thyroid harmone

थायराइड की गड़बड़ी को नियंत्रण में रखना

भूगोल और आप

35 वर्षीया रेणुका जो कि फिटनेस इन्स्ट्रक्टर है, ने जब यह पाया कि उसकी ऊर्जा घटती जा रही है तो उसे ऐसा लगा कि यह उसकी बढ़ती उम्र का प्रभाव है। लेकिन जब उसकी मांसपेशियों में तेज दर्द होने लगा और उसके पांवों में ऐंठन होने लगी तो उसने अपने डाक्टर को दिखाया और उस डाक्टर ने परीक्षण करने  पर यह पाया कि ऐसा थायराइड के सही ढंग से कार्य नहीं करने के कारण हो रहा है।

थायराइड, जो कि छोटी सी तितली के आकार की ग्रंथि है, दो प्रकार के हारमोन पैदा करता है – थाईरॉक्सिन टी 4 और ट्राइडोथाइरोनिन टी 3 हारमोन । यह हारमोन श्वसन, संचार और पाचन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को बनाये रखने में शरीर के उपयोग में आने वाली ऊर्जा की मात्रा को नियंत्रित करते हैं। एन्डोक्राइनॉलोजी विभाग, अमृता इंस्टीट्यूट, कोच्चि द्वारा वर्ष 2006 के प्रारंभ में किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि महिलाओं में थायराइड की गड़बड़ी होने की संभावना 9 गुणा अधिक होती है।

थायराइड की गड़बड़ी तब होती है जब ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हारमोन पैदा नहीं कर पाती अथवा अधिक मात्रा में हारमोन पैदा करने लगती है। बहुत कम मात्रा में हारमोन उत्पन्न होने से व्यक्ति हाइपोथाइरोडीज्म से ग्रसित हो जाता है जिसके कारण शरीर की गतिविधियां मंद पड़ जाती हैं। थायराइड ग्रंथि की अल्प-सक्रियता का कारण स्व-प्रतिरक्षण प्रतिक्रिया होती है जिसे हासीमोटो नामक बीमारी के नाम से जाना जाता है और यह बीमारी हाइपोथाइरोडीज्म, आयोडीन की कमी के लिए की गई दवाइयों की अधिक मात्रा में सेवन किए जाने और अवसाद, हृदय रोगों के उपचारों में प्रयुक्त कतिपय दवाइयों, गर्दन, सिर आदि में गांठ, हटाने के लिए की गई विकिरण चिकित्सा से भी पैदा होती है।

ग्रंथि की अतिसक्रियता के कारण हाइपोथाइरोडीज्म होता है जो शारीरिक प्रक्रियाओं को आवश्यकता से अधिक तेज कर देता है। आमतौर पर हाइपोथाइरोडीज्म से स्वप्रतिरक्षण में गड़बड़ी पैदा हो जाती है, यद्यपि थाइराइड की  गड़बड़ी हाइपोथाइराइड के समस्या से निजात पाने के लिए दवाओं के अत्यधिक सेवन से भी पैदा हो सकती है। यदि इसका उपचार नहीं किया जाए, तो इससे  हृदय का काम करना बंद हो सकता है। होलिस्टिक इन्टरनल मेडिसिन एण्ड रियुमेटोलॉजी, अपोलो हॉस्पिटल, चेन्नई की सीनियर कन्सलटेन्ट, डॉ.हीरामालिनी शेषाद्रि हाइपोथाइरोडीज्म के सामान्य लक्षणों के बारे में बताती हैं : वजन कम होना, पैरों में सूजन, चेहरे का सूज जाना, आलस्य, कब्ज, माहवारी के दौरान अधिक रक्तस्राव का होना, शुष्क त्वचा, बालों का झड़ना, अवसाद, याददाश्त कमजोर पड़ जाना और ठंड बर्दाश्त नहीं कर पाना इत्यादि।

दूसरी ओर हाइपोथाइरोडीज्म के कारण वजन कम हो सकता है, धड़कने तेज हो जाती है, अतिसार, चिंता, अधिक अंतराल पर माहवारी की समस्या और गर्मी की समस्या हो सकती है। हाइपोथाइरोडीज्म के रोगी की आंखों में भी समस्या आ सकती है जैसे कि उनकी आंखों में जलन हो सकती है, लाली आ सकती है और उसमें सूजन आ सकती है।

