पर्यावरण की कितनी हितैषी है पवन ऊर्जा।

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

प्रायः पवन ऊर्जा का गुणगान हरित ऊर्जा के रूप  में किया जाता है। तथापि, पवन ऊर्जा फार्मों के इससे कही दूरगामी  पर्यावर्णिक एवं समाजिक परिणाम हो सकते हैं।

कच्छ (गुजरात) के नलिया नामक एक छोटे से कस्बे से 700 वर्ष पुराने गाँव जखाऊ और बुडिया की ओर जाते समय हमें अरब सागर और क्षितिज से मिलती हुई स्क्रबलैंड एवं चरागाहों का एक मिश्रित मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है। इस विस्तृत भूदृश्य में, जहाँ तक हम देख पाते हो, हवा में घूमती पवन टर्बाइनें दिखाई पड़ती हैं। यह सब कुछ गुजरात सरकार की उदार सहायता से कंपनियों द्वारा स्थापित एक भव्य हरित लोक जैसा लगता है। परन्तु यहाँ के ग्रामीण अपनी जमीनों के नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य के बारे में बहुत आशान्वित नहीं दिखते। आखिर ऐसा कयों?

भारत और पवन ऊर्जा

वर्षों से पवन ऊर्जा परियोजनाओं के आकार और लोकप्रियता दोनों में ही वृद्धि हुई है। वैस्विका  पवन ऊर्जा परिषद के अनुसार विश्वभर की कुल अधिष्ठापित पवन ऊर्जा क्षमता 318,137 मेगावॉट है। 91424 मेगावॉट की अधिष्ठापित क्षमता के साथ पवन ऊर्जा उत्पादन में चीन सबसे आगे है। इसके बाद 61091 मेगावॉट के साथ अमेरिका, 34250 मेगावॉट के साथ जर्मनी, 22959 मेगावॉट के साथ स्पेन का नंबर आता है जबकि 20150 मेगावॉट की अधिष्ठापित क्षमता के साथ भारत  5वें स्थान पर है (जीडब्ल्यूईसी, 2014, ‘वैश्विक सांख्यिकी’, वैश्विक पवन ऊर्जा परिषद)।

भारत ने पवन ऊर्जा की ओर अपना रुख 1980 के दशा में किया जब भारत सरकार ने अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत आयोग की स्थापना की जिसे 1992 में एक पूर्ण विकसित अपारंपरिक ऊर्जा संसाधन मंत्रालय के जरूरत में स्तरोन्नत किया गया। वर्ष 2006 में इसका नाम नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय रखा गया। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय 2011 में प्रकाशित ‘2011-17 की अवधि के लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए रणनीतिक योजना’ तथा वर्ष 2005 में पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी केंद्र द्वारा प्रकाशित ‘भारत में 80 मीटर स्तर पर अधिष्ठापनयोग्य पवन ऊर्जा संभाव्यता का आंकलन’ नामक रिपोर्टों के अनुसार भारत में 50 मीटर की ऊंचाई पर 48500 मेगावॉट तथा 80 मीटर की ऊंचाई पर 102788 मेगावॉट ऊर्जा के दोहन की संभाव्यता मौजूद है। 9वीं पंचवर्षीय योजना में भारत का पवन ऊर्जा उत्पादन 1667 मेगावॉट था जो बढ़कर चालू 12वीं पंचवर्षीय योजना में 20150 मेगावॉट हो गया है। पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी केंद्र के अनुसार भारत के विभिन्न राज्यों में पवन से ऊर्जा पैदा करने की संभाव्यता गुजरात में सबसे अधिक है, 50 मीटर ऊंचाई पर 10609 मेगावॉट तथा 80 मीटर ऊंचाई पर 35071 मेगावॉट। गुजरात के बाद राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओड़िशा और आंध्रप्रदेश का नंबर आता है।

आज के कार्बन नियंत्रित विश्व में बिजली पैदा करने में पवन चक्कियाँ महत्वपूर्ण हो गई हैं जो यथार्थतः उत्सर्जन मुक्त है। इनका केवल विद्युत उत्पादन ही उत्सर्जन मुक्त नहीं है बल्कि ऐसा कहा जाता है कि ये जल एवं जमीन जैसे संसाधनों पर बहुत कम दबाव डालती हैं। पर क्या सचमुच ऐसा है? एक पवन टर्बाइन हरित ऊर्जा पैदा कर सकती है जो नवीकरणीय होती है, यह स्वच्छ होती है तथा कई दशकों तक चलती है। परन्तु अचानक हजारों नहीं तो सैकड़ों टर्बाइनों वाले बड़े पैमाने के पवन ऊर्जा फार्म सैकड़ों वर्ग किलोमीटर जमीन पर तैयार हो जाने पर क्या होता है जैसा कि कच्छ, गुजरात में हुआ है जो पवन ऊर्जा के इस नए विश्व के लिए स्वर्ग बन गया है?

