जल संरक्षण के आसान उपाय

जल संरक्षण के आसान उपाय अपनायें , वर्षा जल बचायें

By: Bhugol aur Aap
जल मनुष्य को प्रकृति द्वारा दिया गया वरदान है । जल है तो जीवन है । प्रकृति वर्षा द्वारा जल देती है । जल संरक्षण की आवश्यकता है ताकि हमारा भविष्य सुखमय हो ।
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पृथ्वी पर  मंडराते पेयजल संकट से आसानी से बचने के लिए जरूरी है जल संरक्षण इसके लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना होगा ।

  • पानी पीते समय गिलास को जूठा नहीं करना चाहिए। एक व्यक्ति के दिनभर के  जूठे गिलास को धोने में 20 लीटर पानी प्रतिदिन खर्च हो जाता है, जिसे बचाया जा सकता है।
  • सुबह मग में पानी लेकर आधा लीटर पानी से मंजन किया जा सकता है। वहीं नल खुला रखकर मंजन करने पर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 10 लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है।
  • अगर बाल्टी में पानी लेकर मग से नहाया जाये तो 20 से 30 लीटर पानी से आराम से नहाया जा सकता है। लेकिन फव्वारें, नल चालू करके या टब में नहाने पर 50 से 100 लीटर पानी चाहिए। इस तरह एक व्यक्ति प्रतिदिन 30 से 70 लीटर पानी बचा सकता है।
  • एक आदमी मग में पानी लेकर हाथ धोता है तो केवल दो लीटर पानी ही खर्च होगा जबकि नल खुला रखकर हाथ धोने से एक बार में 10 लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है। इस तरह हम 8 लीटर पानी बचा सकते है।
  • पोंछा लगाकर घर धोने में केवल 10 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि पाइप से फर्श की धुलाई करने पर एक बार में 50 लीटर से अधिक पानी खर्च हो जाता है। इस तरह हम एक बार में लगभग 40 लीटर पानी बचा सकते हैं।
  • सब्जियों व फलों को नल के नीचे धोने से पानी व्यर्थ बह जाता है। अगर इनको किसी बर्तन में पानी लेकर धोया जाए तो पानी तो कम खर्च होगा । जल सरंक्षण तो होगा ही  साथ में इस पानी का उपयोग पोंछा लगाने में किया जा सकता है।
  • एक कपड़े को धोने के लिए लगभग 15 लीटर पानी (हर बार नया पानी लेने पर) खर्च हो जाता है। जबकि 15-15 लीटर पानी दो अलग-अलग बाल्टियों में लेकर बारी-बारी से पांच कपड़ों को आसानी से धोया जा सकता है। इस तरह हम प्रति पांच कपड़ों पर 45 लीटर पानी बचा सकते हैं।
  • शौचालय में छोटी बाल्टी से पानी डालने पर 5 लीटर पानी काफी है, जबकि फ्लैश टैंक के उपयोग से 20 लीटर पानी हर बार खर्च होता है। इस तरह हम हर बार 15 लीटर पानी बचा सकते हैं।
  • आजकल ऐसे टॉयलेट भी आने लगे हैं जिनमें फ्लैश टैंक के ऊपर ही वॉश बेसिन होता है। वॉश बेसिन से निकला पानी नीचे फ्लैश टैंक में एकत्रित होता रहता है। इससे अपने आप पानी का दूसरी बार उपयोग हो जाता है।
  • मग में पानी लेकर दाढ़ी बनाने पर मात्र दो लीटर पानी ही खर्च होगा, जबकि नल खुला रखकर एक बार दाढ़ी बनाने पर 10 लीटर पानी खर्च हो जाता है। इस तरह हम 8 लीटर पानी हर बार दाढ़ी बनाने पर बचा सकते हैं।
  • बाल्टी में पानी लेकर मग से बर्तन धोने पर नल खुला रखकर बर्तन धोने से लगभग पांच गुना पानी बचाया जा सकता है।
  • यदि हम बाल्टी व कपड़े का प्रयोग करके दुपहिया वाहन धोयें तो 10 लीटर व कार धोयें तो 40 लीटर पानी ही खर्च होगा जबकि हॉज पाइप द्वारा धोने पर दुपहियां वाहन के लिए 40 लीटर व कार के लिए 100 लीटर पानी चाहिए। इस तरह हम 30 व 60 लीटर पानी बचा सकते हैं
  • मटके में से लोटा भरकर पानी निकालने के बाद आधा पी कर आधा फेंक देने की आदत में सुधार करके एक व्यक्ति दिनभर में लगभग 5 से 10 लीटर पानी बचा सकता है।
  • चार लोगों के एक भारतीय परिवार में एक दिन में कम से कम 234 लीटर पानी खर्च होता है। इसमें से जल संरक्षण व शुद्धिकरण की सामान्य तकनीकों का उपयोग कर लगभग 76 प्रतिशत पानी को पुनः संग्रहित कर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।
  • नल से हर क्षण टपकती पानी की बूंद से महीने में करीब 1000 लीटर पानी बर्बाद होता है। केनेडियन वाटर नेटवर्क के निदेशक डॉ. कैटले कार्लसन के अनुसार इतने पानी से एक किलो गेहूं पैदा हो सकता है। मतलब 4 लोगों के लिए करीब दो वक्त की रोटी का बन्दोबस्त।
  • विभिन्न स्थानों पर जल परिवहन हेतु प्रयुक्त पुराने पाइपों या संयंत्रों में लीकेज आदि से लगभग 50 प्रतिशत पानी बर्बाद हो जाता है, जिसे बचाया जा सकता है।
  • हम थोड़ी सी सावधानी से विभिन्न त्यौहारों या उत्सवों पर पानी की खपत को कम कर सकते हैं। उदयपुर में शहरवासयों ने पिछली होली को सूखी होली या जिसे ‘तिलक होली’ भी कहते हैं, के रूप में मना कर 50 लाख लीटर पानी बचाया। तिलक होली में पक्के रंगाो का प्रयोग नहीं किया जाता है, केवल सूखे रंगों से तिलक लगाया जाता है।  शहर में प्रतिवर्ष होली पर 50 लाख लीटर पानी की अतिरिक्त आपूर्ति करनी पड़ती है, जो इस साल नहीं करनी पड़ी। साथ ही रंगों पर होने वाला खर्च भी बच जाता है। उदयपुर में तिलक होली खेलने से 70 हजार रुपये के रंग कम बिके। अतः पूरे देश में तिलक होली का प्रचार-प्रसार करके एक ही दिन में अरबों लीटर पानी को बचाया जा सकता है।