इसके उपचार में कुछ गोलियां लेनी पड़ती हैं लेकिन इसकी समुचित खुराक सुनिश्चित किया जाना महत्वपूर्ण है, यह कहना है डायाकेयर सेन्टर फॉर डायबिटीज एण्ड एण्डोक्राइनोलॉजी, कन्नुर, केरल के एण्डोक्राइनोलॉजिस्ट डा. टी.के. शब्बीर का। वह बताते है, ‘‘अधिक मात्रा में दवा का सेवन करने से अस्थिक्षय, ओस्टीयोपोरोसिस, कार्डाइकऐरीथियमास कि समस्या पैदा हो सकती है जबकि दवाओं का कम मात्रा में सेवन करने से कोलेस्ट्राल का स्तर बढ़ सकता है और रक्तचाप बढ़ सकता है।’’ जी.जी. अस्पताल, चेन्नई की बालरोग और स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा. कमला शेलवराज के अनुसार रोगी के बारे में बिना गहराई से जांच किए हुए पता नहीं चल पाता है और उसकी जांच करने पर यह स्पष्ट हो पाता है कि उसकी बुद्धि मंद पड़ रही है, वह कम बोलता है, उसकी आवाज धीमी पड़ गई है, वह देरी से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, उसके शरीर का तापमान कम हो गया है और हृदय धड़कने की गति कम हो गई है।

रक्त की सरल जांच से ही थायराइड की गड़बड़ी का निर्धारण हो सकता है। सबसे अधिक संवेदनशील जांच में पिट्युट्री ग्रंथि द्वारा स्रावित थायराइड स्टीम्यूलेटिंग हारमोन (टीएसएच) के मान की जांच की जाती है। थायराइड की गड़बड़ी के स्वप्रतिरक्षण संबंधी कारणों की जांच में विशिष्ट प्रकार के प्रतिरक्षियों की विद्यमानता की जांच की जाती है। कैंसर की दशा में नलिका का आकार विशिष्ट प्रकार का हो सकता है, या ग्रंथि सूज सकती है। जहां तक थायराइड के कैंसर का संबंध है, बंगलौर स्थित मणिपाल अस्पताल के कन्सलटेन्ट एण्डोकार्नालोजिस्ट डा. अर्पणदेव भट्टाचार्य पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि सही समय पर डायगनोसिस हो जाने की स्थिति में इस बीमारी का सफलतापूर्वक उपचार हो जाता है।

मधुमेह के बाद विश्व में सबसे अधिक ग्रंथि संबंधी गड़बड़ी में थायराइड की समस्या का स्थान आता है। डा.शब्बीर बताते हैं कि वस्तुतः यह देखा गया है कि मधुमेह के रोगियों में थायराइड की समस्या कहीं अधिक होती है और इस कारण से इन रोगियों की समस्या और अधिक जटिल हो जाती है।

डा. शेलवराज बताती हैं, ‘‘महिलाओं में हाइपोथाइरोडीज्म की समस्या कहीं आम है और इसके कारण उनमें माहवारी अनियमित रूप से होती है और अधिक स्राव होता है। वस्तुतः इसके कारण बांझपन की समस्या भी पैदा होती है।’’ जी. जी. अस्पताल में वर्ष 2004-05 में बांझपन के उपचार के लिए आये 2,882 रोगियों में से 153 रोगी थायराइड से ग्रसित थे। इसमें से 110 रोगियों को  हाइपोथाइरोडीज्म था। वह आगे बताती हैं, ‘‘लेकिन पर्याप्त क्लीनिकल जांच या शल्यक्रिया की सहायता से रोग को नियत्रित करने में मदद मिलती है और बांझपन की समस्या हल करने में भी मदद मिलती है।’’

