मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी की जैव विविधता तेजी से घटती जा रही है। पृथ्वी की अनेक पशु व पाद्प प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।

घटती जैव विविघता को बचाने की आवश्यक्ता

भूगोल और आप

जैव विविधता

पृथ्वी पर जीवधारियों की विविधता को जैव विविधता  Bio-Diversity कहा जाता है। किसी क्षेत्र की जैव विविधता पृथ्वी के भौतिक पर्यावरण के परिवर्तन स्वरूप उद्विकास विसरण तथा विलोपन की प्रक्रियाओं का प्रतिफल होता है। वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी की जैव विविधता तेजी से घट रही है। इसलिए यह पृथ्वी के प्रमुख खतरों में सम्मिलित है। बढ़ती हुई मानवीय जनसंख्या की उदर पूर्ति हेतु मानव विश्व की 20 प्रतिशत से 40 प्रतिशत प्राथमिक उत्पादकता का प्रयोग करने लगा है एवं महासागरीय मछलियों के 70 प्रतिशत भाग का उपभोग कर रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान मानव ने नाइट्रोजन स्थरीकरण की प्राकृतिक दर को दोगुना कर दिया है, आधे से अधिक सतही जल की आपूर्ति का उपयोग करने लगा है एवं पृथ्वी के धरातल के 40 प्रतिशत से अधिक भाग को रूपान्तरित कर दिया है।

पिछली एक-दो शताब्दियों में मानव ने जीव-धारियों के विलोपन की एक ऐसी लहर उत्पन्न की है जो कि लाखों वर्षों में नहीं की गई। पिछली अर्द्ध शताब्दी में सैकड़ों जन्तुओं की प्रजातियां जिनमें 58 स्तनपाई, 115 पक्षी, 100 सरीसृप एवम् 64 उभयचर भी विलुप्त हो गईं। जलीय प्रजातियां भी काफी प्रभावित हुई हैं। पादप जगत में पिछली चार शताब्दियों में 600 से अधिक प्रजातियां अनुमानतः लुप्त हो गई हैं। जिन प्रजातियों के विलोपन की सूचना है, वे वास्तविक सच्चाई का एक छोटा हिस्सा हो सकती हैं क्योंकि बहुत सी प्रजातियां अभी भी खोजी नहीं जा सकी है। जन्तु जगत में कीट, मकड़ी एवं अन्य सूक्ष्म जीवों की भी अत्यन्त न्यून जानकारी उपलब्ध है।

 

जैव विविधता का भौगोलिक वितरण: जैसे-जैसे भूमध्य रेखा के निकट हम बढ़ते हैं तो वैसे-वैसे जैव विविधता भी बढ़ती जाती है। पृथ्वी के मात्र 7 प्रतिशत क्षेत्र पर फैले ऊष्ण कटिबन्धीय जलवायु प्रदेशों में विश्व की अधिक से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उच्च विकिरण एवं वर्षा वाले क्षेत्रों में पादप प्रजातियों की सर्वाधिक संख्या पाई जाती है क्योंकि यहाँ प्रकाश संश्लेषण सम्भव हो पाता है।

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