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महिला शिक्षण केंद्र

ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बना रहे महिला शिक्षण केंद्र

By: सरिता बरारा
गाँव की महिलाओं को सशक्त बनाने में महिला शिक्षण केंद्रो की बड़ी भूमिका रही है । इनके द्वारा शिक्षित हो रही महिलाएं अपने उज्ज्वल भविष्य को लेकर आशान्वित है ।
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झारखंड में गद्दारा गांव की 14 वर्षीय प्यारी पूर्ति जब आठ.नौ वर्ष की थी तभी उसने खेतों में मजदूरी शुरू कर दी थी। उसे 60 रूपये दिहाड़ी मिलती थी। प्यारी पूर्ति जब 11 वर्ष की हुई तो उसने ईंट-भट्टे पर काम करना शुरू कर दिया और उसे 80 रूपये दिहाड़ी मिलनी शुरू हो गई। वह हर रोज सुबह छह बजे घर से निकलती थी और शाम साढ़े छह बजे घर वापस लौटती थी। घर लौटने के बाद उसे अपनी मां की मदद करने के साथ-साथ  ही अपने छोटे भाई बहिनों का भी ख्याल रखना पड़ता था। बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्यारी का कहना है कि ऐसा भी समय था जब उन्हें दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता था।

प्यारी पूर्ति को जमशेदपुर स्थित महिला शिक्षण केंद्र में दाखिले के लिए चुन लिया गया। वह इससे पहले स्कूल नहीं गई थी उसका स्कूल जाने का सपना सच हो गया क्योंकि वह हमेशा से पढ़ना चाहती थी। 11 महीने का क्रैश कोर्स पूरा होने से पहले ही प्यारी को कक्षा पांच तक की पढ़ाई करनी होगी और इसके बाद उसे कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में दाखिला मिलेगा।

महिला शिक्षण केंद्र मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत महिला समाख्याय योजना द्वारा चलाया जाता है। इस बात को मान्यता मिलने के बाद कि शिक्षा महिलाओं को सशक्त  बनाने में एक प्रभावकारी साधन बन सकती है। कार्यक्रम को सबसे पहले 1988 में तीन राज्यो कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया। लेकिन इस समय यह झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड सहित नौ राज्यों में लागू है।

प्रत्येक महिला शिक्षण केंद्र में तीस लड़कियां और जवान औरतें ;15 से 35 वर्ष की आयु के बीच होती है जहां करीब एक वर्ष तक चलने वाले कोर्स के दौरान पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई कराई जाती है। इसका उद्देश्य  उन्हें  शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा तथा कम्यूटर प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। महिला शिक्षण केंद्र में उन्हें आत्मविश्वास और नेतृत्व के गुण विकसित करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका उद्देश्यं पढ़ी-लिखी प्रेरित महिलाओं का एक समूह तैयार करना है, जो अपने गांव में जाकर बदलाव की प्रतिनिधि बन सके।

झारखंड महिला समाख्या सोसायटी की कार्यक्रम निदेशक डॉक्टर स्मिक्ता गुप्ता  के अनुसार नेतृत्व के गुण विकसित करने के लिए विशेष रूप से तैयार पाठ्यक्रम का अनुसरण किया जाता है और प्रशिक्षण लेने वालों में दिलचस्पी और कौतुहल पैदा करने के लिए ऑडियो विजुअल तकनीक कम्यूंटरों और टेलीविजन आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

महिला शिक्षण केंद्र में लड़कियों को खेलकूद, कराटे में भाग लेने के अलावा और कपड़े धोने का दिन, शिक्षक दिवस आदि में शामिल होने का अवसर मिलता है। उन्हें बैंकों, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों आदि सेवाओं के कामकाज से परिचित कराने और वहां मिलने वाली सुविधाओं से परिचित कराया जाता है। कई बार उन्हें कार्यशालाओं और संगोष्ठियों में भाग लेने का अवसर भी मिलता है।

