सागर की तली में मौजूद हैं भविष्य की जरूरतें

भूगोल और आप

पिछली दो शताब्दियों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में कल्पनातीत प्रगति होने के परोक्ष प्रभावस्वरूप मानव आबादी में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। आज पृथ्वी पर जितने मनुष्य निवास करते हैं उतने इतिहास के किसी भी काल में नहीं करते थे। साथ ही मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं में जितनी बढ़ोतरी हुई है उतनी पहले कभी भी नहीं हुई थी। आज हर व्यक्ति औसतन जितनी ऊर्जा खर्च कर रहा है उतनी उसने पहले कभी भी खर्च नहीं की थी। परिणामस्वरूप अब परिस्थिति यह हो गई है कि थल, जो समस्त पृथ्वी का  मात्र 29.2 प्रतिशत भाग ही है, मानव आबादी की खाद्यान्न, कच्चे माल और ऊर्जा संबंधी मांगों को पूरा करने में दिनोंदिन असमर्थ होता जा रहा है। अपनी मांगों की पूर्ति के लिए मनुष्य को सागर की शरण में जाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है।

विश्व सागर के भंडार में मनुष्य की इन भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन हैं। उसके एक घन किमी. पानी में लगभग 4 करोड़ टन लवण घुले हुए हैं जबकि विश्व सागर में 1.37 करोड़ घन किमी. पानी भरा हुआ है। उसकी तली पर विभिन्न धातुओं  और अन्य पदार्थों की इतनी मात्राएं उपस्थित हैं कि वे केवल वर्षों तक ही नहीं वरन् शताब्दियों तक मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती हैं। सागर की तली पर तांबे के अयस्कों की इतनी मात्रा है कि उससे हमारे लिए 6000 वर्षों तक के लिए पर्याप्त मात्रा में तांबा प्राप्त होता रहेगा जबकि थलीय भंडारों से तांबे की केवल 40 वर्षों की ही मांग की पूर्ति हो सकेगी। इसी भांति सागर के निकिल भंडार 1,50,000 वर्षों के लिए पर्याप्त हैं जबकि थलीय भंडार मात्र 100 वर्षों के लिए, एलूमीनियम के समुद्री भंडार 20,000 वर्षों की आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं परन्तु उसके थलीय भंडार मात्र 100 वर्षों की।

विश्व की वर्तमान मानव आबादी लगभग 6 अरब अनुमानित है। सागर में इतनी ‘क्षमता’ है कि वह इतनी आबादी को बहुत बड़ी मात्रा में अनेक पदार्थ प्रदान कर सकता है।

यदि हम किसी भांति समुद्री पानी में उपस्थित कुल हाइड्रोजन और ड्यूटेरियम (भारी हाइड्रोजन जिसका परमाणु भार 2 होता है) का उपयोग कर पायें तब हमें इतनी विशाल समयावधि तक संलयन (फ्यूजन) ऊर्जा प्राप्त होती रहेगी जिसकी हमारे लिए कल्पना करना भी कठिन है – सौर परिवार की आयु से चार गुनी अधिक समयावधि तक। हम सागर के पानी से और उसकी उथली तली से, उनमें उपस्थित खनिजों की मात्राओं के संदर्भ में, मात्र 1-2 प्रतिशत खनिज ही प्राप्त कर रहे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अनुपम  प्रगति के बावजूद भी हम अधिकांश खनिज लगभग 200 मीटर गहरे सागर से ही निकाल पा रहे हैं। हम उससे गहरे सागर में पहुंच  ही नहीं पा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के लगभग आधे भाग पर 3000 मीटर गहरा सागर आच्छादित है।

सागर से अब तक प्राप्त किए जाने वाले खनिजों को अधिक मात्राओं में और नए (अब तक न निकाले जाने वाले) खनिजों को निकालने के लिए हमें एक ओर ‘प्लेट विवर्तनिकी’ और सागर की तली के प्रसार जैसे कारकों के खनिज निर्माण में योग का अधिक गहराई से अध्ययन करना होगा, वहां दूसरी ओर सागर सतह की घट-बढ़ के  प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों पर भी ध्यान देना होगा।