डा. शब्बीर बताते हैं कि थायराइड की समस्या का उपचार नहीं किए जाने पर गर्भपात होने तथा समय पूर्व बच्चा जनने की समस्या पैदा हो सकती है। डा. शेलवराज इससे सहमत होते हुए बताती हैं कि हाइपोथाइरोडीज्म से ग्रसित रोगियों में गर्भपात, प्रीइक्लम्पसिया और गर्भाशय के अल्पविकसित होने की समस्या कहीं अधिक होती है। उसी प्रकार से शिशु को जन्म देने के बाद, गर्भधारण करने के बाद और गर्भपात होने के बाद भी थाराइडाइटिस की समस्या पैदा हो सकती है। वह बताती हैं, ‘‘यह समस्या शिशु के जन्म के बाद या गर्भपात होने के बाद कम हो सकती है। जबकि, आम तौर पर इसकी दशा स्वयं तक सीमित होती है, फिर भी कुछेक महिलाओं में जीवन पर्यन्त थायराइड की गड़बड़ी बनी रह सकती है।

गर्भावस्था के दौरान विशेषकर तब, जब अत्यधिक उल्टी आती हो, वजन कम हो गया हो, रक्त चाप बढ़ गया हो और निरंतर रूप से हृदय गति बढ़ी हो, हाइपोथाइरोडीज्म की जांच करना महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस मामले में भी हाइपोथाइरोडीज्म के कारण गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ महिलाओं में जटिलता उत्पन्न हो सकती है।

हाइपोथाइरोडीज्म के उपचार में रेडियोएक्टीव आयोडिन, औषधियों का प्रयोग किया जाता है और अत्यधिक बिगड़े हुए मामलों में शल्यक्रिया भी की जाती है। रोगियों को रेडियोएक्टीव आयोडीन तभी दिया जाता है जब वे गर्भवती नहीं होतीं या स्तनपान नहीं कराती हैं क्योंकि इससे शिशु पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

गर्भावस्था के दौरान थायराइड हारमोनों में असंतुलन होने से प्रसव के दौरान शिशुओं में थायराइड  की समस्या उत्पन्न हो सकती है। डा. शेलवराज सावधान करते हुए बताती हैं , “थायराइड रोधी गोली का सेवन करने वाली महिलाओं द्वारा ऐसे शिशुओं को जन्म देने का खतरा बना रहता है जो हाइपोराइड से ग्रसित हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान हाइपोथाइरोडीज्म का उपचार करना महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इससे शिशु की शारीरिक कुशलता प्रभावित हो सकती है।”

थायराइड हारमोन डिम्बों तथा नवजात शिशुओं दोनों के ही मस्तिष्क को परिपक्व बनाने और उनके शरीर के विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 3000 से 4000 शिशुओं में से एक शिशु में थायराइड की गड़बड़ी पायी जाती है और लड़कों की तुलना में लड़कियों में यह समस्या अधिक होती है। भूख का नहीं लगना, अनिद्रा और जन्म के पश्चात लम्बे समय तक पीलिया से ग्रसित रहना इस बीमारी के सामान्य लक्षण हैं। यदि इसका शुरू में निदान नहीं किया जाए तो शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास धीमा पड़ सकता है।

थायराइड की गड़बड़ी से बढ़ते बच्चों में भी मानसिक और शारीरिक विकास की दर मंद पड़ सकती है। असमान्य रूप से वजन कम होना/बढ़ना, स्कूल में खराब प्रदर्शन दिखाना, चिड़चिड़ा होना, अतिसक्रियता प्रदर्शित करना और आंखों का आकार बढ़ना इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं। डा. भट्टाचार्य बताते हैं, “कुछेक बच्चों में ही घेघा होने जैसे स्पष्ट लक्षण दिखते हैं’’। डा. भट्टाचार्य अफसोस जताते हुए यह बताते हैं कि ‘‘थायराइड की गड़बड़ी के प्रारंभिक लक्षणों को अक्सर अवसाद, तनाव, रजोनिवृत, या बढ़ती उम्र का लक्षण समझ लिया जाता है। और रोगी समस्या की अनसुलझी रह जाती है जब तक कि कोई सतर्क डाक्टर इस समस्या की पहचान नहीं कर लेता । यह इस गड़बड़ी के बारे में जानकारी का स्तर कम होने की स्थिति को दर्शाता है। ‘‘यहां यह अधिक चिंता का विषय बन जाता है क्योंकि इस समस्या का पूरी तरह से निदान संभव है।’’

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