जल की उपलब्धता

प्यासे द्वीपवासियों के लिए मीठा जल की उपलब्धता

भूगोल और आप

जल के अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण जल की बढ़ती मांग और उपलब्धता के बीच असंतुलन नीति-निर्माताओं के लिए एक चिंताजनक मुद्दा है। अलवणीकरण जो विभिन्न प्रकार के भौतिक तथा रासायनिक तरीकों के माध्यम से समुद्री जल को पेयजल में बदलने की एक विधि है, भारत के सामने मौजूद जल संकट के संभावित समाधान के रूप में उभर कर सामने आया है। तथापि क्रियाविधि की लागत प्रभावोत्पादकता, अलवणीकरण के लिए प्रयुक्त ऊर्जा के प्रकार और संयंत्र की संपोशणीयता सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

तेजी से हो रहे शहरीकरण, जनसंख्या विस्फोट और भूजल के अत्यधिक दोहन देश के विभिन्न क्षेत्रों में मीठे पानी की बढ़ती मांग तथा अत्यधिक दोहन एवं जलवायु परिवर्तन के कारण जल उपलब्धता के बीच मौजूद असंतुलन नीति-निर्माताओं के लिए चिंताजनक संसाधन मुद्दा है।

अलवणीकरण जो विभिन्न प्रकार के भौतिक तथा रासायनिक तरीकों के माध्यम से समुद्री जल को पेयजल में बदलने की एक विधि है, भारत और विश्व के सामने मौजूद जल संकट के एक संभावित समाधान के रूप में उभरा है। तथापि क्रियाविधि की लागत प्रभावोत्पादकता, अलवणीकरण के लिए प्रयुक्त ऊर्जा के प्रकार और संयंत्र की संपोषणीयता सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अनुलोम परासरण, बहुचरणी कौंधन और बहुप्रभावी आसवन कुछेक सामान्य पारम्परिक अलवणीकरण प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं। अनुलोम परासरण के अन्तर्गत अति संकेन्द्रित क्षेत्र से जल को कम दबाव वाले क्षेत्र में स्थानान्तरित किया जाता है। 0.5 एनएम से 1.5 एनएम के सरंध्र वाली  अर्द्धपरागम्य झिल्ली दो खण्डों को पृथक करने का कार्य करती है। विसर्जित जल के माध्यम के कारण पारिप्रणाली के असंतुलित होने की आशंका के अलावा झिल्लियों की संरक्षा के लिए जल का पूर्वशोधन, भरण दबाव के अनुपात में उच्चशक्ति के पम्प, झिल्लियों के जैव प्रदूषण, महंगी झिल्लियों को बार-बार बदलने जैसी  प्रौद्योगिकी की अपनी सीमाएं है। उसी प्रकार से उच्च क्षमता के विलवणीकरण संयंत्रों विशेषकर जब बिजली संयंत्रों से निकलने वाले ऊष्मा अवशिष्ट का उपयोग करते हुए 600 सेंटीग्रेड से अधिक तापमान के गर्म जल का उत्पादन किया जा सके, के लिए बहुचरणी कौंधन और बहुप्रभावी आसवन संयंत्र मितव्ययी होते हैं। तथापि, भारतीय संदर्भ में इन प्रौद्योगिकियों के आधार  पर कार्य करने वाले संयंत्रों की संख्या बहुत ही कम है-क्योंकि अलवणीकरण की अन्तिम लागत में जल को आवश्यक तापमान पर पहुंचाने के लिए प्रयुक्त ऊष्मा अवशिष्ट की लागत शामिल है। निर्वात पैदा करना और उसका रख-रखाव करना तथा पैमाने की समस्याएं इन प्रौद्योगिकियों से जुड़ी दो तकनीकी चुनौतियां है।

दूसरी तरफ, कम तापमान वाली तापीय अलवणीकरण प्रक्रिया के अन्तर्गत समुद्री संस्तरों के बीच प्राकृतिक रूप से मौजूद तापीय भिन्नता का उपयोग किया जाता है और यह एक ऐसा विकल्प उपलब्ध कराती है जो पूरी तरह से पर्यावरण हितैषी तो है ही, साथ ही, इसमे न्यूनतम रख-रखाव का होना एक अतिरिक्त लाभ है। इस प्रक्रिया में कम दबाव पर समुद्री जल के अपेक्षाकृत गर्म सतह पर जल का वाष्पीकरण कराया जाता है तथा 400 मीटर नीचे समुद्र तल में मौजूद ठंडे जल का उपयोग करते हुए परिणामी शुद्ध वाष्प को संघनित किया जाता है। रख-रखाव के लिए सरल और आसान अलवणीकरण संयंत्र के बहुत कम संघटकों-वाष्पीकरण हेतु एक संघनक, 400 मीटर नीचे स्थित समुद्र से शीतल जल निकालने के लिए समुद्री जल पम्पों, निर्वात प्रणाली और एक लम्बी पाइप, कुंड, संयंत्र, भवन और सेतु जैसी समुद्री संरंचनाओं की जरूरत पड़ती है। समुद्री तापीय अवयव आधारित कम तापमान वाली तापीय अलवणीकरण प्रक्रिया एक पर्यावरण हितैषी प्रौधोगिकी है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध ऊष्मा का प्रयोग किया जाता है। चित्र 1 इस प्रक्रिया का योजनागत रेखचित्र दर्शाता है।