प्लेट विवर्तनिकी

पिछली शताब्दी (बीसवीं शताब्दी) के मध्य में विकसित प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने भूवैज्ञानिकों को एक ऐसा सिद्धान्त प्रदान कर दिया है कि जिसके बल पर वे भूकम्प, ज्वालामुखी क्रियाओं, भ्रंशन, वलन, पर्पटी के उत्थान और अवनमन जैसी अनेक प्राकृतिक क्रियाओं को भलीभांति समझा सकते हैं। साथ ही सागरों के निर्माण और उनके विस्तार अथवा संकुचन जैसी अत्यंत धीमी गति से होने वाली परिघटनाओं की व्याख्या भी कर सकते हैं। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की मदद से प्लेटों की गतिविधियों – उनके एक दूसरे की निकट आने या दूर होते जाने अथवा घर्षण करने जैसी घटनाओं – के प्रभावों की भी, सही परिपेक्ष्य में व्याख्या की जा सकती है। इस सिद्धान्त की मदद से अब वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि सागर में खनिजों का सांद्रण किन स्थलों पर हो सकता है। उन स्थलों पर जहां प्लेटें एक दूसरी से दूर जा रही होती हैं वहां भूगर्भ (मैंटल) में से खनिजों से युक्त पदार्थ ऊपर निकलता रहता है। वहां विभिन्न धातुओं की सल्फाइडों की जमावटों के पाए जाने की संभावना भी अधिक होती है।

सागर की तली का प्रसार

जब वे प्लेटें, जिन पर सागर स्थित हैं, एक-दूसरी से दूर जाती हैं तब सागर की तली पर पर्वत श्रृंखला का निर्माण होता है। ये पर्वत थल  क्षैत्र  के वलित पर्वतों से भिन्न होते हैं। सागर की ही नहीं वरन् पूरी पृथ्वी की सबसे विशाल पर्वत श्रृंखला-मध्य महासागरीय पर्वत श्रृंखला-का निर्माण भी इसी प्रकार हुआ था। इस पर्वत श्रृंखला में मैंटल से गर्म (पिघलता हुआ) बेसाल्टी पदार्थ निरंतर निकलता रहता है। यह बेसाल्टी पदार्थ खनिजों से भरपूर होता है। विचित्र बात यह है कि यह पदार्थ ठंडा होकर उस पर्वत श्रृंखला के बाजुओं पर जम तो जाता है परन्तु वहां से बहुत मंथर गति से, 1 से 10 किमी. प्रतिवर्ष की दर से, उससे दूर सरकता जाता है। धीरे-धीरे वह पदार्थ महाद्वीपों के निकट स्थित, सागर के गहरे खड्डों में तक पहुंच जाता है। फिर उनमें समाकर मैंटल में वापस चला जाता है। इस प्रकार  सागर की तली का निर्माण और प्रसार तो होता ही है, खनिजों के भंडार भी सागरों में फैल जाते हैं।

यहां यह बताना युक्तिसंगत होगा कि वैज्ञानिकों को सागर की तली के प्रसार का आभास अंध महासागर की तली पर स्थित टेलीफोन केबल के टूटने के कारणों की खोज करते समय हुआ था।

