मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी की जैव विविधता तेजी से घटती जा रही है। पृथ्वी की अनेक पशु व पाद्प प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।

घटती जैव विविघता को बचाने की आवश्यक्ता

भूगोल और आप

विश्व की सर्वाधिक पादप प्रजातियों की विविधता उष्ण कटिबंधीय rain forest में मिलती है। इस प्रदेश में कुल उत्पादक प्रजातियों के 70 प्रतिशत भाग में केवल वृक्ष स्थित हैं। इस प्रदेश में जन्तुओं की गतिविधियाँ भी निरन्तर चलती रहती हैं जो कि भूमि सतह से सर्वोच्च स्तर तक परिवर्तनशील रहती हैं। मानसूनी पर्णपाती वन क्षेत्रों में rain forest  की अपेक्षा पादपों की प्रजातियां कम होती हैं। इस प्रदेश में सूक्ष्म जीवों से लेकर विशालकाय जानवर एवं विभिन्न पक्षी पाए जाते हैं। सवाना प्रदेश में पादपों की विविधता अपेक्षाकृत कम होती है। विशेषकर अफ्रीकी सवाना क्षेत्र में जिराफ, हाथी, अफ्रीकन भैंसा, दरियाई घोड़ा, एण्टीलॉक, जेब्रा जैसे विशालकाय जन्तु पाए जाते हैं। भूमध्य सागरीय क्षेत्र की वनस्पति शुष्क ग्रीष्म एवं वर्षायुक्त शीतकाल के कारण विशिष्ट लक्षणों से युक्त हो गई है। यहाँ वृक्ष एवं झाड़ियाँ सर्वाधिक प्रभावी वनस्पति है जो कि सर्वाधिक शुष्क परिस्थितियों से जूझने की विशेषताओं से युक्त है।

टैगा प्रदेश की वनस्पति में कोणधारी वृक्षों की बहुलता है। इन वनों को “टुण्ड्रा वन” भी कहते हैं। अत्यन्त शीतल टुण्ड्रा प्रदेशों में जैव विविधता बहुत कम किन्तु विशिष्ट गुणों से युक्त पाई जाती है।यहाँ की वनस्पति cryptophyte  कहलाती है। विश्व के कुल जैव आवासित क्षेत्रों का 2/3 से अधिक सागर के रूप में स्थित है। इसकी विशिष्टता छिछले जल से सागर की गहराई तक जन्तुओं का मिलना है, परन्तु सागरीय पर्यावरण की विशेषता यह है कि यहाँ तापमान का विवरण अधिक एकरूपता दिखलाता है।

प्रजातियों की बढ़ती जानकारी : विश्व की कुल अनुमानित प्रजातियों की संख्या लगभग 7 करोड़ में से हम केवल 14 लाख के बारे में जानते हैं। नई प्रजातियों के अन्वेषण की प्रक्रिया अभी जारी है। उदाहरणतः 1992 में लाओस-वियतनाम पर्वतीय सीमा के पास विशालकाय भूस्तनधारी की नवीन प्रजाति वु-क्वांग-ऑक्स  wu-kwang-ox  को खोजा गया। वर्तमान में ध्रुवीय क्षेत्रों, महासागरीय नितलों, प्रवाल भित्तियों व मृदाओं के साथ-साथ वेलांचल (ऐस्चुएरी) क्षेत्र की जैव विविधता के अध्ययन की तुरन्त आवश्यकता है।

जैव विविधता का ह्रास या क्षरण: प्रजातियों की विलुप्ति पूर्णतः असामान्य नहीं होती क्योंकि कुछ प्रजातियां नए पर्यावरण के अनुसार खुद को न ढ़ाल पाने के कारण सदैव नष्ट होती रही हैं। सामान्यतः किसी पारिस्थितिक तंत्र में स्थित मांसाहारी जन्तुओं को पारिस्थितिक तंत्र विनाश के प्रारम्भिक चरणों को सर्वाधिक झेलना पड़ता है इसीलिए ऐसे जन्तुओं की स्थिति को जैव विविधता ह्रास का प्राथमिक सूचक माना जाता है।

