पंचायत में महिला प्रतिनिधि होने के तात्पर्य

By: जी. उमा
भूगोल और आप

महिला केंद्रित मुद्दों की दिशा में भागीदारी के निर्माण तथा अगुआ समूहों को कर्तव्यनिष्ठ बनाने और चुनी गई महिला प्रतिनिधि को कठिनाइयों के निराकरण के तरीकों के प्रति अभिमुख करने के लिए महिला अगुआओं के नेटवर्क के माध्यम से एक सशक्त सहायता ढ़ांचा अनिवार्य है।

– ईसापुर सरकी, अमरोहा जिला, उत्तर प्रदेश की महिला अगुआ अपने ब्लॉक और जिले की अन्य महिला अगुआओं के साथ जुड़ने के लिए सहायता की जरूरत का समर्थन करती हैं।

– भारत के संविधान में राजनीति में महिला प्रतिनिधि की महत्वपूर्ण साझेदारी के अवसर का प्रावधान है जो अपने निर्वाचन क्षेत्र में लिंग समानता लाने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों के ताने बाने पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती हैं।

– शिक्षा के निम्न स्तरों, व्यवसायिक अनुभव की कमी तथा निम्न आय के साथ, चुनी गई महिला प्रतिनिधि तिहरे बोझ तले दबी हैं। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण सुविधा सीमित है, महिला रोल मॉडलों एवं परामर्शदाताओं का अभाव है तथा महिलाओं के विरूद्ध हिंसा मौजूद है (जी. पलानितुराय एवं अन्य, 2009, सबसे निचले स्तर पर चुनी गई महिला प्रतिनिधियों की नेटवर्किंग, कंसेप्ट पब्लिसिंग)। अंतरराष्ट्रीय विकास संस्था द्वारा ‘द हंगर प्रोजेक्ट’ के तहत कराए गए 2006 के बिहार पंचायत चुनावों के अध्ययन से राज्य में लिंग आधारित हिंसा की व्याप्ति का साफ साफ पता चला। अनाईकुप्पम पंचायत तथा तमिलनाडु पंचायत लीडर्स  फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष पोन्निकैलासम का मामला प्रासंगिक है जिन्होंने ऐसे उदाहरण दिए हैं जिनमें पुरूषों के साथ ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं ने स्वयं को भयभीत महसूस किया। इतना ही नहीं, स्थानीय निकाय संस्थाओं में दलगत राजनीति की प्रधानता तथा परिवार के पुरूष सदस्य का हस्तक्षेप सामान्य बात है। अधनूर पंचायत की मिल्लकोडी ने बताया कि उनके परिवार के पुरूष ही निर्णय लेते हैं और उसे उन पर थोपते हैं तथा वे इस स्थिति को बदलने का साहस नहीं कर पातीं। कुछ मामलों में स्थिति बदतर हो जाती है। उदाहरण के लिए मदुराई नगर निगम की वार्ड सदस्य लीलावती और ऊरापक्कम पंचायत की प्रधान मेनका, जिनकी  पानी से जुड़े मुद्दों पर जनता के कार्यों का विरोध करने पर हत्या कर दी गई थी।

– क्षमता निर्माण, महिला सशक्तिकरण का पहला कदम है। उदाहरण के लिए गांधीग्राम ग्रामीण विश्विद्यालय में पंचायती राज अध्ययन हेतु राजीव गांधी पीठ द्वारा तमिलनाडु सरकार तथा द हंगर प्रोजेक्ट की सहायता से स्थानीय निकायों में चुनी गई महिला प्रतिनिधियों के लिए 1996 से 2001 तथा पुनः 2001 से 2006 के बीच क्षमता निर्माण कार्यक्रम उपलब्ध कराए गए। संस्था द्वारा राज्य के 13 जिलों में 1245 महिला सरपंचों से संपर्क किया गया। गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान की प्रोफेसर पलानी थुराई ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि क्षमता वृद्धि कार्यक्रमों के बाद महिला अगुआओं को एक ऐसे सूत्रबद्ध स्थान की जरूरत होती है जहां वे अपने अनुभवों को साझा कर सकें तथा आपस में सीख सकें। उनका मानना है कि क्षमता और योग्यता का निर्माण रातों रात नहीं किया जा सकता, – यह एक धीमी और सतत प्रक्रिया है जो महिला प्रतिनिधि द्वारा सीखी गई बातों का अभ्यास करने का अवसर देकर उनकी क्षमता को निखार सकता है।