जलस्तर का उतार-चढ़ाव

सागर में जलस्तर एकदम स्थिर नहीं रहता। ज्वार के फलस्वरूप वह प्रतिदिन ऊपर उठ जाता है और फिर अपने पुराने स्तर पर वापस आ जाता है। इसके साथ ही पृथ्वी के वायुमंडल के ताप में परिवर्तन होते रहने के कारण हजारों-लाखों वर्षों के पैमाने पर भी वह घटता-बढ़ता रहता है। सागर के जलस्तर में ज्वार के फलस्वरूप होने वाले परिवर्तन हर सागर में समान रूप से नहीं होते। किसी सागर में ज्वार के दौरान जलस्तर काफी ऊँचा उठ जाता है तो किसी में बहुत कम; परंतु जलवायु में फेर-बदल के फलस्वरूप होने वाले परिवर्तन विश्वव्यापी स्तर पर होते हैं। एक हजार से लेकर दस लाख वर्षों के पैमाने पर होने वाले ये परिवर्तन तटीय खनिज स्रोतों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के दीर्घकालीन परिवर्तनों के सबसे अधिक प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर पड़ते हैं। इनके प्रभावस्वरूप अनेक तटीय सागरों की तली ऊपर उठ जाती है और वे थल में बदल जाते हैं। वैसे इसके विपरीत घटनाएं भी घटती रहती हैं-थल क्षैत्र सागर में बदलते रहते हैं। इन घटनाओं के फलस्वरूप सागर में होने वाली अवसादन प्रक्रिया और अवसादों की प्रकृति भी प्रभावित हो जाती है। निश्चय ही इनके प्रभाव खनिजों के सांद्रण पर पड़ते हैं। इनसे कार्बोनेट बहुल क्षेत्र खंडज (क्लास्टिक) बहुल क्षेत्रों में बदल जाते हैं।

अपरदन

थल पर होने वाली अपरदन जैसी क्रियाओं के प्रभाव भी, परोक्ष रूप से, सागर की खनिज संपदा को बढ़ा देते हैं। अपरदन के फलस्वरूप धातु अयस्कों की थलीय जमावटें अनावृत हो जाती हैं- उनके ऊपर स्थित मिट्टी, बालू आदि की परतें कट जाती हैं। फिर वर्षा का पानी उन्हें घोलकर अथवा बहाकर नदियों के माध्यम से या सीधा ही सागर तक पहुंचा देता है। अधिकांश प्लेसर जमावटें इसी प्रकार से बनी हैं। सागर में इस प्रकार पहुंचने वाले खनिजों की मात्रा पर जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के भी परोक्ष प्रभाव पड़ते हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव वर्षा की मात्रा पर पड़ते हैं और उसके प्रभाव पानी की उस मात्रा पर जो अयस्कों को बहाकर सागर तक पहुंचाती है। नदियों पर बनाए गए बांध भी इस बारे में अपना योग देते हैं। उनके बनने से नदियों के पानी की अधिकांश मात्रा रूक जाती है और बांध-सरोवरों में पानी में निलंबित पदार्थ वहां ही, नीचे बैठ जाते हैं। वे सागर तक पहुंच नहीं पाते।

उच्च प्रौद्योगिकी की आवश्यकता

सागर की खनिज संपदा को पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करने के लिए उक्त सिद्धांतों का भलीभांति अध्ययन कर उनका व्यावहारिक उपयोग करना भी बहुत जरूरी है। दूसरे शब्दों में, गहरे सागर से  अधिक मात्रा में खनिज प्राप्त करने के लिए नई तकनीकें तथा उच्च प्रौद्योगिकी भी विकसित करनी होगी। अपार जलराशि के लाखों-करोड़ों टन भार के नीचे काम कर सकने वाली युक्तियां विकसित करनी होंगी; ऐसे यंत्रों का आविष्कार करना होगा जिन्हें दूरसंवेदी तकनीक से चालित करने पर हम सागर की तली में सैकड़ों नहीं वरन् हजारों मीटर गहरे छेद कर सकें और उनमें से बड़ी मात्रा में खनिज निकालकर सागर सतह पर भेज सकें। साथ ही ऐसे वाहन बनाने होंगे जिनमें बैठकर  मनुष्य सागर की गहरी-से-गहरी तली पर न केवल उतर सके वरन् लगातार कुछ दिनों तक सर्वेक्षण आदि कार्य भी कर सके।

4000-5000 मीटर अथवा उससे भी गहरे सागर में एक सुदृढ़, स्थायी संरचना का निर्माण करना अत्यंत श्रम साध्य कार्य है। यदि हमें सागर का भलीभांति ‘दोहन’ करना है तब यह और ऐसे अन्य अनेक कार्य करने ही होंगे।