रेनवॉटर हार्वेस्टिंग

जल संरक्षण के कई वैज्ञानिक तरीके हैं जिनमें सबसे कारगर तरीका रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को माना जाता है। इसका अर्थ है, वर्षा से प्राप्त छत के पानी को किसी भी तरीके से भूगर्भ में डालना।  रेनवॉटर हार्वेस्टिंग के चार तरीके हो सकते हैं। पहला, वर्षा के पानी को एक गड्ढे के जरिये सीधे धरती के भूगर्भीय जल भंडार में उतार दिया जाता है। दूसरा, बड़े संस्थानों के परिसर की बाउंड्री वॉल के पास बड़ी खाइयां बनाकर उनमें वर्षा के पानी को एकत्रित करके जमीन में उतारा जाता है। तीसरा, छत के बरसाती पानी को पाइप के द्वारा कुएं में उतारा जाता है। इससे कुआं तो रिचार्ज होता ही है साथ ही पानी जमीन के भीतर भी रिस जाता है। इसी तरह ट्यूबवेल के द्वारा भी पानी जमीन में उतारा जाता है पर इसके लिए ट्यूबवेल को जोड़ने वाले पाइप के बीच फिल्टर जरूर लगाना चाहिए। चौथा, उपर्युक्त तीन तरीकों से यह अलग है, क्योंकि यह भूगर्भिक जल भंडार को रिचार्ज करने के बजाए छत के बरसाती पानी को सीधे किसी सीमेंट के बने पक्के टैंक में जमा किया जाता है। हांलाकि अन्य तीनों तरीको से यह खर्चीला तरीका है, लेकिन बड़े-बड़े बांधों व नहरों के निर्माण से तो कई गुना सस्ता है। इसके लिए घर के नीचे या घर के पास ही सीमेंट का एक पक्का टैंक बनाया जाता है जिसके पास ही एक अन्य छोटा टैंक बनाया जाता है। इस छोटे टैंक में सबसे नीचे मोटे कंकड़ बीच में छोटे कंकड़ और सबसे ऊपर बारीक रेत या बजरी डाल दी जाती है। यह सिस्टम वर्षा के जल को फिल्टर करता है। वर्षा का छत पर गिरा पानी पाइप के द्वारा इस छोटे टैंक में डाल दिया जाता है, जहां पानी प्राकृतिक रूप से फिल्टर होकर एक अन्य पाइप द्वारा मुख्य टैंक में जाकर एकत्रित हो जाता है और वहां से उसका उपयोग लम्बे समय तक किया जा सकता है। एक हजार वर्ग फीट क्षेत्रफल की एक छत से लगभग एक लाख लीटर पानी (90 सेमी. औसत वार्षिक वर्षा होने पर) एकत्र हो सकता है, जो 4 सदस्यों वाले एक परिवार के लिए 200 दिनों के लिए पर्याप्त है। यह जल संरक्षण का सबसे कारगर, सस्ता व अच्छा तरीका है। इसका एक लाभ यह भी है कि रेनवॉटर हार्वेस्टिंग में 6.95 पीएच वैल्यू का पानी मिलता है जिसे पानी की गुणवत्ता के मामले में आदर्श माना जाता है। और फ्लोराइड की समस्या भी नहीं होती है। अतः भारत में रेनवाटर हार्वेस्टिंग को

