सरिस्का टाइगर रिजर्व

सरिस्का टाइगर रिजर्व – संकटों से घिरी भूमि

भूगोल और आप

सरिस्का की यह बाघ परियोजना देश-विदेश में विख्यात रही है। अनेक वर्षों तक यहां निर्भय होकर बाघ फले फूले है। बहुत से जाने माने विदेशी मेहमान यहां बाघ देखने के लिए आते रहे हैं ।  वर्षों तक सरिस्का का जंगल बाघ की गर्जना सुनता रहा है। ऐसे में सरिस्का जंगल से बाघों का विलुप्त हो जाना, आश्चर्य ही नहीं बल्कि चिन्ता का विषय है। पर्यावरण के विद्वानों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि जंगलों से बाघों का गायब हो जाना एक मात्र जंगली जानवर का विलुप्त हो जाना ही नहीं है, यह एक बहुत बड़ी असामान्य दुर्घटना है, जिसका प्रभाव बहुत दूर तक पर्यावरण को प्रभावित करता है।

अरावली की गोद में बैठा सरिस्का अपने फ्लौरा-फौना एवं धार्मिक पर्यटन स्थलों के कारण अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है इस वन क्षेत्र को 1955 में अभ्यारण घोषित किया गया तथा 1978-79 में इसे टाइगर सरिस्का टाइगर रिजर्व का नाम दिया गया। इस क्षेत्र के राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए 1982 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा देने हेतु प्रथम घोषणा की गई।

भौगोलिक स्थिति

सरिस्का टाइगर रिजर्व राजस्थान के अलवर-जयपुर स्टेट हाइवे संख्या-13 पर अलवर शहर से 30 किमी. दूर दक्षिण-पश्चिम में तथा जयपुर से 110 किमी. व दिल्ली से 198 किमी की दूरी पर स्थित है। इसका भौगोलिक विस्तार अक्षांशीय दृष्टि से 27° 19′ 3″ उत्तर अक्षांश एवं देशांतरीय दृष्टि से 76° 26′ 13″ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। सरिस्का टाइगर रिजर्व का  कुल क्षेत्रफल 866.13 वर्ग किमी. है। जिसमें 492 वर्ग किमी. क्षेत्र कोर एरिये के अन्तर्गत आता हैं। इसे तीन भागों में बांटा गया  है इसके चारों तरफ 374.13 वर्ग किमी. क्षेत्र बफर क्षेत्र के ग्रुप में सीमांकित किया गया है। घाटियां 380 मीटर की ऊँचाई पर हैं व पहाड़ की चोटी औसत समुद्र तल से 640 मीटर ऊँची है।

भौगोलिक दशायें

शीतोष्ण कटिबंध में स्थित इस क्षेत्र में मानसूनी जलवायु पायी जाती है। यहां तीन ऋतुएं स्पष्ट रूप से अनुभव की जाती हैं। यहां शीत ऋतु में तापमान 80 से 270 फारेनहाईट तथा ग्रीष्मकाल में 300 से 420 फारहेनहाईट तक मिलता है। गर्मी में कभी-कभी तापमान 450 फारेनहाईट तक पहुंच जाता है। मई-जून में ‘लू’ का चलना सामान्य बात है लेकिन सरिस्का की सघन वनस्पति लू के प्रभाव को कम अवश्य कर देती है। दिसम्बर-जनवरी में कुछ दिनों के लिए यह क्षेत्र शीत लहर की चपेट में आ जाता है। मध्य जून से मध्य सितम्बर तक यहां वर्षा ऋतु होती है। वर्षा का औसत लगभग 65 सेमी. वार्षिक है जिसका 90 प्रतिशत भाग द.प. मानसूनी पवनों से प्राप्त होता है। इस क्षेत्र की औसत सापेक्षिक आर्द्रता 70 प्रतिशत के लगभग रहती है। यहां का धरातल पहाड़ी एवं पठारी है जो अरावली पर्वतीय अंचल में सिमटा हुआ है।

वनस्पति

सरिस्का के प्रमुख आकर्षण में एक यहां का सघन वन क्षेत्र है। सरिस्का के वनों में प्रमुख वृक्ष धोक  है जो 90 प्रतिशत भाग रखता है इसके अलावा रौंझ, गुरजन, कुमठा, बेर, खैर, गोया खेर, खेजड़ी, तेंदु, खिरनी  खिरना आदि।

नमीयुक्त स्थानों में गुलर, जामुन, गुंदा, गुंदी, बहेड़ा,  अमलतास, बास, सिरस, बेल, बहुतायत में है। पहाड़ की ऊँचाई वाले क्षेत्र सालर के वृक्षों से ढके हुए है।