भारत की योजना

सागर भारत को तीन ओर से घेरे हुए हैं। अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न तथा अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल और ऊर्जा उपलब्ध करने हेतु सागर पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है। वह दिन बहुत दूर नहीं है जब हमारे पास सागर की शरण में जाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं बचेगा। इस संबंध में हमारी सरकार भी गंभीर है। सागर से अधिकाधिक  मात्रा में खाद्य (मछली आदि), खनिज और ऊर्जा प्राप्त करने हेतु उसने एक बृहत योजना तैयार की है।

हमारे देश का क्षेत्रफल 32 लाख वर्ग किमी. और अनन्य आर्थिक क्षेत्र का क्षेत्रफल 21 लाख वर्ग किमी. है, परन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ के कन्वेनशन ऑन लॉ ऑफ दि सी (अनक्लॉस) के कुछ प्रावधानों के अंतर्गत हमारे अनन्य आर्थिक क्षेत्र में 10 लाख वर्ग किमी. की वृद्धि हो सकती है। ऐसा होने पर हमारे अनन्य आर्थिक क्षेत्र के संभाव्य स्रोतों में बहुत वृद्धि हो जाएगी।

अपने इतने विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र के स्रोतों का समुचित उपयोग करने के लिए हमें अनेक चुनौतियां का सामना करना होगा। ऐसी कुछ चुनौतियां हैं अनन्य आर्थिक क्षेत्र का समग्र सर्वेक्षण, स्रोतों की खोज और सुरक्षित खनन के लिए वर्तमान तकनीकों और युक्तियों में सुधार और नई तकनीकों/युक्तियों को विकसित करना, पर्याप्त संख्या में कर्मियों को प्रशिक्षित करना आदि। इनके साथ एक अन्य परंतु अत्यंत महत्वपूर्ण चुनौती है कि स्रोतों का सर्वेक्षण, खोज और खनन करते समय समुद्री पर्यावरण को संरक्षित रखना। उक्त चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें क्या कार्य करने होंगे; कौन सी तकनीकें/युक्तियां आदि विकसित करनी होंगी, इनका कुछ विवरण आगे दिया जा रहा हैः

गहरा सागर– गहरे सागर की तली के नीचे दबे पेट्रोलियम और अन्य खनिजों की मात्राओं की सही जानकारी प्राप्त करने के लिए डिजिटल मल्टी-चैनल सिसमिक सर्वे शिप बहुत उपयुक्त होती है। वर्तमान में भारत के पास कोई ऐसा जहाज नहीं है। इसलिए उसे वह जहाज किराए पर लेना पड़ता है। सन् 2002 में इसका किराया 330 अमेरिकी डालर प्रति किमी. था जो सन् 2006 में बढ़कर 1300 डालर प्रति किमी. हो गया। उसके बाद भी किराए में बहुत वृद्धि हुई है। अपने अनन्य आर्थिक क्षेत्र का समुचित व्यापक सर्वेक्षण करने के लिए हमें ऐसे जहाज की नितांत आवश्यकता है।

गैस हाइड्रेट को तट पर लाने के लिए जहाजों की भी जरूरत होगी। उनका भी निर्माण करना होगा। यद्यपि गैस हाइड्रेट के खनन और स्थानांतरण से संबंधित अधिकांश कार्य दूर संवेदी स्वचालित यंत्रों से किया जाएगा। फिर भी इन यंत्रों के सुचारू संचालन के लिए समय-समय पर उनका निरीक्षण करते रहना जरूरी होगा। यह निरीक्षण केवल सागर सतह से नहीं किया जा सकता वरन् सागर की तली पर उतरकर ही किया जा सकता है। इसके लिए सागर की तली पर ऐसे शैल्टर बनाने होंगे जिनमें कुछ समय के लिए आदमी निवास कर सके।