महिला केंद्रित मुद्दों की दिशा में भागीदारी के निर्माण तथा अगुआ समूहों को कर्तव्यनिष्ठ बनाने और चुनी गई महिला प्रतिनिधि को कठिनाइयों के निराकरण के तरीकों के प्रति अभिमुख करने के लिए महिला अगुआओं के नेटवर्क के माध्यम से एक सशक्त सहायता ढ़ांचा अनिवार्य है।

तमिलनाडु की पहल

तमिलनाडु के वृद्धिनगर जिले के स्थानीय निकाय नेताओं (पुरूष एवं महिला) के चुने गए प्रतिनिधियों ने 73वें संशोधन अधिनियम एवं तद्नन्तर तमिलनाडु पंचायत अधिनियम के अनुसार 1996 के पहले स्थानीय निकाय चुनावों के तुरंत बाद, चुने गए प्रतिनिधियों के एक संघ का गठन किया। इसके शीघ्र बाद 1997 में तमिलनाडु की 200 महिला सरपंचों की भागीदारी के साथ गांधीग्राम ग्रामीण विश्विद्यालय, मानवाधिकार फाउंडेश्न, एकता एवं स्नेह जैसे गैर सरकारी संगठनों आदि की सहायता से चुनी गई महिला प्रतिनिधियों के संघ की स्थापना हुई। चुना गया महिला प्रतिनिधि संघ, भारतीय स्थानीय शासन संघ का ही अंग है अतः महिला प्रतिनिधि संघ का अध्यक्ष स्वतः भारतीय स्थानीय शासन संघ के लिए तमिलनाडु का राज्य आयोजक बन जाता है।

– पृथक संघ की आवश्यकता का जन्म बार-बार होने वाली ऐसी घटनाओं से हुआ जिसमें महिला नेत्रियां अपने पुरूष साथियों तथा सरकार की विभिन्न योजनाओं को लागू करने वाले अधिकारियों के समक्ष अपनी जरूरतों को साफ-साफ बताने में असमर्थ रहीं। तमिलनाडु की महिला नेत्रियों के पद चिन्हों पर चलते हुए सखी, केरल, सिंगम्मा श्रीवासन फाउंडेशन, कर्नाटक तथा लोकसत्ता, आंध्र प्रदेश जैसे सिविल सोसाइटी संगठनों की मदद से अन्य राज्यों (केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश) ने भी वर्ष 2000 में महिला प्रतिनिधि के नेटवर्क का गठन किया।

– संघ के माध्यम से क्षमता निर्माण कार्यों तथा संगठन की नियमित बैठकों के फलस्वरूप पंचायत की महिला प्रतिनिधि  को साझे संपत्ति संसाधनों की पुनः प्राप्ति तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों के हकों को सुनिश्चित करने जैसे सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली। तमिलनाडु संघ की महिला प्रतिनिधि पंचायत सीटों को 5 वर्ष के बजाए प्रत्येक 10 वर्ष में एक बार रोटेशन सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत बदलावों का सुझाव देने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलीं। नेटवर्क बैठक में नियंत्रित भागीदारी ने लिंग संबंधी मुद्दों पर जागरूकता प्रदान की तथा अनेक नए विचारों को जन्म दिया।

यद्दपि इस प्रकार के नेटवर्क उपयोगी साबित हुए हैं। फिर भी धारणीयता का सवाल अनुत्तरित ही रहा। नेटवर्क से जुड़ी महिला नेत्रियों का यह प्रयोग 2006 में स्थानीय निकाय चुनाव के बाद कारगर नहीं रहा जब रोटेशन द्वारा सीटों के अनारक्षित हो जाने के कारण तमिलनाडु पंचायत में केवल 30 महिला प्रतिनिधि  ही फिर से निर्वाचित हो सकी। यद्दपि रोटेशन के बाद एक तिहाई सीटों पर महिला प्रतिनिधि चुनी गई थी लेकिन उनमें से अधिकतर सिस्टम से अनजान थीं।

