तितली मछली

भारत के लक्षद्वीप का राज्यपशु है समुद्री तितली मछली

भूगोल और आप

तितली मछली दो अलग-अलग परिवारों की ऐसी मछलियों को कहा जाता है, जिनमें आपस में कोई संबंध नहीं है। इनमें से एक परिवार की मछलियां ताजे पानी में तथा दूसरे परिवार की मछलियां सागर में रहती हैं। कुछ लोग ताजे पानी में पायी जाने वाली मछलियों को तितली कहते हैं तथा सागर में पायी जाने वाली मछलियों को फरिश्ता मछली कहते हैं। कुछ लोग इसके पूरी तरह विपरीत हैं। वे ताजे पानी की मछलियों को फरिश्ता मछली और सागर में पायी जाने वाली मछलियों को तितली मछली कहते हैं। अतः तितली मछली के संबंध में कुछ भी कहने से पहले तितली मछली की स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक है।

विश्व में ऐसी बहुत सी मछलियां पायी जाती हैं, जिन्हें फरिश्ता मछली के नाम से जाना जाता है। इन सभी को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। पहले भाग में सागर की मुनि मछली आती है। यह शार्क की निकट संबंधी है। यह फरिश्ता मछली तो है, किन्तु इसे तितली मछली कभी नहीं कहा जाता।

दूसरे भाग में पश्चिमी अफ्रीका की नदियों में पायी जाने वाली फरिश्ता मछली आती है। इसका वैज्ञानिक नाम पैन्टोडोन बछोलजी है। इसे तितली मछली भी कहते हैं। ताजे पानी की यह तितली मछली अधिकांश समय जलीय पौधों के मध्य व्यतीत करती है। तितली मछली के संबंध में यह कहा जाता है कि यह पानी की सतह या हवा में चमगादड़ों अथवा पक्षियों के समान उड़ती है। इस समय यह अपनी पूरी शक्ति लगा कर छाती के बड़े-बड़े मीनपंखों को ऊपर-नीचे करके उड़ने का प्रयास करती है। तितली मछली के इस विलक्षण गुण ने जीव वैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित किया तथा सन् 1950 के बाद इस पर अनेक प्रयोग किए गये। इन प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला कि इसके संबंध में प्रचलित सभी धारणाएं भ्रामक हैं। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार तितली मछली उड़ नहीं सकती, किन्तु यह दो मीटर तक ऊंची उछल सकती है।

कुछ समय पूर्व, पी.एच.ग्रीनवुड और के.एस. थामसन द्वारा तितली मछली के अध्ययन से सम्बंधित किये गये प्रयोग बड़े महत्व के माने जा रहे हैं। इन दोनों जीव वैज्ञानिकों ने तितली मछली को काट कर इसके आंतरिक अंगों का बड़ा ही सूक्ष्म और गहन अध्ययन किया तथा अनेक तथ्यों की खोज की। इन जीव वैज्ञानिकों के अनुसार तितली मछली की शारीरिक संरचना बड़ी अद्भुत थी तथा शारीरिक संरचना की दृष्टि से यह सभी मछलियों से अलग थी। तितली मछली के कंधों, छाती के मीनपंखों तथा इनसे सम्बद्ध मांसपेशियों की संरचना सर्वाधिक विचित्र थी। इस मछली की हडंडिया  इतनी पतली थीं कि इसे काटते समय दोनों जीव वैज्ञानिको को बड़ा सावधान रहना पड़ा। इसके कंधों के जोड़ चौड़े और चपटे थे। इनसे सम्बद्ध मांसपेशियां उड़ने वाले पक्षियों के समान थीं। तितली मछली के मीनपंखों की संरचना इस प्रकार थी कि वह सामान्य मछलियों के समान इन्हें मोड़कर अपने शरीर से नहीं चिपका सकती थी। इसके मीनपंख पक्षियों के पंखों की तरह ऊपर-नीचे गति कर सकते थे। इन दोनों जीव वैज्ञानिकों ने तितली मछली का गहन अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तितली मछली भले ही उड़ नहीं पाती, किन्तु इसकी शारीरिक संरचना इस प्रकार की है कि यह सरलता से उछल सकती है।

