थार रेगिस्तान & थार मरूस्थल

थार रेगिस्तान में जल संसाधनों की देखभाल आवश्यक

थार रेगिस्तान में लोग फसलों व जानवरों के साथ मिश्रित खेती, में अपने परम्परागत ज्ञान का प्रयोग करते हैं। भू-जल को ऊपर खींचने से कुओं के पुर्नचक्रण की शक्ति घटी।
भूगोल और आप

थार मरुस्थल भारत की सर्वाधिक नाजुक पारिस्थितिकी प्रणालियों में से एक है। थार मरूस्थल में वर्षा कम होती है और अनिश्चित है। यहां का तापमान उच्च है और तेज हवा चलती है। यहां घुमावदार रेतीली स्थलाकृति है और 10 से 40 मीटर ऊंचे रेतीले टीले बन जाते हैं और बीच-बीच में रेतीले गड्ढे, साल्ट फ्लैटस और कुछ बंजर टीले दिखाई देते हैं राजस्थान का पश्चिमी भाग अरावली पर्वत मालाओं और उपजाऊ सिन्धु घाटी के बीच का क्षेत्र पाकिस्तान से लगा है और यह उजाड़ और अनुपजाऊ क्षेत्र है। थार मरूस्थल में कहीं-कहीं रेतीली कद्यारी मैदान भी हैं और इनमें वनस्पति बिरले ही पैदा होती है।

अरावली से निकलने वाली शुष्क धाराओं से ही थार मरूस्थल के अधिकांश मैदानों का निर्माण हुआ है और कुछ मैदानों का निर्माण मुख्य हिमालय की धारा से हुआ हैए यह धारा काफी समय पहले ही गायब हो गई थी। अपर्याप्त वर्षा और रेतीले मैदान के कारण वर्तमान धाराएं काफी दूरी तक नहीं जा सकती हैं और रेत की मोटाई में गायब हो जाती हैं।

यद्यपि इस क्षेत्र की बनावट शुष्क व उजाड़ सी है परन्तु फिर भी थार मरूस्थल क्षेत्र में बहुमूल्य प्राकृतिक सम्पदाएं पायी जाती हैं और इसी के कारण सरस्वती.सिन्धु क्षेत्रों में ष्ष्सभ्यता के पालनेष्ष् के लिए भीतरी प्रदेश बन गया है। इसके अतिरिक्त थार मरूस्थल के लोग काफी मजबूत हैं और पिछली कई सहस्त्राब्दियों से विपरीत वातावरण में भी उन्होंने एक अनुकूलन क्षमता विकसित कर ली है। थार मरुस्थल में पशु-संसाधन भी काफी हैं। सूखे की हालत में भी ये पशु उपयोगी कार्य करते हैं और अपनी भूमिका अच्छी तरह से निभाते हैं। बारिश की अनिश्चितताए लम्बा व भीषण सूखाए सूर्य की तेज किरणेंए तेज हवाए मिट्टी की शक्ति का दुर्बल होना और इन सबके अलावा पानी की सीमित उपलब्धता जैसी अनिश्चितता की स्थिति में इन लोगों की उत्तरजीविता की इच्छा ने इन्हें बाध्य किया है कि वे लगातार ऐसे उपायों की खोज में लगे रहें जिससे वे एक बेहतर जीवन गुजारें। यह अफ्रीका के ष्ष्सहारा साहेलष्ष् क्षेत्र से काफी भिन्न है जहां व्यापक रूप से ऋतु प्रवास अभी भी एक मुख्य अनुकूलन पद्धति है। थार मरुस्थल के लोग परम्परागत ज्ञान का प्रयोग करते हैं। ये लोग जल संरक्षण फसलों व जानवरों के साथ मिश्रित खेती कृषि-वानिकी और भूमि की देखभाल में इसी ज्ञान का प्रयोग करते हैं। विश्व के अधिकांश मरुस्थलों के बन्दोबस्त के इतिहास पर नज़र डालने पर ये पद्धतियां नजर नहीं आती हैं वहां तो मुख्य सिद्धांत पशुपालन और प्रवास ही थे।

