जानलेवा और विनाशकारी होती हैं सुनामी तरंगें

जानलेवा और विनाशकारी होती हैं सुनामी तरंगें

भूगोल और आप

अंतःसागरीय भूस्खलन : सागर की अतल गहराईयों में हुए भूस्खलन के कारण भी  सुनामी तरंगें उत्पन्न होती हैं।

अंतःसागरीय ज्वालामुखीय उद्गार : भूकम्प की स्थिति में जो सुनामी तरंगें पैदा होती हैं, वह समुद्र की सतह में होने वाली हलचल के कारण पैदा होती हैं। लेकिन कभी-कभी समुद्र के अंदर ज्वालामुखी फटने के कारण भी पानी बहुत तेजी से अपनी संतुलन की अवस्था से हटता है और सुनामी तरंगें पैदा होती है।

 अन्य कारण : भूस्खलन अथवा कॉस्मिक टकरावों की स्थिति में इसके ठीक उलट पानी पर ऊपर से दबाव पड़ता है, क्योंकि बड़े पैमाने पर चट्टानें और कॉस्मिक पदार्थ पानी में प्रवेश करते हैं। इन स्थितियों में पैदा होने वाली सुनामी तरंगें ज्यादातर समुद्र के भीतर ही फैलती हैं और तटों पर कम असर डालती हैं।

गहरे पानी से समुद्र तट की ओर आने के बाद इन लहरों का रूप बदल जाता है। इन सुनामी लहरों की गति जल की गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए जैसे-जैसे पानी की गहराई घटती है, इसकी गति घटती जाती है, लेकिन इनकी ऊर्जा ऊंचाई और गति दोनों पर निर्भर करती है। इस प्रभाव के कारण सुनामी तरंगें समुद्र के किनारे आने पर काफी ऊँची उठती है और इनकी ऊंचाई कई मीटर तक होती है ।

जब यह एकदम बिल्कुल किनारे पर पहुंचती हैं, तो सुनामी तरंगें इस प्रकार दिखती हैं मानो कोई तरंग बहुत तेजी से नीचे से ऊपर की ओर उठ रही हो, या ऊपर से नीचे आ रही हो, तट पर आने के बाद इन लहरों की ऊर्जा में धीरे-धीरे कमी होने लगती है, लेकिन इस क्षय के बावजूद चूंकि सुनामी तरंगें बहुत ज्यादा ऊर्जा के साथ आती हैं, इसलिए उनमें विनाश की बहुत क्षमता होती है। कई वर्षों में समुद्र तट पर जमा हुई रेत को वह पल भर में उड़ा ले जाती हैं। अत्यधिक ऊंचाई के कारण वे तटीय इलाकों में सैंकड़ों मीटर भीतर तक की बस्ती या भू-भाग को जलप्लावित करने में सक्षम होती हैं, घरों और अन्य समुद्रतटीय संरचनाओं को तहस-नहस कर डालती हैं। बिल्कुल किनारे पर इनकी ऊंचाई 20 से 40 मीटर तक हो सकती है, जिसकी जढ में आने वाली चीजों या जीवों का बचना लगभग असम्भव होता है।

2004 की सुनामी : हिंद महासागर में 26 दिसम्बर 2004 की सुनामी संभवतः सबसे भयानक प्राकृतिक आपदा थी। वैसे तो  विश्व के इस भाग में प्राकृतिक आपदाओं का आना कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन, इतनी भीषण विनाशलीला के बारे में लोगों ने नहीं सुना था। हत्यारी लहरों ने सागर में वापस लौटने तक लगभग 3 लाख लोगों की जान ले ली। सुनामी तरंगें गहरे समुद्र में 500 से 1000 किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से चलती हैं। अतः सुमात्रा और अण्डमान द्वीप समूह से सुनामी की पहली लहर तीन घंटे के भीतर पूर्व में म्यांमार, थाईलैण्ड व मलेशिया और पश्चिम में श्रीलंका, भारत व मालदीव तक पहुंच गई। ग्यारह घंटे के भीतर लहरें 8000 किलोमीटर दूर दक्षिणी अफ्रीका के तट तक जा पहुंची। सुनामी तरंगें वहीं नहीं रुकीं। वे अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिणी छोर से घूम कर दो शाखाओं में बंट गईं- एक शाखा ब्राजील की ओर बढ़ चली और दूसरी कनाडा के पूर्वी तट पर स्थित नोवा स्कोटिया की ओर। पूर्व की राह पर वे पैसिफिक सागर में आस्ट्रेलिया और एंटार्कटिका के बीच से आगे बढ़कर सुदूर कनाडा के पश्चिमी तट तक पहुंच गईं। यह सही मायने में वैश्विक घटना थी। इससे पहले इतनी दूर तक केवल 27 अगस्त 1883 को क्राकाताऊ ज्वालामुखी के फटने से पैदा हुई सुनामी तरंगें पहुंची थी। वे तरंगें भी हिंद महासागर में ही उठी थीं  जिनसे इंडोनेशियाई द्वीप समूह, जावा तथा सुमात्रा में 36000 लोगों की जान गई थी।