कर्नाटक मॉडलः-  संगठन के साथ जुड़े सदस्य प्रारंभ में केवल विकास कार्यकर्ताओं, नारीवादियों, शोधकर्ताओं को ही अपनी बैठकों में आमंत्रित करते थे। इस अनुभव को सरकार तथा अंतराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा निधि प्रदान की गई थी। परियोजना की अवधि पूरी होते ही सुविधा प्रदान करने वाली एजेसियों ने तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में इस नेटवर्क को सहायता देना बंद कर दिया। कर्नाटक स्थित राज्य स्तरीय चुनी गई महिला प्रतिनिधि संघ – सुग्रामा द्वारा अपनी वेबसाइट बनाई गई। सुग्रामा द्वारा चुनी गई महिला प्रतिनिधि संघ का भारत में ऐसा एकमात्र संघ है जिसकी 2000 से ज्यादा चुनी गई महिला प्रतिनिधि हैं। शुरू में जनजातीय महिलाएं ऊंची जातियों के पुरूषों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराने में डरती थीं। कर्नाटक में चुने गये महिला प्रतिनिधि संघ के अधीन महिला नेत्रियों के लगातार प्रयासों के बाद दोषियों को पकड़ा गया और उन पर अर्थदंड लगाया गया। महिला नेत्रियों के अनुसार इस नेटवर्क ने न केवल लिंग संबंधी मुद्दों के महत्व को समझने में बल्कि अनुभवों एवं सामूहिक मदद को साझा करने में भी उनकी मदद की। कर्नाटक का अनुभव अनेक महिला नेत्रियों के लिए एक रूपांतरण साबित हुआ जो जनसभाओं में अपनी बात स्पष्टता के साथ रखने और वरिष्ठों के साथ बात करने में समर्थ हुई तथा उनमें समझौता जैसी साफ्ट स्किल का भी विकास हुआ।

चुनौतियाँ :    तमिलनाडु में, जहां पर यह नेटवर्क सबसे पहले गठित किया गया था, केवल चुनी गई महिला प्रतिनिधियों पर ही ध्यान केंद्रित किया गया। कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद चुनी गई महिला प्रतिनिधि की सार्वजनिक उपस्थिति धीरे-धीरे कम हो गई। सदस्य अलग-अलग विचारधाराओं के थे तथा उनकी कार्यप्रणाली भी अलग थी। परिणाम स्वरूप संघ बिखर गया। लेकिन नेटवर्क ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि यदि वे चुनाव न भी लड़ें तो भी समाज की सेवा कर सकती हैं। तथापि कर्नाटक के अनुभव ने इस प्रक्रिया को एक कदम आगे बढ़ाया। इसके यह एहसास कराने में सहायता की कि अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि तथा एजेंडा वाले नेटवर्क सदस्यों के बीच के वैचारिक मतभेदों को दूर करना नेटवर्क सृजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तराखण्ड और तमिलनाडु में क्रमश: 2012 और 2013 में हंगर प्रोजेक्ट द्वारा नेटवर्क महिला प्रतिनिधि के बारे में शुरू किये गये नवीनतम प्रयोग के अंतर्गत पंचायत के वार्ड सदस्यों को शामिल करके सहभागिता के आधार को और व्यापक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अपेक्षाकृत छोटे नेटवर्कों का हल निकालना तथा एक व्यापक नेटवर्क तैयार करने के लिए इन छोटे-छोटे समूहों को एकीकृत करना सबसे बड़ी चुनौती है। पारस्परिक संवाद एवं अधिगम के लिए राज्य के भीतर के नेटवर्को को सुव्यवस्थित करना भी जरूरी है। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में संगठनों एवं संस्थाओं द्वारा महिला प्रतिनिधि की सामूहिकता को दीर्घावधि आधार पर समर्थन दिया जाए।

लेखिका, स्कूल ऑफ जैंडर एंड डेवलपमैंट स्टडी, इग्नू, नई दिल्ली में सहायक प्राध्यापक हैं।

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