टर्बाइनों के साथ परेशानी

पवन ऊर्जा परियोजनाओं के प्रति उदासीनता और प्रतिरोध की भावना कच्छ के जखाऊ और वुडिया गांवों के लिए अनूठी नहीं है। शोधकर्ताओं द्वारा महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश तथा विश्व के अन्य हिस्सों जैसे कि ब्रिटेन, अमेरिका, ब्राजील, मेक्सिको और हांडुरस सहित भारत के विभिन्न भागों में इसी प्रकार के प्रेक्षण किए गए हैं। वैश्विक उत्तर में इस उदासीनता अथवा प्रतिरोध को प्रायः निम्बिइज्म (मेरे पिछवाड़े नहीं-वाद) के जरूरत में  खारिज कर दिया जाता है।  क्योंकि पवन टर्बाइनों के नजदीक निवास करने वाले उनके दृश्य प्रभाव, ध्वनि प्रदूषण एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बारे में चिंतित होते हैं (एम. वोल्सिंक, 2000, ‘विंड पॉवर एण्ड निम्बी मिथ : इंस्टीट्यूशनल केपेसिटी एण्ड लिमिटेड सिग्नीफिकेंश ऑफ पब्लिक सपोर्ट’, रिन्यूएबल एनर्जी)। लेकिन भारत की स्थिति केवल निम्बिइज्म की नहीं है।

भारत का पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यह मानता है कि चूंकि पवन ऊर्जा  फार्म नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करते हैं, इन परियोजनाओं के पर्यावर्णिक प्रभाव मूल्यांकन की कोई जरूरत नहीं है (पर्यावर्णिक प्रभाव मूल्यांकन अधिसूचना, 2006, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय)। इन परियोजनाओं के सामाजिक एवं पर्यावर्णिक प्रभावों को प्रायः महत्व नहीं दिया जाता।

पारिस्थितिकीय प्रभाव

प्रकृति पर पवन चक्कियों का सर्वाधिक सीधा एवं दृश्य प्रभाव पक्षियों पर पड़ता है । पवन चक्कियों का सबसे बड़ा प्रभाव चमगादड़ों एवं शिकारी पक्षियों पर पड़ता है (एसआर कुमार एवं अन्य, 2012, ‘पक्षियों पर पवन टर्बाइनों का प्रभाव : गुजरात, भारत से एक मामला अध्ययन’)।  यद्यपि, पवन चक्की विनिर्माताओं द्वारा इन पक्षियों की सुरक्षा के लिए कई उपाय किए जा रहे हैं। कच्छ के मामले में यह देखा गया है कि पवन चक्किया एवं पारेषण लाइने भारतीय तिलोर जैसी विलुप्तप्राय पक्षियों बल्कि गिद्धों, मैक्वीन बस्टर्ड, लेसर फ्लोरिकन तथा इस क्षेत्र में पा जाने वाले सफेद पीठ वाले गिद्धों जैसी अन्य प्रजातियों के लिए खतरा पैदा करती हैं (एएमएस अली एवं अन्य, 2012, ‘प्रिलिमिनरी सर्वे ऑफ एविफौना अराउंड विंड फार्म ऑफ जनगी रीजन, कच्छ डिस्ट्रिक्ट, गुजरात, इंडिया’, साइंटिफिक जरनल ऑफ जुलाजी)।

पवन चक्कियों से पक्षियों के लिए पैदा होने वाले खतरों में केवल टर्बाइनों से टकराने का ही खतरा नहीं है बल्कि पर्यावास विखंडन, पर्यावास विनाश तथा पर्यावास क्षति का भी खतरा पैदा होता है। यह पक्षियों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि स्वयं व्यापक पर्यावास एवं कीड़े I मकोड़े, स्तनपाई एवं सरीसृपों जैसी अनेक अन्य प्रजातियों को भी प्रभावित करता है जो एक जटिल खाद्य जाल में परस्पर जुड़े होते हैं (एस. नरवडे, 2013, ‘पक्षियों एवं चमगादड़ों पर पवन चक्कियों के प्रभाव के अध्ययन हेतु मौजूदा वैश्विक दिशानिर्देशों, नीतियों एवं कार्यपद्धतियों की समीक्षा : भारत में अपेक्षाएं’, ब्यूसिरोस, एनविस न्यूज लैटर)। अधिष्ठापित किए गए कुछ पवन फार्म इतने बड़े पैमाने के हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र पर संघात का डोमिनो प्रभाव सृजित हो सकता है जिसका सीमित समय में अध्ययन कई मामलों में कठिन है।

पक्षियों पर संघात (प्रभाव) के साथ-साथ उपकेंद्रों, अनुरक्षण केंद्रों एवं स्वयं टर्बाइनों जैसी असंरचनाओ की जरूरत स्थापना के फलस्वप चरागाहों में खरपतवार की शुरुआत हो जाती है। घास के संघटन में बदलावों का भी पशुचारी समुदायों के साथ-साथ पशुपालन पर निर्भर लोगों पर प्रभाव पड़ता है जैसा कि कच्छ में देखा गया है।