तितली मछली एक छोटी मछली है। इसकी लम्बाई 8 सेन्टीमीटर से 12 सेन्टीमीटर तक होती है। तितली मछली का शरीर नाव के आकार का होता है। यह ऊपर से चपटी और नीचे से गोलाई लिये हुए होती है। इसका रंग धूसर हरे से लेकर कत्थई रूपहले तक होता है तथा इसकी पीठ एवं बगलों पर कत्थई अथवा गहरे हरे रंग के धब्बे और रेखाएं होती हैं। तितली मछली का मुंह बड़ा होता और ऊपर की ओर उठा रहता है। इसके नथुने लम्बे और ट्यूब के आकार के होते हैं। तितली मछली के मीनपंख सर्वाधिक विचित्र होते हैं। इसके मीनपंख सामान्य मछलियों से पूरी तरह अलग होते हैं तथा देखने में ऐसे मालूम पड़ते हैं, मानो लम्बे-लम्बे कांटे हों। तितली मछली के छाती के मीनपंख बड़े एवं पंख जैसे होते हैं तथा इनका रंग कत्थई-सफेद होता है। इसके नितम्बों के दोनों मीनपंखों का रंग भी कत्थई-सफेद होता है एवं प्रत्येक मीनपंख में चार-चार फिनरेज होती हैं। जब यह पानी में आराम करती है तो इसके नितम्बों के मीनपंख फैल जाते हैं एवं पूंछ लम्बी सी हो जाती है। तितली मछली के बिना जोड़े वाले मीनपंख बड़े और पारदर्शी होते हैं तथा इनमें लम्बी-लम्बी फिनरेज होती हैं। इसके मीनपंखों की संरचना इस प्रकार की होती है कि यह इनका उपयोग पानी से हवा में आने के लिए कर सकती है। तितली मछली को यदि हाथ में लिया जाये तो यह अपने मीनपंख पक्षियों के समान ऊपर-नीचे करती है, किन्तु इसके मीनपंख स्वतंत्र रूप से हवा में गति नहीं कर पाते।

तितली मछली का प्रमुख भोजन नदियों, तालाबों और झीलों में पाये जाने वाले छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े हैं। इसके साथ ही यह पानी की सतह पर गिरने वाले कीड़े-मकोडे भी खाती है। तितली मछली पानी की सतह के ऊपर उड़ने वाली मक्खियों तथा इसी तरह के छोटे-छोटे जीवों को बड़ी सरलता से पकड़ लेती है और खा जाती है। कुछ जीव वैज्ञानिकों का मत है कि यह छोटी-छोटी मछलियों का भी शिकार करती है।

तितली मछली में समागम और प्रजनन की प्रक्रिया बहुत रोचक है। यह एक ऐसी मछली है, जिसमें प्रायः भ्रामक समागम देखने को मिलता है। अर्थात नर और मादा दोनों समागम की स्थिति तो बना लेते हैं, किन्तु समागम नहीं करते। भ्रामक समागम के समय मादा तितली मछली की पीठ पर नर चढ़ जाता है और अपनी छाती के मीनपंखों की फिनरेज द्वारा मादा को कस कर जकड़ लेता है। यह स्थिति कई-कई घंटो तक बनी रहती है, किन्तु इसके बाद भी प्रायः समागम नहीं होता।

तितली मछली का वास्तविक समागम और प्रजनन बड़ा रोचक होता है। सामान्य मछलियों में बाह्य समागम होता है। अर्थात मादा पानी में स्वतंत्र रूप से अंडे देती है और नर इन पर अपने शुक्राणु छोड़ कर इनका निषेचन करता है। इसके विपरीत तितली मछली में आंतरिक समागम होता है। तितली मछली में नर और मादा देखने में एक जैसे लगते हैं। किन्तु समागम के समय नर के पेट में मीनपंख के बीच की फिनरेज लम्बी और ट्यूब जैसी हो जाती है। इसी से नर की पहचान होती है। वास्तविक समागम के समय नर और मादा दोनों एक दूसरे के सामने आते हैं तथा अपने-अपने शरीर को मोड़ कर इस प्रकार की स्थिति बना लेते हैं कि उनके प्रजनन अंग एक दूसरे के सामने आ जायें।

तितली मछली के निषेचित अंडे बहुत हल्के होते हैं एवं मादा के शरीर से निकलते ही पानी की सतह पर आ जाते हैं। इनसे बच्चे निकलने का समय पानी के तापमान पर निर्भर करता है। सामान्यतः इन अंडों के लिए 300 सेल्सियस तापक्रम आदर्श होता है। आदर्श तापक्रम पर तीन दिन में अंडों के आवरण फट जाते हैं एवं इनसे तितली मछली के छोटे-छोटे बच्चे निकल आते हैं।

