महिलाओं की भागीदारी का स्थानीय शासन में महत्व

भूगोल और आप

‘नि संदेह प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण में किसी प्रयोग की सबसे कठिन परीक्षा, स्थानीय स्तर पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को हस्तांतरित वास्तविक शक्तियां एवं कार्य हैं। हम पाते हैं कि केवल मुठ्टी भर राज्यों – केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में ही पर्याप्त अथवा हस्तांतरण किया गया है और हमारी राय में यदि राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से महिलाओं को पर्याप्त अधिकार दे दिया जाए तो इसके निर्णय लेने की योग्यता में वृद्धि होगी जो महिलाओं की भागीदारी की गुणवत्ता, निष्पादन पर प्रभाव और साथ ही साथ उनके व्यक्तिगत विकास में प्रतिबिंबित होगा।’ – पंचायती राज्य संस्थान में इडब्ल्यूआर पर अध्ययन, 2008, पंचायती राज मंत्रालय।

शासन का अध्ययन विकास के लिए किसी देश के भाविक एवं सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन में सत्ता के प्रयोग का तरीका – विश्व बैंक, 1992 के इर्द-गिर्द केन्द्रित था। तथापि यह स्पष्ट था कि प्रजातांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से शासन का एजेंडा तय करने में नागरिकों की कोई भूमिका नहीं थी (एनजी जयाल, 2003 लोकेटिंग जेंडर इन दी जेंडर डिस्कोर्स, यूएनडीपी)। इस प्रकार की परिभाषा अपने उपागम में सीमित थी और इसमें ‘सुशासन’ की अवधारणा के कई पहलुओं को नजर अंदाज किया गया था।

अब सुशासन की तुलना असंबंधी सुधारों से नहीं की जाती बल्कि सामाजिक समानता और न्याय के साथ महत्वपूर्ण अवस्थाओं के रूप में शासन प्रक्रिया में शामिल लोगों की गुणवत्ता और विविधता पहल़ुओं में जोर देते हुए इसमें महिलाओं की  भागीदारी, विकेन्द्रीकरण, जवाबदेही और सरकारी सक्रियता पर बल दिया जाता है।

1992 के 73वें संशोधन अधिनियम ने स्थानीय निकायों को स्वयंशासी संस्थाओं के रूप में मान्यता प्रदान की जो यह दर्शाता है कि स्वयंशासन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जनता की भागीदारी अनिवार्य शर्त है। सभी समुदायों की महिलाओं के द्वारा पंचायत कार्यकरिणी का सदस्य बनने के प्रयास में  मुकाबला करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भारी बदलाव दिखाई पड़ा। भारत में सभी अन्य देशों की सम्मिलित संस्था से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। इसके बावजूद भेदभाव, सूचनात्मक पहुंच के अभाव, निरक्षरता, महिलाओं के आधार का स्वरूप और घर दोनों जगह में भार, गहरी असमानताओं, सामजिक कलंकों, राजनीतिक रूकावटों और निर्वाचित महिला नेताओं को अपेक्षित कौशलों से सशक्त करने के लिए सीमित प्रयासों के कारण महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है (यूएनडीपी, 2009 हेल्पिंग वुमन लिड चेंज)। सत्ता में होने के बावजूद निर्वाचित महिला प्रतिनिधि पंचायत की आयोजन प्रक्रिया और उपलब्ध संसाधनों की जानकारी और सही अर्थों में शासन को कार्यान्वित नहीं कर सकती। आयोजन प्रक्रिया की प्रकृति अपने आप में तकनीकी है जिसके पंचायत कार्यकलापों की गहन समझ, परिभाषित के अनुसार विश्लेषण की क्षमता, जरूरतों को प्राथमिकता प्रदान करने, पंचायत के लिए विजन दस्तावेज तैयार करने, पंचायत योजनाओं के लिए संसाधन मापन हेतु संसाधन, स्वरूप की समझ, बजट और निधियों के स्रोतों के साथ ग्राम सभा की इच्छा सूचि को वास्तविक परियोजना में बदलने तथा अंततः पंचायत योजनाओं के सृजन की जरूरत होती है। इन सब के लिए क्षमता निर्माण, नेटवर्किंग, एक्सपोजर और व्यापक रणनीति तथा प्रभावी भागीदारी के लिए सहायता प्रणाली दुरुस्त करने आवश्यकता होती है। इस प्रकार, महिलाओं के लिए प्रबल सामाजिक समर्थन के साथ व्यापक इनपुट की उपलब्धता समय की मांग है।

शासन में बढती महिलाओं की भागीदारी

ये दोनों मुद्दे किस प्रकार जुड़े हैं यह समझने में सरकारें अच्छा कार्य करेंगी। महिलाओं के विरूद्ध हिंसा, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी की ढांचागत बाधा के रूप में कार्य करती है। वास्तव में महिलाएं सार्वजनिक जीवन और राजनीति में जितना आगे बढ़ती हैं, प्रायः उन्हें हिंसा का भी उतना ही मुकाबला करना पड़ता है। इन दोनों के बीच के संबंध की संभावना प्रगति के लिए जरूरी है, अन्यथा असफलता ही हाथ लेगी। ( महिलाओं के विरूद्ध हिंसा विकास पर कैसे पानी फेर रही है, एक्शन एड, 2010.)