प्लेसर खनिज– यद्यपि आजकल हम अपने तटों से लगभग पांच लाख टन प्लेसर खनिज प्राप्त कर रहे हैं परन्तु हमारे तटों पर भारी खनिज बालू के बहुत विशाल भंडार हैं। अनुमान है कि ये विश्व के सबसे बड़े भंडार हैं और इनमें लगभग 63 करोड़ टन बालू मौजूद है। इस बालू में इल्मेनाइट, मोनाजाइट, जिरकान, रूटाइल, सिल्मीनाइट, गार्नेट आदि खनिज मौजूद हैं। इन खनिजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसी नई तकनीक/युक्ति के आविष्कार की आवश्यकता नहीं है परंतु वर्तमान तकनीकों को अधिक सुचारू बनाना तथा नए तटीय क्षेत्रों की खोज करना जरूरी है।

गैस हाइड्रेट – कुछ दशक पूर्व वैज्ञानिकों को सागर की तली के नीचे दबा एक ऐसा पदार्थ मिला जिसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है। यह पदार्थ गैस हाइड्रेट है। कुछ लोग इसे ‘21वीं सदी का ईंधन’ भी कहते हैं। यह निम्न आण्विक भार वाला ऐसा हाइड्रोकार्बन (मुख्यतः मीथेन) है जिसमें पानी का अणु बर्फ जैसे क्रिस्टली रूप में समावेशित होता है। इसलिए इसे ‘मीथेन हाइड्रेट’ भी कहते हैं। यह सागर में लगभग 500 मीटर गहराई पर पाया जाता है। यह बर्फ जैसा दिखता है। गैस हाइड्रेट थल क्षैत्र पर भी स्थायी तुषार भूमि (परमाफ्रास्ट) के नीचे मौजूद पाया गया है। आर्कटिक और टुंड्रा प्रदेशों में धरती के नीचे, काफी गहराई तक पानी जम कर बर्फ में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी धरती को स्थायी तुषार भूमि कहा जाता है।

अधिकांश समुद्री गैस हाइड्रेटों का निर्माण उस समय होता है जब बैक्टीरिया सागर की तली के अवसादों में उपस्थित जैविक पदार्थ को मीथेन में विघटित कर देते हैं। वैसे इस विघटन क्रिया में थोड़ी मात्राओं में मीथेन और प्रोपेन गैसें भी बनती हैं। ये गैसें गहरे समुद्री अवसादों में जहां दाब बहुत उच्च (8 से 20 मैगा पास्कल) और ताप के निम्न (40 सै. के कम) होता है, पानी के साथ इस प्रकार संयोजित हो जाती हैं कि ये पानी के अणुओं की लैटिस सदृश संरचना में फंस जाती हैं। इस क्रिया में ही गैस हाइड्रेट का निर्माण होता है।

गैस हाइड्रेट भंडार में वेधन करने से कीचड़ में सने गैस हाइड्रेट के थक्के मिलते हैं। सागर सतह पर आने पर, जहां ताप अपेक्षाकृत अधिक और दाब अपेक्षाकृत कम होता है, गैस हाइड्रेट के थक्के तेजी से बिखर कर वाष्पित हो जाते हैं। यद्यपि यह बर्फ सदृश ठोस दिखता है परन्तु जलाने पर शीघ्रता से जलने लगता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि विश्वसागर की जमावटों में गैस हाइड्रेट के रूप में लगभग 20 गुना 1015 (20,00,00,00,00,00,00,000) घन मीटर मीथेन गैस उपस्थित है। दूसरे शब्दों में इस मीथेन की मात्रा पृथ्वी पर खनिज तेल और गैस के कुल भंडारों में, उपस्थित कार्बन से दोगुनी है। इसलिए ‘भविष्य के ईंधन’ के रूप में गैस हाइड्रेट की संभावना बहुत प्रबल है। परंतु समझा जाता है कि इसे व्यावहारिक ईंधन के रूप में उपयोग करने में अभी काफी समय, 10 से 15 वर्ष का समय लगेगा।