तितली मछली में अंड़ों के समान ही इसके बच्चे पानी की सतह पर तैरते रहते हैं तथा ये जन्म लेते ही भोजन करना आरम्भ कर देते हैं। इनका प्रमुख भोजन स्प्रिंग टेल, ग्रीनफ्लाई जैसे अत्यंत छोटे-छोटे कीड़े-मकौड़े हैं। तितली मछली के बच्चे कुछ समय बाद बड़े हो जाते हैं और व्यस्क तितली मछली के समान जीवन आरंभ कर देते हैं।

तितली मछली को एक्वेरियम में रख कर पालतू बनाया जा सकता है। किन्तु इसके लिए उथले पानी वाला बड़ा एक्वेरियम होना चाहिए। तितली मछली ऊंची कूद लगाने वाली मछली है, अतः एक्वेरियम ऊपर से ढका होना भी आवश्यक है। एक्वेरियम में तितली मछली बड़े शौक से मक्खियां तथा तिलचट्टे आदि खाती है। अतः इसे पालना कोई कठिन कार्य नही हैं। तितली मछली को एक्वेरियम में रखने से इसके भोजन संबंधी एक महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। तितली मछली मृतजीवी अथवा मृत जीवों का मांस कभी नही खाती। यह जीवित कीड़े-मकोड़ों का शिकार करती है और उन्हें ही खाती है।

सागरों और महासागरों में पायी जाने वाली शानदार रंगबिरंगी फरिश्ता मछलियां इस तितली मछली का तीसरा रूप हैं। ये सभी कीटोडोन्टीडाइ परिवार की हैं। इन्हें समुद्री तितली मछलियां कहा जाता है। भारत में लक्षद्वीप के सागर तटों पर कीटोडोन ऑरिगा नामक एक समुद्री तितली मछली पायी जाती है। यही लक्षद्वीप का राज्यपशु है।

सागरों और महासागरों में पायी जाने वाली तितली मछली की लगभग 150 प्रजातियां हैं। ये सभी दूर से देखने पर एक जैसी मालूम पड़ती हैं। इनकी समानता का प्रमुख आधार इनका आकार और रंगबिरंगे पंख हैं। समुद्री तितली मछली सामान्यतः उथले पानी में रहती है और कभी-कभी मुहानों में चली जाती है। यह प्रायः समुद्री चट्टानों व मूंगे की चट्टानों के आसपास जोड़े में अथवा छोटे-छोटे झुण्डों में रहना पसंद करती है। तितली मछली बड़ी शांतिप्रिय होती है। यह अधिकांश समुद्री मछलियों के समान खतरा निकट होने पर न तो आक्रामक मुद्रा बनाती है और न ही भागती है। किसी गोताखोर या अन्य जीव के निकट आने पर यह पहले तो अपने स्थान पर स्थिर रहती है और फिर धीरे-धीरे दूर चली जाती है एवं जाते समय बार-बार पीछे मुड़ कर देखती रहती है।

समुद्री तितली मछली बड़ी सुंदर एवं रंग बिरंगी होती है। सामान्यतः युवा और प्रौढ़ समुद्री तितली मछलियों के रंगों में इतना अंतर होता है कि ये अलग-अलग प्रजातियों की मालूम पड़ती हैं। समुद्री तितली मछली की आयु का इसके व्यवहार पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रायः छोटी समुद्री तितली मछली अकेले रहना पसंद करती है और अकेले ही भ्रमण करती है। युवा समुद्री तितली मछली भी अकेले ही भ्रमण करती है, किन्तु यह एक सुरक्षित स्थान पर अन्य मछलियों से निश्चित रूप से मिलती है। यह स्थान प्रायः समुद्री पौधों के मध्य या किसी चट्टान के नीचे होता है। यदि इसे सागर की तलहटी में कोई टिन का डिब्बा आदि पड़ा मिल जाये तो यह उसे भी अपने मिलने का स्थान बना सकती है।

समुद्री तितली मछली की शारीरिक संरचना बड़ी आकर्षक होती है। इसकी सभी प्रजातियों में आकार और रंग-रूप की विविधता देखने को मिलती है, किन्तु सभी के पंख चमकीले और रंगबिरंगे होते हैं। समुद्री तितली मछली की सभी प्रजातियों में रॉक ब्यूटी सर्वाधिक सुन्दर और आकर्षक होती है। इसका आगे का भाग काला एवं शरीर के पीछे का भाग पीला होता है। इसके मीनपंख चमकीले पीले रंग के होते हैं और इन पर लाल रंग के निशान होते हैं ।  यह बड़ी जिज्ञासु प्रवृत्ति की होती है, अतः पानी में तैरती हुई अन्य जीवों के पास पहुंच जाती है।