द्वीपवासियों के लिए अलवणीकरण संयंत्र

द्वीपवासियों के कष्ट को महसूस करते हुए मीठे पानी का उत्पादन करने हेतु प्रायोगिक आधार पर एलटीटीडी प्रौद्योगिकी की स्थापना करने के लिए लक्षद्वीप की सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में पहचान की गई। यहां के अधिकतर द्वीपों में तट से 600 से 800 की दूरी पर 400 मीटर गहरे समुद्र तल विद्यमान हैं। तत्पश्चात ,पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान के माध्यम से कावारत्ती में एक लाख लीटर/दिन की क्षमता वाले एक अलवणीकरण संयंत्र स्थापित किया ताकि समुद्र से पेयजल उपलब्ध कराया जा सके और समुदायों के सामने पेश आ रही पेयजल की कमी को दूर किया जा सके। बिगत छः वर्षों से संयंत्र का प्रचालन स्थानीय द्वीपवासियों द्वारा किया जा रहा है तथा 10,000 से अधिक स्थानीय समुदायों की पेयजल जरूरत को पूरा किया जा रहा है। चिकित्सकों की एक टीम द्वारा किए गए अध्ययन लाभभोगियों के जनस्वास्थ्य में सुधार तथा जलजनित रोगों में आयी भारी कमी को दर्शाते हैं।

मिनिकॉय अलवणीकरण संयंत्र

सफल कावारत्ती अलवणीकरण संयंत्र के आसान प्रचालन, उपयोगिता और प्रदर्शन से संतुष्ट होकर लक्षद्वीप प्रशासन ने क्षेत्र के अन्य द्वीपों में इसी प्रकार के संयंत्र स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान से अनुरोध किया है। पहले चरण में अगाती तथा मिनिकॉय द्वीपों में कार्य शुरू किए गए हैं। चित्र 2 में प्रदर्शित मिनिकॉय स्थित संयंत्र पृथ्वी दिवस समारोह के उपलक्ष्य में 22 अप्रैल 2011 को शुरू किया गया।

चुनौतियां

सभी मौसमी दशाओं को सह सकने वाली समुद्री संरचनाओं का निर्माण परियोजना का सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण भाग है। 4000 टन की क्षमता वाले कुंड का प्रारंभिक निर्माण द्वीप स्थित समुद्र तल में किया गया जिसमें समुद्री जल पम्प लगाए जाते हैं, जो कि जल में तैरते रहते हैं तथा स्थल पर अन्तिम रूप से अधिष्ठापन के लिए द्वीप के पूर्वी भाग में लगभग 10 किमी दूरी तक जल की खिंचाई करते हैं। सेतु के पोतघाटों जो कुंड को तट से जोड़ते हैं, का निर्माण करना इस तथ्य के मद्देनजर एक कठिन कार्य था कि किनारे पर टकराने वाली बड़ी लहर के क्षेत्रों में 10-15 सेकंड के अन्तराल पर सतत् रूप से लहरें उठती रहती हैं।

400 मीटर समुद्र तल से शीतल जल निकालने वाले 700 मीटर लम्बे एचडीपीई पाइप को समुद्र तल में वेल्ड किए गए 12 मीटर के टुकड़ों के माध्यम से द्वीप से जोड़ा जाता है और उसे उस स्थल तक खींच कर पहुंचाया जाता है तथा फिर उसे कुंड के एक सिरे से जोड़ने और दूसरे सिरे को 400 मीटर गहराई में छोड़ देने के लिए अधिष्ठापित किया जाता है। पाइप का डिजाइन इस प्रकार का होता है कि वह समुद्री पर्यावरण में सभी मौसमी दशाओं में टिका रह सके। प्रक्रिया उपकरण का डिजाइन इस ढंग से तैयार किया गया है ताकि सुदूर द्वीपों में संयंत्र की निर्माण, परिवहन और अधिष्ठापन को सुगम बनाया जा सके और साथ ही प्रचालन लागतों में कमी लाने हेतु परियोजना में न्यूनतम बिजली उपयोग की जरूरतों को पूरा किया जा सके, समुद्री जल के उपयोग को उपयुक्त बनाया जा सके तथा कुल परियोजना लागत में कमी लाई जा सके।

निष्कर्ष टिप्पणियां

एलटीटीडी बिल्कुल एक नव विकसित प्रौधोगिकी है, जिसके परिपक्व होते जाने पर लागत में कमी आने की काफी संभावना है। इस प्रक्रिया में 1 प्रतिशत के लगभग परिवर्तन होता है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्री प्रबंधन में समस्या नहीं के बराबर उत्पन्न होती है और इसलिए क्षेत्र की नाजुक पारिप्रणाली के साथ कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। 170 सेंटीग्रेड के तापमान पर निर्गत विसर्जित जल में पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है और उसकी ओर विभिन्न प्रकार की मछलियां आकर्षित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप भू-आधारित वनस्पतियों और समुद्री कृषि के लिए वातानुकूलन जैसी दशा पैदा हो जाती है। निकट भविष्य में पेयजल की अनुमानित मांग को देखते हुए पानी के लिए झुलसते तटवर्ती और द्वीपवासी समुदायों के लिए एलटीटीडी को प्रोत्साहित किया जाना महत्वपूर्ण है।

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