हड़प्पा शहरों और कस्बों के पास ही, इनमें से अधिकांश तो उस समय की सूखी सरस्वती नदी घाटी में फले-फूले थे (वर्तमान घाघरा नदी जो कभी सतलुज नदी का जल भी लाती थी, मगर यह हड़प्पा सभ्यता के बसने के काफी पहले था) इसका अर्थ यह हुआ कि थार मरुस्थल में रहने वाले लोग फसल और पशु उत्पादों के व्यापार में लगे हुए थे और इस तरह उन्होंने जल संरक्षण और शुष्क भूमि पर खेती करने की तकनीकों को बनाया भी और अपनाया भी। उन लोगों ने मिश्रित-फसल और पशु पालन आधारित कृषि जैसी पद्धति को अपनाया जिसके द्वारा अनियमित मानसून की बारिश का बेहतर ढंग से प्रयोग किया जाता था और साथ ही कम उपजाऊ वाली भूमि का भी सही तरीके से प्रयोग किया जाता था। तब से ही यह पद्धति इस क्षेत्र के लोगों की शक्ति बन गई। जिस वर्ष लघु मानसून नहीं आता है तब अनाज उत्पादन के देखभाल में मिश्रित खेती से काफी मदद मिल जाती है और सूखे की स्थिति में पशु पालन से काफी मदद मिलती है। इसके लिए खासतौर पर जीवित जानवरों की बिक्री करके लाभ प्राप्त किया जाता है। साथ ही पशु उत्पादों को भी बेचकर जीवन.निर्वाह किया जाता है। वह पद्धति भी अपनाई जाती है जिसमें भूमि से फसल लेकर उसे उसकी उर्वरा शक्ति हासिल करने तक खाली (2.5 वर्ष तक की लम्बी अवधि व 1 वर्ष की लघु अवधि) छोड़ दिया जाता है।

गर्मियों के दिनों में खेत के चारों ओर बाड़ा लगा दिया जाता है ताकि आंधी द्वारा उपजाऊ मैदानों से बिखरे गाद को यहां पर इकट्ठा किया जा सके या फिर मिट्टी को उड़ने से रोका जा सके। पेड़ों को काटने के स्थान पर उनकी टहनियों व पत्तों को ही तोड़ा जाता है, पशुओं को चराने के लिए चारागाहों का नियमित प्रबन्धन किया जाता है, चराने की अदला-बदली पद्धतियों को व्यवहार में लाया जाता है। यें सारे तरीके अभी भी थार मरूस्थल की ग्रामीण जनसंख्या के परम्परागत रीति-रिवाजों व खेती व्यवहारों में रचे बसे हैं।

दुर्भाग्य से, जनसंख्या के बढ़ने और आधुनिकीकरण के कारण अब परिस्थितियों में काफी बदलाव आ गया है। स्वतंत्रता के पश्चात परिवर्तन काफी तेजी से हुआ है। बढ़ती जनसंख्या के पेट भरने की आवश्यकता से पहला नुकसान भूमि को खाली पड़े रहने देने वाले तरीके पर हुआ। नियमित चारागाह पेड-पौधों से वंचित हो गए, बड़ी टहनियों वाली झाड़ियां कम होती गई, रेतीले टीले पर जगह-जगह प्रकृति लकड़ी ईधन, वनस्पति ईंधन इकट्ठा करने वालों का आसानी से शिकार हो गई। जिसके कारण रेत की बनावट ढीली पड़ गई और इस तरह से रेत के टीले शुष्क गर्मी के महीनों में हवा के शिकार हो गए। पड़ोस के दो मैदानी राज्यों हरियाणा और पंजाब में हरित क्रान्ति की शुरुआत होने से थार मरुस्थल में काफी बदलाव आए। इन राज्यों में 1970 के दशक के शुरू में विज्ञान आधारित व प्रेरित फसल उत्पादन तकनीकों को अपनाया गया। फसलों की अच्छी व विकसित किस्मों का प्रयोग किया गया, रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों को बढ़ावा दिया गया और जुताई व कटाई तथा सिंचाई सुविधाओं में मशीनीकरण को बढ़ावा दिया गया। परिणाम यह हुआ कि कृषि आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ।