1) जैव विविधता ह्रास के प्राकृतिक कारण: जीवाश्म प्रमाण बतलाते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की शुरूआत के समय मौजूद मूल प्रजातियों के 99 प्रतिशत से अधिक का विलोपन हो चुका है। इनमें से अधिकांश प्रजातियां मनुष्य के आगमन से पूर्व ही समाप्त हो चुकी थीं। बदलते हुए भौतिक पर्यावरण के अनुसार जो प्रजातियां अनुकूलन कर लेती हैं वे नई प्रजातियों के रूप में विकसित हो जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो प्रतिस्पर्धी प्रजातियां अनुकूलन नहीं कर पाती हैं वे विलुप्त हो जाती हैं। जैसे लघु आकार वाले हिप्पोहिप्पस का आधुनिक काल के विशाल घोड़े में विकसित होना अनुकूलन का उदाहरण है।

कई दशाओं में सम्पूर्ण प्रजाति का विलोप हो जाता है। आज से 6 करोड़ वर्ष पूर्व जलवायु परिवर्तनों के कारण डाइनासोर का सम्पूर्ण परिवार विनष्ट हो गया। किन्तु मेडागास्कर द्वीप पर मिलने वाली विशाल छिपकलियों को इनका वंशज माना जाता है। रोगकर्ता जीव, किसी क्षेत्र में जब पहली बार प्रवेश कर जाएं तो वहाँ कई प्रजातियों का विनाश हो जाता है। Chinese Fungus  (कवक) के कारण 1904 के बाद से अमेरिकी चेस्टनट वृक्षों का चिन्ताजनक ढ़ंग से ह्रास हो रहा है।

2)         जैव विविधता ह्रास के मानवीय कारक- हावर्ड वि.वि. के प्रो. ए.ओ. विल्सन के अनुसार प्रतिवर्ष 20 हजार प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं। इनका सर्वाधिक क्षरण ऊष्ण कटिबन्धीय देशों में होता है जहाँ पृथ्वी की 90 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं।

प्राकृतिक आवास habitat का विनाषः– निर्वनीकरण wetland’s  का विनाश तथा अन्य जैविक रूप से समृद्ध ecosystem  का विनाश जो कि आर्थिक विकास के लिए किया जा रहा है प्रतिवर्ष सैकड़ों प्रजातियों को विलुप्त कर रहा है। प्राकृतिक आवास के विनष्ट होने से उनका विखण्डन हो जाता है तथा प्रजातियों की जनसंख्या छोटे-छोटे खण्डों में रहने को बाध्य हो जाती है। इन छोटे खण्डों में रहने वाले पृथक समूहों के पुर्नउत्पादन की क्षमता घटती जाती है।

शिकार एवं मत्सययनः– बहुत से स्तनपाई पक्षी एवम् मछलियाँ शिकार अथवा अत्यधिक मत्सयन के कारण विलुप्त हो रहे हैं। मत्सययनः के फलस्वरूप विशाल व्हेल की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। विश्व के कुल 17 मत्सययनः क्षेत्रों में से 13 में मछलियों की संख्या निरन्तर घटती जा रही है। इस प्रक्रिया में ऐसी कई प्रजातियां भी विलुप्त हो सकती है जिनके विषय में हमारी जानकारी नगण्य है।

परभक्षी एवं परजीवियों का नियन्त्रणः– खेतों, उद्यानों, वनों आदि में पादप प्रजातियों एवं फसलों को क्षति पहुंचाने वाले विभिन्न सूक्ष्म जीव एवं विशालकाय जीव मानव के नियंत्रक कार्यों जैसे कीटनाशकों के प्रयोग अथवा शिकार के कारण लुप्त हो रहे हैं। इनमें से कुछेक जन्तुओं में शीतोष्ण कटिबन्धों में कृषि को हानि पहुँचाने वाले, पालतु पशुओं को मारने वाले तथा मनुष्य को चोट पहुँचाने वाले परभक्षी हैं। जैसे प्रेयरी डॉग, बॉब cat, coyot  आदि को मार दिया जाता है।

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