चौड़ी व समतल घाटियों में बेर, कैर व करील, खेजड़ी, हिगोटं, ढाक, कंकेड़ा  आदि वनस्पति सघन रूप से फैली हुई है। नदी नालों के सहारे-सहारे, खजूर के लम्बे-लम्बे वृक्ष लगे हुए है। झड़बेर, खेरटी चित्रक, गुंगल, गोखूर आदि छोटी-छोटी झाड़ियाँ भी फैली हुई है।

इस प्रकार सघन वनस्पति ने पूरे अभ्यारण में हरियाली की एक चादर सी फैला रखी है। यहां की बहती नदियां, नाले व झरने बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।

परियोजना के प्रमुख पर्यटक स्थल

सरिस्का टाइगर रिजर्व के  क्षेत्र के अन्तर्गत कांकड़वाड़ी किला, अजबगढ़ व भानगढ़ के किले तथा खण्डर, भृर्तहरि जी की तपोभूमि व समाधि स्थल, तालवृक्ष के गर्म व ठण्डे पानी के कुण्ड, पाण्डुपोल का हनुमान मंदिर, नारायणी देवी का मंदिर, नलदेश्वर महादेव का मंदिर, गढ़ राजौर का शिव मंदिर आदि यहां के मुख्य धार्मिक व ऐतिहासिक पर्यटक स्थल है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व के  वन्य जीव

सरिस्का बाघ परियोजना क्षेत्र में काफी जैव विविधता पायी जाती है। यहां पर लगभग 180 पक्षियों की प्रजातियों व 23 प्रकार के मैमल्स पाये जाते हैं। बाघों की साल दर साल गिरती संख्या व अन्त में विलुप्त होने की स्थिति के कारण बाघों के अस्तित्व की रक्षा के लिए इस परियोजना को शुरू किया गया था। लेकिन आज वे बाघ नहीं रहे तो प्रोजेक्ट टाइगर की क्या भूमिका रह गयी। सरिस्का में बाघों की संख्या के आकड़ों के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि बाघों के मामले में सरिस्का सम्पन्न वन क्षेत्र रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार एक बाघ को रहने के लिए 20 वर्ग किमी. सघन वन क्षेत्र चाहिए। 1986 में यहां 41 बाघ थे। जिनको 41×20 वर्ग किमी. आवास की आवश्यकता थी। जो सरिस्का के कुल वन क्षेत्र के लगभग बराबर है। बाघों की यह संख्या 11 वर्षों में घटकर मात्र 24 रह गयी परन्तु फिर भी वन विभाग व सरकार उदासीन बन रही। 2004 में यह संख्या सिमटकर मात्र 18 ही रह गयी, जो कि खतरे की घंटी थी। परिणाम यह निकला कि 2005 की शुरूआत में यहां बाघ समाप्त हो गये। जिसका प्रमुख कारण शिकार था। इस स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री को 2005 में इस क्षेत्र की विस्तृत एवं गहन जानकारी हेतु सीबीआई को निर्देशित करना पड़ा तथा टीम के द्वारा की गयी जांच कार्यवाही से स्थिति स्पष्ट हो गयी कि सरिस्का में बाघ नहीं रहे।

बाघों की विलुप्ता के कारण

सरिस्का में बाघों के विलुप्त होने के कई कारण रहे :