शीघ्र ही राजस्थान के शुष्क पश्चिमी जिलों में भी हरित क्रान्ति की आवाज सुनाई देने लगी। सबसे पहले किसानों ने विशेषकर सर्दियों में फसलों को सींचने के लिए पानी का इंतजाम कुंओं में करने के लिए डीजल पम्प सेट लगाने शुरू किए। समय के साथ राज्य में विद्युतीकरण प्रारम्भ हुआ और राज्य भू-जल विभाग ने पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए कुएं खोदने शुरू किए। इसी नक्शे कदम पर किसानों ने चलकर सिंचाई के लिए कुएं खोद डाले। 1950-51 में बुवाई का क्षेत्र 7.8 मिलियन हैक्टेयर था जो 1980 में 10.9 मिलीयन हैक्टेयर और यह 2005 में 10.9 मिलियन हैक्टेयर तक पहुंच गया। इसी समय सिंचित क्षेत्र भी जो 1950-51 में 363 हजार हैक्टेयर था, वह 1980 में 1.39 मिलीयन हैक्टेयर और 2005 में 2.77 मिलियन हैक्टेयर हो गया। जहां तक नहरों के जाल का प्रश्न है (विशेषकर इन्दिरा गांधी नहर प्रणाली) इससे 43 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र था और 57 प्रतिशत क्षेत्र विद्युतीकृत कुओं से सिंचित था।

विद्युतीकरण के बाद ट्रेंक्टर आए।  रेतीले मैदान में वर्षा होने के तुरन्त बाद जुताई व बुवाई करने में ट्रैक्टर से काफी आसानी होती है। किसानों को यह कार्य मानसून शुरू (आमतौर पर जुलाई के शुरू में) होने पर 30 मि.मी. बारिश होने के दो दिनों के अन्दर ही करना होता है। नहीं तो तपता सूर्य भूमि की आर्द्रता को सोख लेता है और जुताई की संभावना जाती रहती है। खेतों में जगह.जगह उगे पेड़ व झाड़ियां ट्रैक्टर से जुताई करने में बाधा बनी, इसलिए आसानी से जुताई के लिए इन्हें खेतों में से उखाड़ दिया गया। ये पेड़ व झाड़ियां परम्परागत कृषि वानिकी के लिए आदर्श हुआ करती थीं। जैसे-जैसे सिंचाई सुविधाएं बढ़ीं और फसल के लिए भूमि की मांग बढ़ीए तब ट्रैक्टरों  ने रेतीले टीलों पर चढ़ना शुरू कर दिया। पहले इन टीलों पर अच्छी बारिश होने पर ही खेती की जाती थी और अधिकांश टीले प्राकृतिक रूप से फैले विस्तृत क्षेत्र के रूप में कार्य करते थे। धीरे-धीरे रेतीली पट्टी ट्रैक्टरों द्वारा जुताई के कारण गहरी होती गई और इसका परिणाम यह हुआ कि क्षेत्र के बड़े हिस्से में रेत की बनावट में गड़बड़ी पैदा हो गई। वर्तमान में मरुस्थल के आधे पूर्वी भाग में ट्रैक्टरों द्वारा जुताई होती हैए सर्दी में नकदी फसल की सिंचाई के लिए फुहारों का प्रयोग किया जाता है।

सिंचाई के कारण, विशेष कर सर्दी की फसलों के लिए फसल उत्पादन बढ़ा है और किसानों की आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई है। भू-जल मुफ्त-वस्तु है और सिंचाई की सफलता से किसान उत्साहित हैं। खेतों में अत्यधिक सिंचाई करना नियम सा बन गया है।

थार मरूस्थल के सारे गांवों में पेय-जल पहुंचाने के सरकारी प्रयास भी जारी हैं। पाइपलाइन ग्रिड के कारण लोगों को जल आसानी से उपलब्ध है। अब वे जल के लिए अधिक दूरी तय नहीं करते हैंए परन्तु इसके कारण जल को एकत्रित करने के परम्परागत तरीकों की उपेक्षा की गई है। वे कार्य नहीं कर रहें, उनमें गाद भर गया है। जल ग्रहण क्षेत्र प्रभावित हुआ है और उन पर कब्जा कर लिया गया है। भू-जल को खींचने का कार्य जैसे ही आगे बढ़ा, वैसे ही बहुत से कुओं की जल के पुनर्चक्रण की शक्ति घटती गई और स्रोत सूखते चले गए। प्रभावित किसानों ने जल को और नीचे जाकर खींचना शुरू किया। इस क्रिया में न केवल खर्च अधिक आता है, बल्कि कई मामलों में जो जल ऊपर के तल से आया उसकी गुणवत्ता ठीक नहीं थी। इससे मिट्टी प्रभावित हुई और उत्पादकता घट गई। इस प्रकार थार मरूस्थल के जलाशयों के सूखने से सिंचाई से कृषि करना मुश्किल हो गया और यह घाटे का सौदा साबित होने लगी। इस प्रकार से किसानों ने सर्दी में सिंचित की जाने वाली फसलों की अपेक्षा मानसून में वर्षा से सिंचित फसलों की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। इसी बीच रेतीली मिट्टी के क्षेत्र जिस पर कम वनस्पति थी और जो ट्रैक्टर की जुताई से टूट गई थीए वह मार्च से जून में चलने वाली तेज गर्म हवा का शिकार हो गये।