खंडा डेरा गांव की अष्टमी सरदार महिला शिक्षण केंद्र जमशेदपुर में दाखिले के लिए चुने जाने से पहले रोजाना 50 रूपये में खेत में काम करती थी। उसका कहना है कि वह अध्यापक बनना चाहती है ताकि उसके गांव में कोई भी अनपढ़ न रहे।

झारखंड में 14 महिला शिक्षण केंद्र हैं, 11 जिलों में प्रत्येक में एक रांची में बिरसा मुंडा जेल में महिला कैदियों के लिए एक मानव तस्करी से निकली गई लड़कियों के लिए खूंटी में एक केंद्र है।

लड़कियों की तस्करी झारखंड में एक गंभीर समस्या़ है जहां भयंकर गरीबी के कारण लड़कियों को बेवकूफ बनाकर शोषण की स्थिति में धखेल दिया जाता है। पिछले वर्ष तस्करी से छुड़ाई गई महिलाओं और जवान लड़कियों के लिए एक महिला शिक्षण केंद्र शुरू किया गया और इसके पहले बैच ने 11 महीने का सघन पाठ्यक्रम पूरा किया है।

खूंटी जिला कार्यक्रम समन्वयक आंची होरो का कहना है कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती तस्करी से छुड़ाकर लाई गई लड़कियों को मुख्य धारा में लाकर महिला शिक्षण केंद्र तक लाना है।

आंची होरो ने बताया छुड़ा लेने के बाद वे अपने घरों से निकलने में बहुत डरती है। यहां तक कि जब उन्हें  महिला शिक्षण केंद्र तक लाया जाता है तब भी उन्हें  दहशत से बाहर लाने में समय लगता है।

आंची होरो ने बताया  ‘पहले बैच की 32 महिलाओं में से पांच को केजीबीवी में दाखिला दिया गया है इनमें से बहुत सी लड़कियों ने अपना व्यावसायिक प्रशिक्षण कोर्स पूरा करने को प्राथमिकता दी। शिल्प और सौंदर्य प्रसाधक कोर्स को अधिकतर लड़कियां प्राथमिकता देती है। ’

बिरसा मुंडा जेल में महिला शिक्षण केंद्र में प्रशिक्षु के तौर पर 24 महिला कैदी हैं। जेल के एक अधिकारी के अनुसार उन्हें इन लड़कियों को सबसे पहले डिप्रेशन से बाहर निकालना होता है और बाद में पढ़ाई की तरफ उनकी दिलचस्पी जगाई जाती है।

महिला शिक्षण केंद्र में दाखिले के लिए अधिकारहीन महिलाओं और किशोर लड़कियों का चयन किया जाता है। महिला समाख्या समूह महिला शिक्षण केंद्र के लिए प्रशिक्षुओं की पहचान करते हैं। पढ़ाई में जिन महिलाओं और लड़कियों की दिलचस्पी होती है और जो जीवन में कुछ करना चाहती है उन्हें प्राथमिकता दी जाती है। शुरुआत से पहले चुनी हुई महिलाओं और किशोर लड़कियों को 10 दिन के साक्षरता शिविर में भाग लेना पड़ता है। शिविर में उनके प्रदर्शन के अनुसार सूची को वार्डन अध्यापक और एमएसके के पूर्व प्रशिक्षु अंतिम रूप देते हैं।

राज्य में अब तक महिला शिक्षण केंद्रों से कुल 104 बैच निकल चुके हैं। जिनसे 3456 लड़कियां और महिलाएं लाभान्वित हुई हैं। इनमें से 2169 अनुसूचित जनजातियों 900 से अधिक अनुसूचित जातियों 315 अन्य  पिछड़े वर्गों और 63 अल्प संख्यक समुदायों की है।

आशा, प्यारी और अष्टमी जैसी लड़कियां न केवल उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, बल्कि अपने-अपने गांव में बदलाव का प्रतीक बन गई हैं।

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