आणविक ऊर्जा

आणविक ऊर्जा पर भारत का जोर क्यों!

भूगोल और आप

भारतीय आणविक ऊर्जा अधिनियम, 1962 में आणविक और रेडियोधर्मी प्रौद्योगिकियों के विकास से सम्बंधित सभी पहलुओं के लिए कानून सम्मत अवसंरचना का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत आणविक प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा किया जाना भी शामिल है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा एजेंसी (आईएआईए) की भूमिका का सदैव समर्थन किया है।
समस्त विश्व इस बात से चिंतित है कि ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधन जल एवं खनिज भंडारों का क्षय निरन्तर होता जा रहा है। निकट भविष्य में इनके समाप्त हो जाने की आशंका है। विकल्प के तौर पर सौर ऊर्जा के प्रयोग पर बल दिया जाने लगा है। परन्तु वर्तमान समय में भारत में इसके प्रसार में कई प्रकार की बाधाएं हैं। ऐसे समय पर आणविक ऊर्जा के उत्पादन एवं उपयोग का प्रसार किये जाने की आवश्यकता है। आणविक ऊर्जा के उत्पादन के लिए यूरेनियम तथा थोरियम की बहुत सीमित मात्रा की आवश्यकता होती है। कम मात्रा में ही इनका प्रयोग कर बड़ी मात्रा में आणविक ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है।
एक टन यूरेनियम से तीन मिलियन टन कोयले अथवा 12 मिलियन बैरल कच्चे तेल के बराबर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। विद्युत उत्पादन के अलावा इसका उपयोग ईंधन के रूप में भी किया जाता है। अंतरिक्ष यान, समुद्री पोतों और खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों के लिए आणविक ऊर्जा का बहुत महत्व है। भारत में कैलेंडर वर्ष 2016 में 38781 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन आणविक ऊर्जा स्रोतों से किया गया था।

भारत का परमाणु ऊर्जा आयोग, जिसे संक्षेप में ए.ई.सी. (एटॉमिक एनर्जी कमीशन) कहा जाता है, इसकी स्थापना 1948 में की गई थी। 1969 में भारत के तारापुर परमाणु संयंत्र में आणविक ऊर्जा का उत्पादन शुरू हुआ था। भारत का पहला आणविक ऊर्जा रियेक्टर ‘अप्सरा’ 1956 में स्थापित किया गया था। भारत में वर्तमान में 20 परमाणु रियेक्टर काम कर रहे हैं और इनसे 4780 मेगावाट विद्युत उत्पन्न की जाती है।
भारत ने 1983 में आणविक ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी), की स्थापना की थी। यह भारत में ऊर्जा हेतु एक नियामक संस्था है। इसके अतिरिक्त नाभिकीय विज्ञान अनुसंधान बोर्ड (बीआरएनएस) आणविक ऊर्जा सम्बन्धी अनुसंधान और विकास गतिविधियों का संचालन करता है।
आणविक ऊर्जा के प्रयोग पर भारत का जोर इसलिए है, क्योंकि इसका उत्पादन करने में कार्बन डाई ऑक्साइड की बहुत कम मात्रा का उत्सर्जन वायुमंडल में होता है। इससे पर्यावरण के प्रदूषण पर रोक लगती है और ग्लोबल वार्मिंग की संभावना को कम किया जा सकता है। केवल एक ही उत्पादन इकाई अर्थात् परमाणु रियेक्टर से बड़ी मात्रा में आणविक ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों की बचत के साथ-साथ अन्य अपव्ययों को बचाकर लागत को कम किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में थोरियम से प्राप्त आणविक ऊर्जा अधिक पर्यावरण हितैषी, स्वच्छ और सुरक्षित है।

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