इसीलिए विज्ञान और पर्यावरण केंद्र सरीखे कई संगठन पवन विद्युत परियोजनाओं को पर्यावरणिक संघात (प्रभाव) मूल्यांकन अधिदेश के अधीन लाने हेतु भारत सरकार पर दबाव बना रहे हैं (सीएसई, 2013, ‘ईआई  गाइडलाइंस : विंड पॉवर’, विज्ञान और पर्यावरण केंद्र)।

सामाजिक प्रभाव

इन पर्यावर्णिक प्रभावों के साथ-साथ बड़े पैमाने के पवन फार्म कई सामाजिक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करते हैं। मेजबान समुदाय प्रायः इन परियोजनाओं द्वारा स्वयं को विलगित महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें इनसे कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होता। महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और गुजरात जैसे कई स्थानों पर यह पाया गया कि इन परियोजनाओं की मेजबानी करने वाला स्थानीय समुदाय अभी भी बिजली की खराब आपूर्ति से जूझ रहा है। उनके दरवाजे पर सैकड़ों टर्बाइनें लगी होने के बावजूद वे राज्य बिजली बोर्डों को बिजली की ऊंची दरों का भुगतान कर रहे हैं।

ये परियोजनाएं मेजबान समुदायों के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा नहीं करती। जब टर्बाइनों के नियमित रखरखाव की जरूरत होती है, इसके लिए इन समुदायों के बाहर के कुशल अभियंताओं की सेवाएं ली जाती हैं। ज्यादा से ज्यादा ये पवन ऊर्जा  फार्म स्थानीय ग्रामीणों के लिए सुरक्षा संबंधी कुछ नौकरी पैदा करते हैं जो पवन चक्कियों की रखवाली से संबंधित होते हैं। फिर भी ये नौकरियाँ बहुत कम तनख्वाह वाली होती हैं क्योंकि इन्हें निजी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा आउटसोर्स किया जाता है।

पवन समृद्ध भूभागों में पवन ऊर्जा परियोजनाओं का पैमाना ही कारपोरेट घरानों द्वारा जमीन हथियाने की संभावना पैदा करता है। गुजरात में भी सुजलान जैसी पवन ऊर्जा  कंपनियों को स्थानीय लोगों की बेदखली की कीमत पर पवन ऊर्जा फार्म स्थापित करने के लिए जमीन आवांटिक की गई है और साझी जमीन के निजीकरण द्वारा ग्रामीणों की आजीविका पर संकट पैदा हो गया है। यह ‘हरित’ ऊर्जा की ओर संक्रमण की वैश्विक परिघटना का हिस्सा है जो जमीन पर निर्भर हजारो समुदायों को प्रभावित करती है (ए शीडेल एवं अन्य, 2012, ‘एनर्जी ट्रांजिशंस एंड द ग्लोबल लैंड रश : अल्टीमेट ड्राइवर्स एंड परसिसटेंट कॉन्सीक्वेंसेज’, ग्लोबल एनवारमेंटल चेंज)।

दुर्भाग्यवश, बड़े पैमाने के पवन ऊर्जा फार्म सबसे बड़ा खतरा चरागाहों एवं स्क्रबलैंड्स के लिए पैदा करते हें जो आधिकारिक रूप से ‘राजस्व भूमि’ के रूप  में जाना जाता है। जब जमीन हथियाने या पर्यावर्णीय अवक्रमण से सुरक्षा की बात आती है, इन्हें बहुत कम कानूनी संरक्षण मिल पाता है क्योंकि इन्हें ‘बंजर भूमि’ समझा जाता है (एन डिसूजा, जून 5, 2013, ‘भारत की स्वच्छ ऊर्जा जैव विविधता की कीमत पर?’,फर्स्ट पोस्ट)।

 निष्कर्ष :

बड़े पैमान के पवन फार्मों के संभावित पारिस्थितिकीय एवं सामाजिक प्रभावों को देखते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम पवन चक्कियों के बारे में हरित विज्ञापनों से एक कदम पीछे आएं और इन परियोजनाओं की इनके सामाजिक, पारिस्थितिकीय एवं भौगोलिक संदर्भ में पड़ताल करें।

पवन ऊर्जा फार्मों द्वारा बड़े भूभाग पर पड़ने वाले संभावित पारिस्थितिकीय एवं सामाजिक प्रभावों को न्यूनतम करने के लिए भारत में बड़े पैमाने के पवन ऊर्जा फार्मों का एक संचयी पर्यांवरणिक एवं सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन कानून बनाने की तत्काल आवश्यकता है। ऐसा कार्यतंत्र भी विकसित करने की जरुरत है जो ऐसी समुदाय आधारित पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विकास को बढ़ावा दे सके जो ग्रामीण समुदायों की जरूरतों के अनुरूप  पवन ऊर्जा फार्मों का विकास करे।

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