अधिकाधिक अपनाकर जल संरक्षण करना चाहिए ताकि निकट भविष्य के जल संकट से बचा जा सके। हम सबको यह संकल्प लेना होगा की बरसात के पानी को बहकर समुद्र में मिलने से पहले किसी भी तरह से जमीन में उतारना है।

रीसाइक्लिंग

वाटर रीसाइक्लिंग का अर्थ है पानी की हर बूंद को साफ कर बार-बार उसका उपयोग करना। जल विकल्प रहित प्राकृतिक संसाधन है अतः इसका अधिकाधिक

उपयोग रीसाइक्लिंग व ट्रीटमेंट से संभव है। नहाने, बर्तन धोने, हाथ-मुंह धोने, कपड़े धोने, साफ-सफाई आदि में इस्तेमाल पानी ‘ग्रे वाटर’ कहलाता है, जिसे रीसाइकिल किया जा सकता है, जबकि टॉयलेट में इस्तेमाल पानी ‘ब्लेक वाटर’ कहलाता है जिसे ट्रीट करना पड़ता है। शहरों में प्रतिदिन सप्लाई होने वाले 80 प्रतिशत पानी को सीवरेज में बहा दिया जाता है। इस पानी को रीसाइकिल या ट्रीट करके भारी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है। केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले पानी का 35 प्रतिशत पानी ही ट्रीट होता है। यदि शेष 65 प्रतिशत पानी भी ट्रीट कर लिया जाए तो न केवल जल संकट दूर होगा बल्कि उद्योगपति का खर्च भी कम हो जाएगा। रीसाइकिल्ड पानी का उपयोग सिंचाई हेतु किया जाता है। यह पानी पीने योग्य नहीं होता है।

रीसाइक्लिंग दो तरह की प्रक्रिया से की जाती है। पहला, ग्रे वाटर को रेत, कंकड़-पत्थर आदि की परतों में निथारा जाता है। क्लोरीनेशन प्लांट इसी श्रेणी में आते हैं जो नगर निगम व नगर पालिकाएं लगाती हैं। हम अपने स्तर पर घर के किसी सुविधाजनक स्थान पर आवश्यकतानुसार गड्ढा बनाकर, जिसमें कंकड़, पत्थर, रेत आदि डालकर बाथरूम के पानी को पाइप द्वारा उसमें ले जाकर रीसाइकिल करके उस पानी को बागवानी व टॉयलेट आदि में प्रयोग कर सकते हैं। दूसरा, इसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों का प्रयोग होता है। बहुत ज्यादा प्रदूषित पानी के लिए सुपर क्लोरीनेशन और रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) प्लांट लगाए जाते हैं। आरओ में ग्रे वाटर में ऑक्सीजन पम्प करके ‘मित्र जीवाणुओं’ को सक्रिय किया जाता है।

अंधाधुंध कटाई कर सीमेंट कक्रीट के जंगल बनाने की होड़ ने प्रकृति को लहूलुहान कर दिया है।  प्रकृति से जिस मौसम में, जहां, जितना पानी मिले, हम उसी को जब तक हरपल सही ढ़ंग से सहेजना शुरू नहीं करेंगे, हमारी तकलीफों का अन्त नहीं होने वाला है।

अंतिम टिप्पणी

जल संरक्षण से सामाजिक-आर्थिक विकास तेज गति से होता है। जल संरक्षण में निवेश का मतलब अर्थव्यवस्था को फायदा है। पानी के संरक्षण पर पैसों का निवेश छोटे से बड़े स्तर तक आर्थिक फायदे का सौदा होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साफ पानी के लिए खर्च किए गए एक डॉलर (लगभग 45 रुपए) के बदले अर्थव्यवस्था को 3 से 34 डॉॅलर (लगभग 135 से 1535 रुपए) तक का लाभ होता है।

जल संरक्षण से एक ओर तो जल संकट दूर होगा वहीं दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक विकास की गति भी तेज होती है। और ऐसे विकास को ही सुस्थैतिक विकास कहा जा सकता है। काँगों, नामीबिया, मोजांबिक, घाना आदि अफ्रीकी देशों में पानी पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के पांच प्रतिशत से भी ज्यादा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले सालों में इस खर्च में भारी बढ़ोतरी करनी होगी। इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि जीडीपी के कुल रकम का इतना बड़ा हिस्सा अगर जल पर ही खर्च हो जाएगा तो यह अन्य विकास के कार्यो पर होने वाले खर्च को कम कर देगा जिससे सामाजिक-आर्थिक विकास की गति भी कम हो जाएगी।

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