लिंग और शासन के बीच के संबंधों के कई आयाम हैं और कुछ प्रमुख अवधारणाओं का उल्लेख जरूरी है, जिसमें सार्वजनिक निजी क्षेत्रों के संबंध, राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की प्रकृति, सिविल सोसायटी शासन द्वारा ऐसी भागीदारियों के लिए विकसित रणनीति और भारत में लिंग अनुक्रियाशील शासन ढांचा आगे बढ़ाने में राज्य द्वारा की गई निश्चियात्मक कारवाई शामिल है।

शासन में महिलाओं की भागीदारी को इस परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि पुरूष एवं महिला की भूमिका के महत्व को समझते हुए लिंग परिपेक्ष्य में उनका कितना सामाजीकरण हुआ है। यद्दपि प्रायः महिलाओं द्वारा रूपांतरित इस द्विभागीकरण का अर्थ यह है कि महिलाओं का घर से बाहर निकलना किसी की प्रतिष्ठा पर खतरा है क्योंकि महिला को हिंसा अथवा एवं उत्पीड़न झेलना पड़ सकता है। पुरूषों ने इन मानकों का प्रयोग सार्वजनिक पीड़न में महिला के प्रवेश को रोकने तथा उन्हें विभिन्न प्रकार के सार्वजनिक/सामाजिक कार्यों से अलग रखने की अपनी परछाइयों को समयोचित ठहरने में भी किया है। हिंसा और महिला की राजनीतिक भागीदारी के बीच का यह संबंध पिता स्वचालन विचारों में गहराई से जुड़ा जिसके कारण महिलाएं सरकारी कार्यालयों में जिम्मेदारियां स्वीकार करने में हिचकती हैं। अधिकांश जगहों में, सार्वजनिक जीवन एवं राजनीतिक में सक्रिय महिलाओं के नियंत्रित, दंडित एवं शांत करने के लिए हिंसा का जानबूझ कर इस्तेमाल किया जाता है।

राजनीतिक प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी अनेक प्रकार की कारवाईयों एवं रणनीतियों को समाहित करती है। इनमें निजी सार्वजनिक कार्यों का अधिकांश और अधिकारिता के लिए आवेदन करना, चुने जाने के बाद  शासन संबंधी मामलों में सुधार के लिए क्षमता निर्वाण कार्यक्रमों के माध्यम से अपने निष्पादन को सुदृढ़ करना, महिला विरोधी मुद्दों पर आवाज उठाना, बैठकों में नियमित रूप से जाना, लिंग संवेदी एजेंडे वाले समूहों का समर्थन करना और महिलाओं को हतोत्साहित करने वाली नीतियों वाले समूह के विरूद्ध अभियान छेड़ना शामिल है। ये सभी गतिविधियां ऐसे सुद्य क्षेत्र हैं जहां महिलाएं विभिन्न प्रकार की लांक्षित हिंसा का सामना करती हैं। इसके अतिरिक्त आर्थिक निर्भरता, तरह-तरह की हिंसा को जन्म देती है और परिभावी असुरक्षा राजनीतियों में सक्रिय भागीदारी में रूकावट पैदा करती है।

कर्नाटक की पंचायतों में यह देखा गया है कि कई स्वरूप। हिंसा और टकराव के मामलों के समाधान के लिए सम्पर्क करते हैं लेकिन समाधान के समय लिंग संबंधी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं। समूहों की सहायता के बावजूद उत्तराखंड में महिलाएं पंचायत एजेंडा में हिंसा के मुद्दे को शामिल नहीं करा पाती हैं। अदालत से बाहर निपटारे के लिए 2007 में केरल में पंचायत जाग्रत समितियों का गठन किया गया था जिससे अनावश्यक मुकदमेबाजी में कमी आई। अधिक से अधिक संख्या में देश राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने तथा किसी भी प्रकार से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्य तंत्र का निर्माण प्रगति के लिए अनिवार्य घटक है।

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