वर्तमान संदर्भ में, थार मरुस्थल में पर्यावरण से जुड़े तीन मुख्य मुद्दे उभरकर सामने आते है:- जल की उपलब्धता, भूमि की गुणवत्ता और धूल का उत्सर्जन। जल प्रबन्धन के लिए सूखते जा रहे जलाशयों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता तो है ही, साथ ही वैश्विक तापन के खतरे और जनसंख्या दबाव न केवल भूमि की स्थिति को कमजोर कर रहे हैंए बल्कि रेत की बढ़ती गतिशीलता और वायुमण्डलीय धूल के भार में भी बढ़ोतरी कर रहे हैं। वास्तव मेंए हम प्राकृतिक प्रक्रिया की गतिशीलता और मनुष्य द्वारा संसाधन पर बलात कब्जा करने के दो खतरों का सामना कर रहे हैं। इसका प्रभावए भूमि गुणवत्ता में गिरावट और वर्तमान पादप प्रजातियों, फसल सहित, पर भी स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ेगा। यदि थार मरूस्थल में उपचारात्मक तरीके नहीं अपनाए गए तो कुछ फसलों की पैदावार में 20 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जैसे-जैसे सर्दी के मौसम में तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है, वैसे ही ज्यादा कीमतों वाली फसलें जैसे जीरा और गेहूं पहले से प्रभावित हो रहे हैं। बारिश के मौसम में व बारिश की मात्रा में व्यापक बदलाव के कारण ग्रीष्मकालीन फसलें (खरीफ) उगाना अब शंका भरा कार्य हो गया है। इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले कुछ दशकों में गर्म हवा की शक्ति में धीरे-धीरे वृद्धि होती जाएगी। भूमि जुताई में किए गए परिवर्तनों और सूखे जलाशयों के प्रभावों के संदर्भ में देखें तो पता चलता है कि पिछले वर्षों के अनुभवों की अपेक्षा वर्तमान में रेत की गतिशीलता के अधिक बढ़ने की संभावना है। अगर ऐसा हुआ, तब इस बात की पूरी संभावना है कि वायु द्वारा उड़ाई गई रेत थार मरूस्थल की पूर्वी सीमा के पार चली जाए। थार मरूस्थल के पूर्वी व उत्तरी भाग में मौजूद स्थिर रेतीले परिदृश्य के फिर से सक्रिय होने से इस प्रक्रिया को मदद मिल सकती है। यह भाग 10-20 हजार वर्षों पहले बृह्त थार के टुकड़ों से बना था। 5-8 हजार वर्षों पूर्व जब पहले बारिश की मात्रा बढ़ी तब ये पश्चिमी रेतीले क्षेत्र प्राकृतिक रूप से स्थिर हो गए थे और यह रेगिस्तानी क्षेत्र अरावली चट्टानों के पश्चिम की ओर खिसक गया था। चूंकि अब जनसंख्या का दबाव काफी है, इसलिए इस रेतीले क्षेत्र में जलाशय सूख गए हैं। और भूमि के धरातल का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। ये मोटे रेतीले क्षेत्र फिर से गतिशील होने के लिए उपयुक्त अवसर की राह में हैं।

थार मरुस्थल और इसके पार की भूमि को विनाशकारी स्थिति से बचाने के लिए निम्नलिखित उपायों को अपनाने की जरूरत है-वायु कटाव को कम करने और भूमि में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए रेतीले क्षेत्र में हरित पट्टी को बढ़ाना, फसलों की जल प्रयोग की और उनमें गर्मी व सूखा सहने की सक्षमता को बढ़ाना, निरंतर पड़ने वाले सूखों और बाढ़ की चुनौतियों से निपटने के लिए प्रबन्धन रणनीतियां बनाना, फसल आधारित अर्थव्यवस्था के एक सशक्त विकल्प के रूप में पशुपालन उत्पादन व्यवस्था को बढ़ावा देना और भूमि धरातल की प्रक्रिया के बारे में बेहतर समझ बनाना और सूक्ष्म अवलोकन करना और इन सबके अतिरिक्त मुख्यतः कृत्रिम जल पुनर्चक्रण द्वारा जल का भण्डारण और संरक्षण करना।

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