सांख्यिकी पद्धतियों

सांख्यिकी पद्धतियों का उपयोग

भूगोल और आप

भूगोल में सांख्यिकी पद्धतियों का उपयोग 19वीं सदी के मध्यकाल से ही किया जा रहा है। वॉन हम्बोल्ट एवं कार्लरिट्टर आदि महान भूगोलविदों ने भूगोल में सांख्यिकी पद्धतियों के उपयोग को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इसके महत्व को अधिक स्पष्ट करते हुए टॉरो यामने ने कहा कि ‘‘ सांख्यिकी विषय के अंतर्गत संख्यात्मक तथ्यों का संकलन, सारणीय विश्लेषण के सिद्धान्त, उनकी विधियों व व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।’’

वर्तमान काल में विभिन्न प्रकार के विज्ञान सम्बन्धी विषयों का अध्ययन किया जा रहा है। इन विषयों के व्यवहारिक पक्षों का आर्विभाव 20वीं सदी में होने लगा था और तब से ही सांख्यिकी पद्धतियों का उपयोग तथ्यात्मक एवं आनुभाविक ज्ञान के सारणीयन एवं विश्लेषण में किया जा रहा है। सरकारी एवं सार्वजनिक उद्यम क्षेत्र वाले कार्यालयों में अनिवार्य रूप से एक सांख्यिकी विभाग की स्थापना की जाती है; ताकि आंकड़ों को सुरक्षित रखा जा सके। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के अंतर्गत काम करने वाले विभिन्न विभागों की शाखाएं जिला, तहसील व प्रखण्ड स्तर पर होती हैं। इनके द्वारा किये गये कार्यों के अवलेखन में सांख्यिकी पद्धतियों का उपयोग कर आंकड़ों को संग्रहित किया जाता है।

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सांख्यिकी पद्धतियों की आवश्यकता भूगोल से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों में तथ्यों के प्रस्तुतिकरण, इनकी पुष्टि एवं आंकड़ों को दर्शाने के लिए पड़ती है। सांख्यिकी पद्धतियों के उपयोग से आंकड़ों की व्याख्या, वर्गीकरण तथा विश्लेषण किया जाता है’ ताकि तथ्यों को स्पष्ट किया जा सके जिनसे सम्बन्धित आंकड़े प्रदर्शित किये जो रहे हैं। विश्लेषण के द्वारा तथ्य सम्बन्धी किसी उचित निष्कर्ष पर पहुंचना सांख्यिकी पद्धतियों के उपयोग का उद्देश्य होता है।

सांख्यिकी पद्धतियों का प्रभावी प्रयोग करने की क्रिया में कुछ तथ्यों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। प्रथमतः – विषय का मात्रात्मक पहलू क्या है। द्वितीय – विषय के मात्रात्मक आंकड़ों का विकास किस प्रकार हो रहा है। तृतीय – तथ्यों का समूहीकरण और उनके सारांश सम्बन्धी आंकड़े क्या हैं। चतुर्थ – आंकड़ों का विश्लेषण क्या दिखाता है और पंचम – आंकड़ों की व्याख्या से प्राप्त निष्कर्ष। इस समस्त अभिक्रिया में एक सार संख्या प्राप्त की जाती है जिससे तथ्यों सम्बन्धी किसी स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है।

सांख्यिकी पद्धतियों का उपयोग कर तथ्यों का विश्लेषण करना वर्तमान काल की आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा की मूल व्यवहारिक सोच है जिसमें मात्रात्मक तथ्यों का निरूपण संख्याओं के द्वारा किया जाता है। सार्वजनिक कार्य-व्यवहार के कई क्षेत्रों को इसका लाभ मिल रहा है। यथा- अर्थशास्त्र व वाणिज्य, प्रशासनिक गतिविधियां, उद्योग जगत, चिकित्सा विज्ञान, कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान व भूगोल सम्बन्धी विभिन्न प्रकार के अनुसंधान कार्य।

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