समझा जाता है कि हमारे देश के पूर्वी तट पर महाद्वीपीय मार्जिन में और अंडमान सागर में गैस हाइड्रेट तथा ‘मुक्त गैस’ के बहुत विशाल भंडार हैं जिनमें इनकी 40 से 120 करोड़ खरब घन मीटर मात्रा मौजूद होने का अनुमान है। हमारे वैज्ञानिकों ने भी 100 मीटर गहरे सागर की तली के 40 मीटर नीचे, गैस हाइड्रेट की 80 मीटर मोटी एक परत ढूंढ़ निकाली है। बड़े पैमाने पर गैस हाइड्रेट प्राप्त करने के लिए हमें कुछ अन्य तकनीकें/युक्तियां विकसित करनी होंगी यथाः

  • निकालने के बाद गैस हाइड्रेट को सागर की तली पर ही अस्थायी रूप से भंडारित करने की तकनीक;
  • सागर की तली पर भंडारित गैस हाइड्रेट को पाइपों द्वारा तट पर भेजने की तकनीक। इसके लिए हमें समुचित पाइपों की निर्माण विधि भी ज्ञात करनी होगी।

बहुधात्विक पिंडिकाएं– भारत को मध्य हिंद महासागर बेसिन के 1,50,000 वर्ग किमी. क्षेत्र में बहुधात्विक पिंडिकाओं की खोज और उत्खनन के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति मिल गई है। समझा जाता है कि इस क्षेत्र में मौजूद पिंडिकाओं में कोबाल्ट, निकिल, तांबा आदि की मात्रा लगभग 2.2 करोड़ टन है। हमारे देश में इन महत्वपूर्ण धातुओं के अयस्कों के थलीय भंडार नहीं हैं। इसलिए अपनी औद्योगिक प्रगति हेतु हमारे लिए लगभग 6000 मीटर गहराई पर पड़ी बहुधात्विक पिंडिकाओं का खनन करना बहुत महत्वपूर्ण है परंतु इन पिंडिकाओं के खनन में अनेक अड़चनें हैं और हमारे लिए उनके समाधान ढूंढ़ना बहुत जरूरी है। ऐसी कुछ अड़चनें हैं :

  • बहुधात्विक पिंडिकाएं 6000 मीटर गहराई पर जिस तली पर बिखरी हुई हैं, वह बहुत मुलायम है। उस पर कोई भारी यंत्र कार्य नहीं कर सकता।
  • खनन संयंत्रों को वांछित स्थल तक पहुंचाने के लिए विभिन्न प्रकार की ऊबड़-खाबड़ तली पर से गुजारना होगा।
  • खनन कार्य को आर्थिक रूप से लाभदायक बनाने के लिए संयंत्रों को काफी बड़े क्षेत्र से खनन करना होगा।
  • खनन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो तूफान आदि आपदाओं के दौरान भी सुचारू रूप से काम करती रहे।
  • पिंडिकाओं को सागर सतह तक उठाने और तट पर लाने की विशेष व्यवस्था करनी होगी।
  • खनन कार्य के फलस्वरूप समुद्री पर्यावरण में कम-से-कम गड़बड़ी होनी चाहिए।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय देश के विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से बहुधात्विक पिंडिकाओं के सर्वेक्षण, खनन और उनसे धातु निष्कर्षण हेतु एक योजना बना रहा है। इसी सिलसिले में राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान ने एक क्राउलर आधारित खनन प्रणाली विकसित की है। इस प्रणाली को 500 मीटर गहरे सागर में सफलतापूर्वक परखा भी जा चुका है। गहरे सागर की तली पर खनन संयंत्रों को धंसने से बचाने के लिए भी राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान ने समुचित युक्तियां विकसित की हैं।

गैस हाइड्रेटों की भांति बहुधात्विक पिंडिकाओं के लगातार खनन के  निरीक्षण के लिए भी ऐसे वाहनों की जरूरत होगी। गहरे सागर की तली पर ऐसे वाहन मानव रहित दूरसंवेदी स्वचालित युक्तियों से संचालित हो सकते हैं, परन्तु अनेक बार मानव द्वारा संचालित वाहनों की भी नितांत आवश्यकता हो जाती है। मानव द्वारा संचालित वाहनों में आदमियों के कुछ समय तक रहने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नालॉजी, खड़गपुर और केन्द्रीय यांत्रिक इंजीनियरी अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुर, में ऐसे स्वचालित वाहन विकसित किए जा रहे हैं जो सागर में 200 मीटर गहराई तक उतर सकते हैं।