समुद्र में जिस स्थान से 2004 में सुनामी उठी, उसे ऐसा स्थान माना जाता था जहां से विशाल सुनामी तरंगें उठने की संभावना नहीं थी। असल में, सुनामी तरंगें पैदा करने वाले भूकंप उन स्थानों पर आते हैं जहां भू-गर्भ की दो टैक्टोनिक प्लेटें सीधे आमने-सामने टकराती हैं। ये प्लेटें  भ्रंश (फाल्ट) भी कहलाती हैं। इनमें से एक प्लेट दूसरी प्लेट के साथ रगड़ खाकर दूसरी प्लेट के ऊपर चढ़ जाती है। इस कारण विशाल मात्रा में पानी हटता है और सुनामी तरंगें पैदा होती है। 26 दिसम्बर, 2004 को 9.3 परिमाण के जिस भूकम्प से सुनामी पैदा हुई वह जटिल प्रकार का भूकम्प था। भ्रंश की रगड़ जहां आरम्भ होती है उसी स्थान पर भूकंप सबसे अधिक होता है। लेकिन, कई बार भ्रंश की रगड़ मामूली होती है जिससे हम अपेक्षा करते हैं कि भूकंप हल्का होगा। लेकिन इस रगड़ से भ्रंश के कमजोर भाग या जहां अधिक दबाव होता है वहां भारी हलचल मच जाती है जिसके कारण बड़ा भूकंप आ जाता है और विनाशकारी सुनामी तरंगें पैदा हो जाती हैं। 2004 में यही हुआ। बाद में विश्लेषणों से पता चला कि इस भारी झटके से सागर तल का करीब 1200 किलोमीटर हिस्सा कुछ जगहों पर लगभग 8 मीटर तक ऊपर उठ गया। इससे समुद्र का सैंकड़ों घन किलोमीटर पानी भी सतह से ऊपर उठ गया।

एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है- प्रशांत महासागर के समूचे तट से सुनामी तरंगें उठ सकती हैं। इसीलिए इस क्षेत्र को ‘अग्नि वलय‘ अर्थात् रिंग ऑफ फायर भी कहते हैं। लेकिन, हिंद महासागर में भूकम्प के कारण केवल दो ही ऐसे भाग हैं जहां से सुनामी पैदा हो सकती हैं- पूर्वी भाग में जहां अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के साथ-साथ म्यांमार से सुमात्रा तक एक भ्रंश फैला हुआ है और पश्चिम में पाकिस्तान के मकरान भ्रंश के क्षेत्र में। सुमात्रा-अंडमान भ्रंश के जिस भाग में विनाशकारी सुनामी तरंगें पैदा हुईं, जहां तक ज्ञात है वहां उससे पहले 8 परिमाण (मैग्निट्यूड) से अधिक का भूकंप नहीं आया था। दिसम्बर 2004 में जब वहां 9.3 परिमाण का भूकम्प आया और तीन माह बाद फिर से करीब 8.7 परिमाण का भूकम्प आया तो वैज्ञानिकों ने मंद गति से आगे बढ़ते हुए भ्रंशों से भविष्य में संभावित सुनामी का अनुमान लगाना शुरू कर दिया। यह सौभाग्य की बात थी कि 28 मार्च, 2005 का भूकम्प उथले पानी में आया जिसके कारण कम मात्रा में पानी ऊपर उठा। साथ ही, यह घटना पूर्व घटनास्थल से दक्षिण में लगभग 100 किलोमीटर दूर हुई जिस कारण इसकी पूर्व की ओर बढ़ती लहरें सुमात्रा से टकराईं और थाईलैंड व मलेशिया का बचाव हो गया।

वैज्ञानिकों के लिए अब यह पूर्वानुमान लगाना सम्भव हो गया है कि सुनामी किस क्षेत्र में आ सकती है, वह किस ओर बढ़ेगी और सागरतट पर कितनी दूर तक ऊपर उठ सकती है। भूकंप से संबंधित जटिलताएं सूक्ष्म हों, तब भी सुनामी के आकार-प्रकार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

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