समुद्री तितली मछली की सुंदर प्रजातियों में शाही तितली मछली तथा नीली तितली मछली के नाम भी प्रमुख हैं इनके शरीर के रंग अत्यंत आकर्षक और चमकीले होते हैं। इन दोनों मछलियों का रंग गहरा नीला व बैंगनी होता है एवं शरीर पर काले-सफेद अर्धचन्द्राकार निशान होते हैं। ये निशान इनकी आँखों के पास तक चले आते हैं।

समुद्री तितली मछली की 150 से अधिक प्रजातियों की खोज की जा चुकी है। इनमें नवीनतम है-बौनी तितली मछली। इसकी खोज सन् 1908 में हुई। सन् 1908 में बरमूडा के निकट के सागर में 162 मीटर की गहराई पर कुछ मछलियां पकड़ी गयी थीं, उनमें से एक बौनी तितली मछली भी थी। चमकीले नारंगी सिर और टिमटिमाते हुए गहरे नीले रंग की यह मछली सतह पर आने से पहले ही मर गयी थी। जीव वैज्ञानिकों ने इसके संबंध में गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए इसके मृत शरीर को अल्कोहल में डालकर सुरक्षित रखा और इसका अध्ययन किया। सन् 1951 में यह ज्ञात हुआ कि यह तितली मछली की एक जाति है। इस जानकारी के बाद इसे वैज्ञानिक नाम दिया गया। सन् 1952 में मेक्सिको के सागर तट के निकट 72 मीटर की गहराई पर एक बड़ी मछली पकड़ी गयी। इस मछली के शरीर के भीतर से एक सुन्दर मछली निकली, जो बौनी मछली की एक उपजाति थी। सन् 1959 में एक गोताखोर ने बहामास के सागर तट के निकट लगभग 12 मीटर की गहराई पर बौनी तितली मछली की एक अन्य जाति देखी, जिसे विश्व की सबसे दुर्लभ प्रजाति की मछली माना जाता है।

समुद्री तितली मछलियों की बहुत सी जातियों का रंग आयु के अनुसार बदलता रहता है। रानी तितली मछली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। जब यह छोटी होती है तो इसके शरीर का अधिकांश भाग गहरे कत्थई तथा काले रंग का होता है एवं इसकी दोनों बगलों में नीले रंग की तीन-तीन खड़ी पट्टियां होती हैं। इसके मीनपंख के पास नीले रंग का एक पट्टा होता है। व्यस्क होने पर इसका पूरा शरीर चमकीले पीले रंग का हो जाता है एवं इस पर लाल व बैंगनी रंग के कहीं सघन तो कहीं विरल धब्बे उभर आते हैं।

फ्रांस के सागर तटों पर पायी जाने वाली फ्रांसीसी तितली मछली के शरीर की बनावट और रंग सभी बड़े विलक्षण होते हैं। इसकी त्वचा कठोर होती है व शरीर काले रंग का होता है एवं ऊपर की ओर पीले रंग का पट्टा होता है, जो दोनों मीनपंखों के नीचे तक चला जाता है। इसी तरह पीले रंग का एक पट्टा दोनों आँखों के मध्य से आरंभ होता है और नीचे आकर थूथुन के पास चूड़ी के समान गोल आकार ग्रहण कर लेता है। इसकी आँखें काफी उभरी हुई होती हैं एवं सामने से देखने पर पूरा शरीर एक डरावने मुखौटे के समान मालूम पड़ता है।

समुद्री तितली मछली का प्रमुख भोजन पानी के भीतर पाये जाने वाले छोटे-छोटे अरीढ़धारी जीव-जन्तु हैं। यह प्रायः चट्टानों या मूंगे की दरारों में छिपे जीवों का शिकार करती है। समुद्री तितली मछली का थूथुन लम्बा एवं आगे की ओर निकला हुआ होता है तथा इसके अन्तिम सिरे पर मुंह होता है। इसकी सहायता से यह दरारों के भीतर गहराई में छिपे जीवों को भी सरलता से ढूंढ लेती है। समुद्री तितली मछली के मुंह में छोटे-छोटे दांत होते हैं, अतः यह भोजन को निगलती नहीं है, बल्कि चबा कर खाती है। इसे एक्वेरियम में रख कर पालतू बनाया जा सकता है। किंतु प्रायः दो समुद्री तितली मछलियां एक दूसरे के प्रति आक्रामक हो उठती हैं, अतः इन्हें अलग-अलग रखना पड़ता है। एक्वेरियम में यह पालतू बन जाने पर मानव के हाथ से भोजन लेने लगती है।