  1. आवासों का विनाश: आवासों का विनाश जैव विविधता के नष्ट होने का प्रमुख कारण है। सरिस्का में जनसंख्या के बढ़ते दबाव से, जानवर पालना व चराना, जलाने के लिए लकड़ी काटना, वन काटना आदि कारणों से वन्य जीवों के आवास नष्ट हुए है। जिस कारण कई वन्य जातियां विलुप्त होने की समस्या का सामना कर रही हैं।
  1. भोजन की कमी: बाघों को अपनी आवश्यकता के अनुसार भोजन चाहिए। उनको पेट भरने के लिए 15 से 20 किलो ग्राम मांस चाहिए। वर्तमान में सरिस्का बाघ परियोजना में वन क्षेत्र के विनाश के कारण, सूखे के कारण विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी पर्याप्त भोजन न मिलने से वहां से अन्यत्र स्थानान्तरित हो गये। मृग व अन्य जीव नष्ट होने के कारण बाघों को पर्याप्त मात्रा में अपना शिकार नहीं मिलता जिससे वे भुखमरी के कारण बीमार होकर मर जाते हैं।
  1. अभ्यारण क्षेत्र में मानव बस्तियों का पाया जाना: सरिस्का अभ्यारण क्षेत्र में कई छोटे-छोटे गांव है। मानवीय गतिविधियों के कारण वन्य जीवों को स्वछन्द विचरण करने में परेशानी होती है। ये वन्य जीव जब इन बस्तियों में घूमते हुए आ जाते हैं, तो ग्रामीण या तो उन्हें मार देते हैं या उनको प्राकृतिक आवास से दूर खदेड़ देते हैं।
  1. आहार श्रृंखला का टूटना: वन्य जीवों व पौधों की प्रजातियां नष्ट होने से शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार के जीवों की प्रजातियां लुप्त हुई हैं। बाघों का लुप्त होने की एक सूचक इसकी आहार श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी से चिंकारा का लुप्त होना एवं चौसिघां की संख्या में कमी रही है। साथ ही यहां पर साँभर व चीतल की संख्या में कमी आ रही है।
  1. अभ्यारण क्षेत्र से सड़क मार्ग का गुजरना: इस अभ्यारण में अलवर – जयपुर राज्य राज्यमार्ग नम्बर 13 गुजरता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों की अन्य सड़कें व पंगडंडियां भी इस अभ्यारण क्षेत्र के बीच से गुजरती है। बाघ अपने शिकार का पीछा करते हुए कई बार इन सड़क मार्गों पर आ जाता है तथा यातायात साधनों की चपेट में आकर मर जाता है। सड़क मार्गों पर अधिक मानवीय गतिविधियों के कारण बाघ अपने आप को असुरक्षित भी महसूस करता है।
  1. प्रजनन क्षमता का कम होना: बाघ खुले में स्वछन्द घूमने वाला जीव है तथा यह अपना प्रजनन भी एकान्त में करता है। अभ्यारण क्षेत्र में सड़क मार्गों व धार्मिक स्थलों की स्थिति के कारण मानवीय गतिविधियाँ अधिक बढ़ रही हैं जिससे बाघ अपने आप को असुरक्षित महसूस करता रहता है तथा एकान्त शांत व खुला माहौल न मिलने के कारण प्रजनन नहीं कर पाता। जिसका प्रभाव भी इसकी वंश वृद्धि पर पड़ता है।
  1. गैर कानूनी शिकार: अभ्यारण क्षेत्र में अचानक बाघों की कमी का कारण वहां बढ़ रहा गैर कानूनी शिकार है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बाघों के व अन्य जीवों के अंग काफी ऊँची कीमत पर बिकते हैं। बाघ के नख व दाँतों की बड़ी मांग है, जिस कारण शिकारी इनका शिकार करके ऊँचे मूल्य पर अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इन्हें बेच देते हैं व कुछ लोग शक्ति प्राप्त करने की दृष्टि से भी बाघ का मांस खाना पसंद करते हैं। यही कारण है कि अभ्यारण से बाघ विलुप्त हो गये।

सामाजिक आर्थिक विश्लेषण

सरिस्का टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट में स्थित गांवों की बढ़ती जनसंख्या यहां के लिए एक खतरे की घंटी है। सरिस्का टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट में कुल 36 गांव है जिनमें से 11 गांव कोर-1 में 01गांव कोर-2 में 02 गांव कोर-3 तथा 20 गांव बफर क्षेत्र में फैले हुए हैं। इसके अलावा इसको चारों ओर  से 300 बड़े और सघन बसे गांवों ने घेर रखा है। मानव जन के बढ़ते दबाव ने यहां के पारिस्थितिक संतुलन को लगभग नष्ट कर दिया है। सरिस्का क्षेत्र में मुख्य मानव समुदायों में गुर्जर, मीणा, बावरिया, बनजारा जनजाति रहती है। 1991 से 2000 की दशक वृद्धि के अनुसार समस्त सरिस्का क्षेत्र जीव जनसंख्या वृद्धि का केन्द्र बना हुआ है। 1991-2001 के मध्य यह औसत जनसंख्या वृद्धि 32.71 प्रतिशत रही जो काफी अधिक थी। इस तीव्र मानव जनसंख्या वृद्धि ने वन्य जीवों के व्यवहार, प्रजनन प्रणाली, आवास तथा सामान्य गतिविधियों पर गंभीर प्रभाव डाला है।

निष्कर्ष

पर्यावरण सन्तुलन और जैव संरक्षण में प्रत्येक वन्य जीव का अपना विशेष योगदान है। एक प्राणी के विलुप्त होने से पूरे पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। इस आहार श्रृंखला की कड़ी को तोड़ने में तीव्र जनसंख्या वृद्धि व घनत्व, वन्य क्षेत्र में तीव्र कमी, गैर कानूनी कृषि, चराई व लकड़ी काटना, अवैध खनन आदि का मुख्य योगदान है। अतः सरिस्का में पाये जाने वाले जीवों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाये जाने की जरूरत है।

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