जहाज को उस समय भी स्थिर रहना चाहिए जब सागर पर तेज पवन बह रही हो और उसमें ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही हों। इसके लिए परिष्कृत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि की एक प्रणाली-गतिशील अवस्थिति प्रणाली (डायनैमिक पोजीशनिंग सिस्टम)- का उपयोग किया जाता है। इस प्रणाली को, कुछ समय पूर्व तक, भारी लागत पर, विदेशों से आयात करना पड़ता था परंतु अब देश में ही इसका निर्माण किया जा रहा है। हमारे आधुनिकतम अनुसंधान पोत ‘सागर निधि’ में इस प्रकार की प्रणाली लगाई गई है।

पेय जल – पृथ्वी पर ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जो सागर तट पर स्थित होने के बावजूद भी एकदम शुष्क प्रदेश हैं। वहां खेती और उद्योगों के लिए तो पानी की कमी है ही। पीने के लिए भी पर्याप्त मात्रा में पानी मौजूद नहीं है। हमारे देश में गुजरात का काफी भाग ऐसा ही क्षेत्र है। वहां लोगों की पानी की मांग को पूरा करने के लिए समुद्री पानी को पेयजल में परिवर्तित करने की अनेक तकनीकें विकसित की गई हैं। इसमें ‘प्रतिलोम परासरण’ (रिवर्स ऑस्मोसिस) तकनीक काफी उपयोगी पाई गई है परंतु उसके प्रचालन में काफी ऊर्जा खर्च होती है और उसमें इस्तेमाल किए जाने वाले संयंत्र की देखरेख की लागत भी काफी अधिक होती है। अब उक्त तकनीक के स्थान पर, समुद्री पानी को पेयजल में परिवर्तित करने के लिए निम्न ताप ऊष्मिक विलवणीकरण तकनीक (लो टेम्परेचर थर्मल डिसेलीनेशन टैक्नोलॉजी) और तैरते प्लेटफार्म का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक ऐसे द्वीपो के लिए, जहां ताजे पानी की कमी है, बहुत उपयोगी पाई गयी है। हमारे लक्षद्वीप के टापू भी इसी प्रकार के हैं। वहां कावाराती शहर में राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान ने एक ऐसा संयंत्र स्थापित किया है जो पिछले दो वर्षों से भी अधिक समय तक प्रतिदिन एक लाख लीटर पेयजल तैयार कर रहा है। यह संयंत्र सागर सतह से कोष्ण पानी (280 से.पर) लेता है और ठंड़ा पानी 320 मीटर गहरे सागर से, 130 से. पर। अपने तटीय नगारों की पेयजल की मांग की पूर्ति के लिए हमें प्रतिदिन लगभग एक करोड़ लीटर जल की आवश्यकता होती है। यदि तट पर स्थित बिजलीघरों से फालतू बिजली मिल सके तब इस प्रकार के संयंत्र बहुत कम लागत पर कार्य कर सकते हैं।

हमारे तटीय सागरों तथा हिंद महासागर के मध्य बेसिन में खनिजों की कमी नहीं है। वहां इतने प्रकार के तथा इतनी मात्राओं में खनिज मौजूद हैं कि हम अनेक दशाब्दों तक ही नहीं वरन शताब्दियों तक उनका उपयोग कर सकते हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने इसके लिए योजनाएं बनाई हैं और वे आवश्यक तकनीकों तथा यंत्रों का निर्माण कर रहे हैं। हमें आशा है कि यदि ये योजनाएं  सफल हुईं तब हमारे उद्य़ोगों को कच्चे माल की कोई कमी नहीं रहेगी परंतु ये सब योजनाएं उस समय ही सफल हो सकती हैं जब उनको कार्यान्वित करने हेतु पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मी उपलब्ध हों।

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