अवधि पिछले 20 लाख से अब तक का समय।

तृतीयक कल्प  को पुनः 5 युगां में विभाजित करते हैं:-

(क) पैलिओसीन युग:  (अवधि 1.01 करोड़ वर्ष) इस युग में अल्पाइन हलचल जारी थी तथा जलवायु के स्वरूप में शीतलता आ रही थी। पादपों में पुष्पी पादपों तथा आदि स्तनियों का विकास तेजी से हुआ।

(ख) इओसिन युग : (अवधि 1.69 करोड़ वर्ष) इस समय जलवायु शीतल हो रही थी तथा अल्पाइन हलचल भी जारी थी। वास्तव में हिमालय का विकास इसी युग में आरम्भ हुआ। हिन्द महासागर तथा अटलांटिक महासागर का विकास हो रहा था। भारतीय प्रायद्वीपीय भाग पर लावा का जमाव जारी था।

पादपों में वर्तमान पादपों की उत्पत्ति हुई जिसमें घास के मैदान प्रमुख हैं। जन्तुओं में हाथी, घोड़ा, गेंडे, सूअर, चूहे, आदिकालीन बन्दर तथा गिब्बन आदि का विकास हुआ। समुद्री-व्हेल, समुद्री-गाय जैसे जलीय स्तनधारियों का भी विकास हुआ तथा आधुनिक पक्षी का विकास जारी था।

  • ओलीगोसीन युग: (अवधि 1.38 करोड़ वर्ष) इस समय विश्व के कुछ स्थलों का तीव्र गति से अवतलीकरण (नीचे धंस जाना) हुआ। अमेरिकी तथा यूरोपीय भूखण्डों में संचलन तीव्र हो गया तथा इसी युग में आल्पस की निर्माण प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई। इस युग में महान हिमालय का विकास हुआ। इस समय की जलवायु अपेक्षाकृत कुछ गर्म हो गयी। पादपों में उष्ण कटिबंधीय जंगलों का विस्तार हो गया। जन्तुओं में घोड़े का विकास जारी रहा तथा इसी समय कपि मानव की उत्पत्ति हुई।

(घ) मायोसीन युग: (अवधि 1.95 करोड़ वर्ष) इस युग में जलवायु फिर ठण्डी होने लगी तथा आल्पस में दूसरी उच्चावचन प्रक्रिया आरम्भ हुई। एशिया में ग्रेटर तथा निचले हिमालय में पुनः उच्चावचन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई, फलतः मध्य हिमालय का विकास हुआ। उत्तरी अमेरिका में कॉस्केड श्रेणी के उदय के साथ ही ज्वालामुखी पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इस युग में जलवायु शुष्क रेगिस्तानी तथा शीतल प्रकृति के अनुसार विभक्त हो गई अर्थात् कटिबंध का निर्माण हुआ। पादपों में इस समय एन्जियोस्पर्मी पादपों का विस्तार जारी था तथा जन्तुओं में भेड़, कुत्ते, बिल्ली, बकरी आदि अन्य मांसाहारी जन्तुओं की उत्पत्ति हुई। आदिकालीन कपियों से मानव जैसे कपियों की उत्पत्ति हुई।

(ङ) प्लायोसीन युग: अवधि (31 लाख वर्ष) इस समय जलवायु ठण्डी हो गयी। प्लेटों के संचलन के कारण उत्तरी सागर, काला सागर, अरब सागर, कैस्पियन सागर आदि उत्पन्न हो गए। हिमालय में शिवालिक रेंज का विकास तीव्र गति से हुआ। ठण्डी जलवायु के कारण अधिकतर जंगल नष्ट हो गए व उनकी जगह काष्ठीय पादपों का विकास हुआ। मानव जैसे कपियों से प्रथम आदिमानव की उत्पत्ति हुई तथा घोड़े का भी विकास हुआ।

(ख) चतुर्थक कल्प 20 लाख वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ था तथा वर्तमान तक जारी है। इसे पुनः 2 युगों में बांटते हैं:

(1) प्लीस्टोसीन युग: (अवधि 19.89 लाख वर्ष) इस समय जलवायु शीतल हो चुकी थी तथा इस युग को 4 हिमयुगों में विभाजित किया जाता है।

इस समय अमेरिका की 5 महान झीलों- सुपीरियर, मिसीगन, हयूरान, ईटी, ओटारियों का निर्माण हुआ। इसके साथ-साथ नार्वे, स्वीडन, स्वीट्जरलैण्ड तथा इटली में कई प्रकार की झीलों का निर्माण हुआ। इस समय समुद्र तल काफी नीचा हो गया था। जिसके परिणामस्वरूप यूरोप तथा इंग्लैण्ड एवं साइबेरिया तथा अलास्का के बीच स्थल मार्ग उत्पन्न हो गए। इन्हीं स्थल मार्गों से जीवों का देशान्तरण हुआ। पादपों में शाकीय पादपों का विकास हुआ। मानव में सामाजिक रहन.सहन एवं सभ्यता का प्रचलन आरम्भ हुआ।

(2) होलोसीन युग: इस युग का प्रारम्भ लगभग 11 हजार ईसा पूर्व हुआ थाए जो आज तक जारी है। इसे आधुनिक मानव एवं एकबीजपत्री पादपों का युग कहा जाता है।

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