समुद्री तितली मछली के समागम और प्रजनन के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। मादा तितली मछली, नर के सहयोग से प्रजनन काल में किसी समतल चट्टान का छोटा सा भाग या किसी चौड़ी पत्ती वाले पौधे की एक पत्ती साफ करती है एवं इस पर पांच सौ से लेकर एक हजार तक अंडे देती है। इस समय नर निकट ही तैरता रहता है  और अंडों पर शुक्राणु छोड़ता है। इसके बाद दोनों मिल कर अंडों की देखभाल करते हैं। निषेचन के 4 से 8 दिनों के बाद अंडों से बच्चे बाहर आ जाते हैं और पानी की तलहटी में चले जाते हैं। इसके बाद लगभग एक सप्ताह में ये छोटी-छोटी मछलियों में बदल जाते हैं। नन्ही मछलियां लम्बी और पतली होती हैं। नर और मादा उस समय तक इनकी सुरक्षा करते हैं, जब तक कि ये स्वयं तैर कर चट्टानों के भीतर छिपना और शिकार करना नहीं सीख जातीं। नन्हीं समुद्री तितली मछलियां तीन से चार सप्ताह में मध्य पूर्ण व्यस्क हो जाती हैं और स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगती हैं।

समुद्री तितली मछली की सभी जातियां अपनी सुन्दरता और चमकीले रंगों के कारण हमेशा जीव वैज्ञानिकों के अध्ययन का केन्द्र रही हैं। सामान्यतः किसी भी जीव के शरीर का रंग और उसका डिजाइन कॉमाफ्लाज के रूप में काम करता है। इससे उस जीव को शिकार करने में भी सहयोग मिलता है, किन्तु समुद्री मछली के रंग कॉमाफ्लाज का काम नहीं करते। इसे तो इसके चमकीले रंगों का कारण दूर से ही पानी के भीतर पहचान लिया जाता है। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार चमकीले, लाल, पीले, नीले रंगों तथा इन सभी रंगों के मिश्रण से बनने वाले रंग चेतावनी देने वाले रंग होते हैं। ये रंग जिस जीव में होते हैं, वह जहरीला होता है, या उसके जहरीला डंक होता है, किन्तु समुद्री तितली मछली न तो जहरीली होती है, न ही इसके कोई जहरीला डंक होता है। प्रायः यह देखा गया है कि जिस जीव की त्वचा का रंग चमकीला होता हैं, उसका मांस स्वादिष्ट नहीं होता, जबकि फरिश्ता मछली का मांस बहुत स्वादिष्ट होता है। इसे स्थानीय लोग बड़े स्वाद से खाते हैं।

जीव वैज्ञानिक समुद्री मछली के चमकीले रंगों के उपयोग के सम्बंध में कई वर्षों तक शोध करते रहे और अन्त में उन्होंने पाया कि जिस प्रकार कुछ पक्षी अपने चटक रंगों का उपयोग नृत्य में, विशेष रूप से आक्रामक नृत्य में करते हैं, उसी प्रकार समुद्री तितली मछली भी अपने चमकीले रंगो का उपयोग करती है।

जीव वैज्ञानिकों ने समुद्री मछली के चमकीले रंगों का उपयोग मालूम करने के लिए एक बार एक फ्रांसीसी तितली मछली को कांच के एक बड़े टब में रखा और उसके सामने एक दर्पण रख दिया। समुद्री तितली मछली ने दर्पण के भीतर अपने जैसी मछली देखी तो वह उसकी ओर तेजी से बढ़ी और उसे काटने का प्रयास करने लगी। इस कार्य में असफल होने पर वह थोड़ा सा पीछे हटी और उसने अपने चमकीले पीले रंग का मीनपंख खोल कर आक्रामक मुद्रा बना ली। इस प्रयोग से जीव वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि समुद्री तितली मछली एक निश्चित सीमा क्षेत्र बना कर रहने वाली मछली है। यह सदैव क्षेत्र की सीमा पर जाकर अपने चमकीले रंगों वाले मीनपंखों को फैला कर क्षेत्र पर अपने आधिपत्य का प्रदर्शन करती है तथा इसके साथ ही अपनी जाति की किसी मछली के सीमा क्षेत्र में प्रवेश करने पर उसे इन्हीं रंगीन मीनपंखों की सहायता से चेतावनी भी देती है।

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