प्राकृतिक जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का संभावित प्रभाव

By: Staff Reporter
भूगोल और आप

जल संसाधनों पर वैश्विक  जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का कैसे मूल्यांकन किया जाए और इससे कैसे निपटा जाए बहुत सारे पारितंत्र में जल संसाधनों का जाल सा बिछा हुआ है, निरंतर बढ़ती जा रही जनसंख्या ऊर्जा खपत का एक मुख्य कारक है और मानव गतिविधियों के कारण भी जलचक्र में परिवर्तन हुआ है।

जल संसाधनों पर वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों और चुनौतियों से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय हाइड्रोलॉजिकल कार्यक्रम के समाधान को भी शामिल किया गया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य जल पद्धतियों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाना है और उन नीतियों को बनाने में इन वैज्ञानिक निष्कर्षों में संबंध स्थापित करना है जिनके द्वारा जल संसाधनों का संपोषित प्रबन्ध किया जा सके।

निरंतर बढ़ते जनसंख्या घनत्व और प्रति व्यक्ति संसाधन के प्रयोग के बीच संबंध, जल से जुड़े विभिन्न पारितंत्रों में जल प्रबंधन और जीवनदायनी शक्ति, गुणवत्ता व संसाधन की उपलब्धता के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण बदलाव आ गए हैं।

जनसंख्या में निरंतर वृद्धि ऊर्जा खपत का एक मुख्य कारक और मानव गतिविधियों के परिणामस्वरूप हुआ वैश्विक  जलवायु परिवर्तन भी जलीय परिवर्तन व इसके प्रभाव का एक मुख्य कारक है। आपस में जुड़े बहुत से मुद्दे है- जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, आधारभूत ढांचों का विस्तार, पलायन और भू-परिवर्तन व प्रदूषण।

युनेस्को के द्वारा  में जल चक्र पर पड़ने वाले प्रभाव और अस्थिरता के समाधान के लिए जोखिम के मूल्यांकन की बात कही गयी है ताकि अनुकूलन रणनीतियों को बनाया व जांचा जा सके। इस प्रकार के दृष्टिकोण से वैश्विक  जलवायु परिवर्तन पर शोध को दिशा देने में मदद मिल सकेगी।

परिवर्तन के प्रभावों के मूल्यांकन व अनुकूलन की जांच पड़ताल के उदाहरण के लिए, अन्तर्राष्ट्रीय शोध कार्यक्रम ‘‘हितैषी जल’’ है। यह अपने आठ क्षेत्रीय समूहों के साथ वैश्विक जलवायु परिवर्तन कारकों के प्रभाव के मूल्यांकन पर बल देता है और बाढ़ से जुड़ी बहुत सी तकनीकों का इसने विकास किया है, जैसे-बाढ़ के पूर्वानुमान की पद्धति और परिकल्पना, बाढ़ के तरीके। प्राकृतिक अनिश्चितता और न्यून प्रवाह और सूखे की कमी व बढ़ोतरी पर मानवीय प्रभावों के बीच अंतर करने के लिए विस्तृत सूचना की आवश्यकता होती है, इसलिए एक एकीकृत अवलोकन आधारित उपागम केन्द्र वे क्षेत्र हैं जहां निकट भविष्य में परिवर्तन होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन भू-जल के जल व प्रवाह व उसके पुनःचक्रण की दर को प्रभावित करने के साथ-साथ भू-जल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। चूंकि इस क्षेत्र में ज्ञान की कमी है, इसलिए ऐसे शोध कार्य पर जोर दिया जा रहा है जिससे कि भविष्य में भू-जल पर जलवायु परिवर्तन के होने वाले प्रभाव को बेहतर ढंग से जाना जा सके।

निरंतर बढ़ रही जनसंख्या और मिट्टी कटाव, शहरी जल व स्वच्छता सेवाओं व जलवायु परिवर्तन, वर्षा पद्धतियों में बदलाव, उनकी ऋतुओं और चक्र में बदलाव, जल संसाधनों में गुणात्मक व मात्रात्मक अन्तर में एक अन्तर्सम्बन्ध स्थापित है। इस संदर्भ में अन्तर्राष्ट्रीय जलविज्ञान कार्यक्रम के शहरी जल प्रबन्धन कार्यक्रम ने उन उपागम यंत्रों और दिशा-निर्देशों को बनाया है जिनको अपनाकर शहर अपने ज्ञान व विश्लेषण में सुधार करेंगे।

अन्तर्राष्ट्रीय जलविज्ञान कार्यक्रम के अन्तर्गत हाइड्रोलॉजिकल परिवर्तन प्रयास वर्तमान कार्यक्रमों के लिए एक छाते के रूप में कार्य कर सकता है और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के सभी पक्षों को एक साथ ला सकता है ताकि जल संसाधनों पर प्रभाव डालने वाले कारकों की बेहतर ढंग से जानकारी प्राप्त की जा सके।

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